भारत और अफ्रीका की सदियों पुरानी पारंपरिक चिकित्सा अब शोध, तकनीक और कारोबार के नए सहयोग की राह खोल सकती है. पढ़िए, कैसे साझा ज्ञान और संसाधनों के जरिए दोनों मिलकर स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था में नई साझेदारी बना सकते हैं.

भारत की अध्यक्षता में 23–24 जुलाई 2026 को आयोजित 16वीं ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में पहली बार ब्रिक्स स्वास्थ्य सहयोग के तहत पारंपरिक चिकित्सा को औपचारिक मान्यता दी गई. स्वास्थ्य मंत्रियों की घोषणा में पारंपरिक चिकित्सा पर संवाद, सहयोग और ज्ञान साझा करने को मजबूत करने के लिए ब्रिक्स हेल्थ ट्रैक के तहत एक विशेषज्ञ कार्य समूह बनाने पर सहमति बनी. इसके साथ ही, संयुक्त अनुसंधान, बहु-देशीय अध्ययन, शोध पद्धतियों और अनुभवों के आदान-प्रदान तथा सफल प्रयासों के दस्तावेजीकरण पर भी जोर दिया गया.

घोषणा में पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा (TCIM) की सुरक्षा और प्रभावशीलता को लेकर मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया. इसके लिए क्लिनिकल ट्रायल और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने की बात कही गई. साथ ही, गुणवत्ता मानकों, सुरक्षा, विषाक्तता परीक्षण और संभावित दुष्प्रभावों की निगरानी में सहयोग को प्रोत्साहित किया गया. BRICS देशों से पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े क्लिनिकल ट्रायल को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा मान्यता प्राप्त विभिन्न रजिस्ट्रियों में पंजीकृत करने का भी आग्रह किया गया.

इस समझौते का एक महत्वपूर्ण और भविष्य-केंद्रित पहलू डिजिटल नवाचार पर जोर है. BRICS देशों ने TCIM से जुड़े डिजिटल ज्ञान मंचों, रिपॉजिटरी और डेटाबेस के विकास में सहयोग का संकल्प लिया है. इसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की Traditional Medicine Global Library जैसी पहलों के साथ जुड़ाव भी शामिल है. घोषणा में विभिन्न प्रणालियों के बीच परस्पर अनुकूलता, ज्ञान-साझाकरण तंत्र और TCIM के अनुसंधान, शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी उभरती तकनीकों के उपयोग को भी समर्थन दिया गया है.

यदि भारत और अफ्रीकी देश पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में अनुसंधान, नियमन, शिक्षा, विनिर्माण और नवाचार का साझा तंत्र विकसित कर सकें, तो यह दक्षिण-दक्षिण वैज्ञानिक सहयोग, आर्थिक कूटनीति और स्थानीय औद्योगिक विकास का एक नया उदाहरण बन सकता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन पारंपरिक चिकित्सा को विभिन्न संस्कृतियों में लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है. WHO की Global Traditional Medicine Strategy 2025–2034 में पारंपरिक चिकित्सा से जुड़े वैश्विक विमर्श के केंद्र में वैज्ञानिक प्रमाण, सुरक्षा, नियमन और स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकरण को रखा गया है. WHO ने 2022 में गुजरात, भारत में Global Traditional Medicine Centre (GTMC) की स्थापना की थी, जिसे भारत सरकार से प्रारंभिक सहयोग मिला था.

हालांकि पारंपरिक चिकित्सा का स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है, फिर भी इसे अब तक मुख्य रूप से सांस्कृतिक विरासत के तौर पर देखा गया है, न कि वैज्ञानिक और आर्थिक सहयोग के क्षेत्र के रूप में. भारत द्वारा पारंपरिक चिकित्सा (TM) को BRICS स्वास्थ्य सहयोग के औपचारिक क्षेत्र के रूप में मान्यता दिए जाने से इस दृष्टिकोण में बदलाव आ सकता है. इससे पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रमाण, मानक, अनुसंधान नेटवर्क और नवाचार को बढ़ावा देने का रास्ता खुल सकता है. इसके साथ ही, इस एजेंडे को BRICS से आगे भी ले जाने का अवसर बनता है, खासकर अफ्रीकी देशों के साथ गहरे सहयोग के जरिए, जहां पारंपरिक चिकित्सा का भी व्यापक रूप से इस्तेमाल होता है.

अफ्रीका के लिए यह अवसर आयुर्वेद या हर्बल उपचारों तक सीमित नहीं है. यदि भारत और अफ्रीकी देश पारंपरिक चिकित्सा (TM) के क्षेत्र में अनुसंधान, नियमन, शिक्षा, विनिर्माण और नवाचार का साझा तंत्र विकसित कर सकें, तो यह दक्षिण-दक्षिण वैज्ञानिक सहयोग, आर्थिक कूटनीति और स्थानीय औद्योगिक विकास का एक नया उदाहरण बन सकता है.

पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में भारत और अफ्रीका के बीच सहयोग की काफी संभावनाएं हैं. भारत के पास समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों के अलावा आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध, और होम्योपैथी जैसी चिकित्सा पद्धतियों का संस्थागत अनुभव भी है. इसके साथ ही भारत में कई फार्मास्युटिकल कंपनियां, विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान इस क्षेत्र को मजबूत आधार देते हैं. भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने 2014 में एक नया मंत्रालय स्थापित किया, जिसका नाम आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा-रिग्पा और होम्योपैथी मंत्रालय (AYUSH) है.

भारत के लिए अफ्रीका न केवल पारंपरिक चिकित्सा उत्पादों का एक विकसित बाजार है, बल्कि यहां साथ मिलकर नई चीजें विकसित करने और अफ्रीकी अनुभवों से सीखने का भी बड़ा अवसर है.

भारत की तरह अफ्रीका के कई हिस्सों में भी पारंपरिक चिकित्सा के बारे में पहले से अच्छी समझ और अनुभव है. WHO भी अफ्रीका के स्वास्थ्य और कल्याण में पारंपरिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण योगदान को मान्यता देता है. इसके अलावा, 2003 से WHO हर साल 31 अगस्त को अफ्रीकी पारंपरिक चिकित्सा दिवस (African Traditional Medicine Day) के रूप में मनाता है. इसलिए भारत के लिए अफ्रीका न केवल पारंपरिक चिकित्सा उत्पादों का एक विकसित बाजार है, बल्कि यहां साथ मिलकर नई चीजें विकसित करने और अफ्रीकी अनुभवों से सीखने का भी बड़ा अवसर है.

वर्तमान में 40 से अधिक अफ्रीकी देशों ने पारंपरिक चिकित्सा के लिए राष्ट्रीय रणनीतियां तैयार की हैं. इनमें से 28 देशों के पास इन रणनीतियों को लागू करने की योजनाएं हैं, जबकि 13 देशों ने इसके लिए कानूनी ढांचे भी तैयार किए हैं. भारत पारंपरिक ज्ञान पर केंद्रित संयुक्त शोध केंद्र स्थापित कर सकता है. इसके अलावा, संयुक्त नैदानिक शोध नेटवर्क, साझा प्रयोगशालाएं और नैतिक मानकों के अनुसार किए जाने वाले परीक्षण पारंपरिक चिकित्सा को वह वैज्ञानिक विश्वसनीयता देने में मदद कर सकते हैं, जिसकी उसे तेजी से जरूरत पड़ रही है.

नियमन इस सहयोग का एक और महत्वपूर्ण आधार हो सकता है. पारंपरिक चिकित्सा के बाजारों में अक्सर कच्चे माल, दवा बनाने की प्रक्रिया, खुराक, चिकित्सकों के प्रशिक्षण और नैदानिक प्रमाणों को लेकर अलग-अलग मानक होते हैं. भारत और अफ्रीकी देशों के नियामक गुणवत्ता, शुद्धता, सुरक्षा, उत्पादों की निगरानी और निर्माण प्रक्रिया के लिए साझा सिद्धांत तैयार करने की शुरुआत कर सकते हैं. धीरे-धीरे पूरे महाद्वीप में इन मानकों को एक जैसा करने से न केवल भारत के लिए अफ्रीकी बाजारों में प्रवेश और सहयोग आसान होगा, बल्कि अफ्रीका के अलग-अलग देशों के बीच वैध सीमा-पार व्यापार को भी बढ़ावा मिलेगा.

औषधीय पौधे इस साझेदारी में आर्थिक अवसर का एक बड़ा क्षेत्र हो सकते हैं. अफ्रीका की जैव विविधता और स्थानीय पारंपरिक ज्ञान को औषधीय पौधों की खेती, दवा बनाने और प्रसंस्करण के क्षेत्र में भारत के अनुभव से जोड़ा जा सकता है. दोनों पक्ष मिलकर ऐसे कार्यक्रम शुरू कर सकते हैं, जो औषधीय पौधों की खेती, वनस्पति संबंधी शोध और स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण को बढ़ावा दें. इससे भारत और अफ्रीका दोनों इन उत्पादों की मूल्य श्रृंखला में आगे बढ़ सकेंगे. इस क्षेत्र में भारत की भागीदारी अफ्रीका को केवल प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़ने में मदद कर सकती है. इसके साथ बौद्धिक संपदा की सुरक्षा और लाभों के पारदर्शी बंटवारे पर भी जोर दिया जा सकेगा.

भारत और अफ्रीका मिलकर पारंपरिक चिकित्सा को केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान तक सीमित रखने के बजाय इसे व्यापक आर्थिक और वैज्ञानिक साझेदारी में बदल सकते हैं. यह दक्षिण-दक्षिण ज्ञान अर्थव्यवस्था के लिए भी आधार तैयार कर सकता है.

शिक्षा लंबे समय में संस्थागत सहयोग को मजबूत करने का आधार बन सकती है. इसके लिए भारत की मौजूदा छात्रवृत्ति व्यवस्था को आगे बढ़ाया जा सकता है. भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की ओर से दी जाने वाली 2026–27 भारत-अफ्रीका मैत्री छात्रवृत्ति योजना के तहत 1,503 सीटें उपलब्ध कराई गई हैं. इसके अलावा, अलग-अलग आयुष छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत विदेशी छात्रों को आयुर्वेद सहित विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन करने का अवसर मिलता है. भारत इस व्यवस्था को आगे बढ़ाते हुए अफ्रीका पर केंद्रित पारंपरिक चिकित्सा के लिए एक विशेष छात्रवृत्ति योजना शुरू कर सकता है.

स्वास्थ्य और कल्याण से जुड़े पर्यटन के क्षेत्र में भी भारत और अफ्रीका के बीच सहयोग की काफी संभावनाएं हैं. खासकर केरल में भारत के अनुभव को एक मॉडल के रूप में अपनाया जा सकता है, जहां विशेषज्ञों की निगरानी में आयुर्वेदिक सेवाओं, योग, पोषण और बीमारियों से बचाव के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को एक साथ जोड़ा जाता है. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) जैसे भारत के उन्नत चिकित्सा संस्थानों ने कोविड-19 महामारी के दौरान अफ्रीकी संस्थानों के साथ काम किया है. आगे चलकर ये संस्थान कुछ अफ्रीकी देशों में क्षेत्रीय केंद्र भी स्थापित कर सकते हैं. इस दिशा में निजी क्षेत्र भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. ऐसी पहलों के लिए भारत-अफ्रीका पारंपरिक चिकित्सा कोष बनाया जा सकता है, जो इन परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने में मदद करेगा.

हालांकि, इस दिशा में आगे बढ़ने से पहले कई चुनौतियों का समाधान करना जरूरी है. हजारों पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को लेकर उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण अभी समान रूप से मजबूत नहीं हैं और कुछ उपचारों में जोखिम भी हो सकते हैं. जब उपचार में कई तरह के घटकों से बनी दवाएं या समग्र चिकित्सा पद्धतियां शामिल होती हैं, तो उनका वैज्ञानिक मूल्यांकन और भी जटिल हो जाता है. अफ्रीकी देशों में नियमों और मानकों की अलग-अलग व्यवस्था भी एक बड़ी चुनौती है. इसके अलावा, यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि अफ्रीकी समुदाय केवल सस्ते कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता बनकर न रह जाएं, बल्कि उत्पादन की अधिक मूल्य वाली प्रक्रियाओं में भी उनकी भागीदारी हो.

इसलिए, अफ्रीका के साथ भारत का पारंपरिक चिकित्सा सहयोग स्थानीय स्तर पर उत्पादन, तकनीक का हस्तांतरण, संयुक्त शोध, कौशल विकास और स्थानीय समुदायों के साथ लाभों के बंटवारे पर आधारित होना चाहिए. WHO ग्लोबल ट्रेडिशनल मेडिसिन सेंटर के माध्यम से भारत का नेतृत्व और ग्लोबल साउथ के साथ उसकी व्यापक कूटनीतिक भागीदारी इस दिशा में उपयोगी मंच उपलब्ध कराती है. भारत और अफ्रीका मिलकर पारंपरिक चिकित्सा को केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान तक सीमित रखने के बजाय इसे व्यापक आर्थिक और वैज्ञानिक साझेदारी में बदल सकते हैं. यह दक्षिण-दक्षिण ज्ञान अर्थव्यवस्था के लिए भी आधार तैयार कर सकता है. इससे भारत और अफ्रीका अपनी साझा विरासत को बेहतर संस्थागत क्षमता और नए आर्थिक अवसरों में बदल सकेंगे.

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समीर भट्टाचार्य ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में फ़ेलो हैं.

डॉ. मनोजित दास आर्म्ड फोर्सेज़ ट्रिब्यूनल (प्रिंसिपल बेंच) और बार एसोसिएशन नई दिल्ली के सदस्य तथा IADN के मानद सलाहकार हैं; वे पहले ICCR के साथ नोडल ऑफ़िसर के तौर पर भी जुड़े रहे हैं.


 

साभार- https://www.orfonline.org/hindi से