देश भर में हर शिक्षा संस्थान में प्रवेश, और वहाँ की परीक्षा, हर प्रश्न-पत्र, हर मूल्यांकन, आदि एक ही आफिस से करने का निर्णय लिया गया होगा। ऐसी मतिहीनता सामान्य बुद्धि से भी अटपटी लग सकती है। कि कहीं एक भी गड़बड़ी, एक भी भूल, एक की पतिताई, आदि कुछ भी देश भर के लाखों व्यक्तियों, संस्थाओं को कष्ट देगी। बार-बार परेशान करेगी।…. कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि ईटन, हैरो, कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड, आदि सभी विख्यात शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए एक सरकारी कार्यालय टेस्ट लेगा! ऐसा करना हर तरह से मूढ़ता पूर्ण है। पर यहाँ किया जा रहा है।
सार्वजनिक शिक्षा: गरीब की लुगाई -2
वरना, सोच कर बताएं — यह किस ने, और किस उद्देश्य से तय किया कि प्रवेश परीक्षा में शून्य अंक पाने वाला भी एक बड़े विश्वविद्यालय में पीएचडी करने के लिए प्रवेश पा सकता है? इस के उत्तर में बचाव में जितनी बातें होंगी, सब राजनीतिक और स्वार्थ, ईर्ष्या-द्वेष, लफ्फाजी का बवंडर होगा। उस में शिक्षा या ज्ञान के प्रति कोई चिंता या समझ भी लक्षित नहीं होगी। यही है: शिक्षा का गरीब की जोरू होना! इस पर हर कोई कुछ भी बोलने, करने, थोपने, फतवे देने का अधिकारी है। मानो, यही एक क्षेत्र है जिस के लिए किसी पात्रता की जरूरत नहीं! पार्टी कार्यकर्ता से लेकर ठेकेदार तक उस में अपनी चला सकते हैं। चलाते हैं।
इसी दृष्टिकोण से देश भर में हर शिक्षा संस्थान में प्रवेश, और वहाँ की परीक्षा, हर प्रश्न-पत्र, हर मूल्यांकन, आदि एक ही आफिस से करने का निर्णय लिया गया होगा। ऐसी मतिहीनता सामान्य बुद्धि से भी अटपटी लग सकती है। कि कहीं एक भी गड़बड़ी, एक भी भूल, एक की पतिताई, आदि कुछ भी देश भर के लाखों व्यक्तियों, संस्थाओं को कष्ट देगी। बार-बार परेशान करेगी। जबकि स्थानीय, संस्थागत, राज्यवार, आदि क्षेत्राधिकार में स्वयं संपूर्ण रहने पर हर संस्था, हर परीक्षा, हर मूल्यांकन की गुणवत्ता अधिक सुरक्षित, स्पष्ट, सीमित, जिम्मेदार, और इसलिए उत्कृष्टता की संभावना भी बनी रहती है। यही पहले था भी।
यूरोप और अमेरिका के शैक्षिक संस्थानों में अभी भी वही है। उधर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि ईटन, हैरो, कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड, आदि सभी विख्यात शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए एक सरकारी कार्यालय टेस्ट लेगा! ऐसा करना हर तरह से मूढ़ता पूर्ण है। पर यहाँ किया जा रहा है। जो शिक्षा की गुणवत्ता और उत्कृष्टता को पेंदे में पहुँचा देने का अचूक उपाय है। मानो भारतीय विश्वविद्यालय रूपी फैक्ट्री से औसत कुली-कर्मचारी बनने लायक औसत माल तैयार करना हो। बस। इस से अधिक की कल्पना नहीं, चिन्ता नहीं।
वैसे भी, हर चीज का ‘केंद्रीकरण’ एक कम्युनिस्ट-लोकतंत्री मानसिकता है। यह अंध-मानसिकता कि सब कुछ ‘जनता’, यानी उस के नाम पर पार्टी करेगी। फिर पार्टी के नाम पर भी एक पार्टी-कमिटी, बल्कि उस का प्रमुख, यानी अंततः एक नेता। क्या यह — एक देश एक परीक्षा — भी, ‘एक देश एक चुनाव’, ‘एक देश एक पार्टी’, और ‘एक देश एक नेता’ की तरह की बे-सिर-पैर की कल्पना ही है? यह रूसी कम्युनिस्ट मानसिकता का ही भारतीय हिन्दू रूप जैसा है।
परन्तु, इस तरह सब कुछ एक हाथ में केंद्रित कर देना बुद्धि, विवेक, जिम्मेदारी, और गुणवत्ता का सत्यानाश करने का ही प्रबंध करना है। पूरे सोवियत कम्युनिज्म के इतिहास का सबक और क्या है? पूरे सत्तर बरस, पूरा देश चुपचाप ऊपर का मुँह देखने, और ऊटपटाँग हुक्म मानने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता था! साथ ही, जो भी गड़बड़ी हो रही हो, पहले उसे छिपाना, लीपा-पोती करना, और जब बात खुल जाए तो ‘विदेशियों’, ‘गद्दारों’, या ‘कामचोरों’ को दोष देकर फिर वैसे ही उल्टा-सीधा करते जाना। यही दशकों से सोवियत कम्युनिज्म में चलता रहा।
उसी कम्युनिज्म से स्वतंत्र भारत की अनेकानेक शासकीय नीतियाँ प्रभावित रही है। चूँकि उस से मुट्ठी भर राजनीतिक वर्ग असीम शक्ति, सुविधा, और भोग-विलास का अवसर पाता रहा है। इसलिए भी हर चीज पर राजकीय कब्जा करने, फिर केंद्रीकरण, आदि उसी पार्टी-एकाधिकारी मानसिकता की व्युत्पत्ति है। सब पर हम, सब कुछ पर हमारा चले। सब हमारे ताबेदार। जो विरोध करें, वह जनता के दुश्मन, या विदेशी एजेंट। इस तरह की बनी-बनाई रट, यहाँ भी सोवियत यूनियन से ही मिलती जुलती लंबे समय से रही है।
दशकों पहले कारखानों का, बैंकों का, अनेक उद्योग व्यापारों, आदि का राष्ट्रीयकरण उसी भावना में हुआ था। जब दशकों में भारी बर्बादी और लूट करके, साथ ही अंतहीन कुव्यवस्था से आगे चलना एकदम असंभव हो गया, तब जाकर किसी तरह कुछ बदलाव हुए। वह भी नरसिंह राव और मनमोहन सिंह की चतुराई से, लगभग चुपचाप, छिपाकर। पर यहाँ आम राजनीतिक वर्ग की वह एकाधिकारी, मनमानी, विशेषाधिकार, राजकीय संसाधनों की छीना-झपट, आदि की मानसिकता यथावत है। शिक्षा क्षेत्र उस का एक बड़ा उदाहरण है। अभी देश के विश्वविद्यालयों के क्रियाकलापों का आम नजारा है — ‘लूट सके सो, लूट। हाँक सके सो हाँक’!
बहरहाल, केंद्रीकरण करने वालों ने यह मोटी बात भी नहीं देखी कि सालो भर, नियमित रूप से, लाखों-लाख आवेदनों को जब एक केंद्रीय कार्यालय में देखा जाएगा, सैकड़ों तरह के प्रश्न पत्र एक ही जगह बनेंगे, तो यह सब अंतिम बाबुओं, क्लर्कों, सहायकों के माथे जाएगा — न शिक्षा मंत्री, न शिक्षा सचिव, न एजेंसी के डायरेक्टर वह सब देखेंगे। वे देख भी नहीं सकते! वह भौतिक रूप से असंभव है। सो, कुल मिलाकर प्रोफेसर और शिक्षकों से उन का काम छीन लिया गया, तथा इसे एक केंद्रीय ऑफिस के यांत्रिक काम में बदल डाला गया। व्यवहार में इस का अर्थ क्या हुआ?
यही कि शिक्षक, प्रोफेसर, वाइस चांसलर, आदि तो अयोग्य अथवा अविश्वसनीय, या दोनों हैं। जबकि किसी केंद्रीय एजेंसी के ऑफिस का बड़ा बाबू, और भाड़े पर बुलाए गये, आते-जाते लोग विश्वसनीय तथा योग्य हैं! यह कैसी समझ है? यह भी याद रहे, उक्त प्रोफेसर, प्रिंसिपल, वाइस चांसलर, आदि को लाखों रूपये का वेतन और अन्य सुविधाएं दी जाती हैं। जबकि केंद्रीय ऑफिस के क्लर्क और ठेके वाले कंसल्टेंट्स जिन के हाथों में काम दे दिए हैं, उन्हें मामूली वेतन मिलता है। ऐसी दोहरी, पर विचित्र व्यवस्था कैसी बुद्धि है?
यह बालबुद्धि है, जो केवल भारतीय नेताओं में होती है। ध्यान देकर हमारे नेताओं का जीवनवृत्त देखें। उन में अधिकांश प्रायः जीवन में बिना कोई वास्तविक काम किए, बरसों बरस केवल लफ्फाजी, आपसी समीकरण, चापलूसी और मटरगश्ती करते हुए, विधायक से मंत्री और ऊपर चढ़ते जाते हैं। यानी, जीवन में समाज के लिए किसी ठोस, उपयोगी रोजगार करने के अनुभव से प्रायः खाली! बदले में मुख्यत: भाषण और लफ्फाजी करने का अभ्यास और अनुभव। इसलिए, जब शासन हाथ में आए तब हर विषय पर या तो कल्पना से सोचते हुए, या जिस किसी के सुझाव, विचार या विदेशियों की ऊपरी नकल से निर्णय लेते हुए, फिर सब में अपना चुनावी एवं निजी स्वार्थ व अहंकार जोड़े हुए — यानी वह सब दुर्गुण जो ब्रिटिश शासकों में एक भी नहीं थे! यह बिन्दु कुछ ध्यान देने लायक है।
भारत के बड़े भाग पर लगभग दो सौ सालों तक ब्रिटिश राज माना जाता है। अतः तुलना करना रोचक है कि सभी के सभी ब्रिटिश शासक लंबे-लंबे समय तक फौज, व्यापार, कानून, शिक्षा, आदि किसी क्षेत्र में ठोस काम का अनुभव रखते थे। इसलिए वे अपनी, और दूसरों की भी, विशेषज्ञता को समझते थे। उस का महत्व भी जानते थे। वे खामख्याली, संदेह, या किसी क्षुद्र स्वार्थ से भी चलने वाले जीव नहीं थे। जिसे जो काम मिलता था वह उसे निष्ठा और स्वाभिमान से पूरा करने में सन्नद्ध रहता था। चूँकि वह स्वयं ईमानदार और सत्यनिष्ठ होता था, इसलिए प्रायः दूसरों को भी वैसा ही समझता था। यह एक बड़ा महत्वपूर्ण बिन्दु है। शासन के चरित्र और गुणवत्ता का मूल्यांकन करने की दृष्टि से रोचक भी।
इसीलिए पूरा ब्रिटिश राज अपना दैनं-दिन प्रशासन मौखिक वचनबद्धता और मातहतों के साथ परस्पर विश्वास पर चलता था — संदेह पर नहीं। अर्थात, जब तक कोई मामूली देसी कुली या राजा भी, विपरीत चरित्र न दिखाए, तब तक ब्रिटिश अधिकारियों के लिए हर भारतीय भी सहज विश्वसनीय था। आपस में तो वे पक्के विश्वसनीय थे ही। उन के राज में लिखित बातें केवल कानून, नियम, योजनाएं, एकाउंट, बड़े फैसले, आदि होते थे। बाकी रूटीन चीजें मौखिक चलती थीं और उस में कभी हेर-फेर, बात बदलना, गड़बड़, आदि नहीं होता था। संक्षेप में, अंग्रेज गुणवान और चरित्रवान थे, इसलिए गुणग्राहक और चरित्र का सम्मान भी करते थे। उन में ईर्ष्या-द्वेष का अभाव, और दूसरों पर विश्वास करना कोई आकस्मिक, सांयोगिक तत्व नहीं था।
कहने का मतलब यह नहीं कि यहाँ अंग्रेज शासकों, अधिकारियों में कोई निजी स्वार्थ, पदोन्नति की चाह, अच्छी पोस्टिंग, अपने बाल-बच्चों की चिन्ता, सिफारिशों का उपयोग, आदि नहीं थी। यह सब था। पर किसी जिम्मेदारी की उपेक्षा करके, अपने वर्तमान पद के कर्तव्य के प्रति बेपरवाही से, या उस में घपला करके, अपने पद या राजकोष का दुरुपयोग करके पाया जाए — ऐसा वे प्रायः कल्पना भी नहीं करते थे! इसी बात से उन की वित्तीय ईमानदारी भी जुड़ी थी।
अतः नोट करें — कट्टर से कट्टर भारतीय राष्ट्रवादी नेता, अंग्रेजों से घृणा करने वाले भारतीय भी, किसी ने कभी अंग्रेजों पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया। कभी नहीं। अंत तक नहीं। अर्थात, वायसराय से लेकर अंतिम सबाल्टर्न, यानी सब से निचला अंग्रेज सिपाही, कर्मचारी भी अपने वेतन के सिवा कुछ नहीं जानता था। यह उन के चरित्र का अंग था। यह शासक की दक्षता और विश्वसनीयता के लिए एक बड़ा तत्व है।
यहाँ जब भारतीय कर्मचारियों, अधिकारियों पर विश्वास करके अंग्रेजी साम्राज्य चलने-चलाने की बात कही जा रही है — वह भी दसियों पीढ़ियों तक — तो इस तथ्य का एक गहरा अर्थ है। चूँकि आम अंग्रेज सत्यनिष्ठ, कर्तव्यपरायण थे, इसलिए दूसरों में भी जब तक किसी अदद व्यक्ति का गलत आचरण दिख न जाए, तब तक वे उसे भी यथावत सही समझते थे। फिर, उन के राज में पुरस्कार और दंड कर्म पर तय होता था, मुँह, रंग या जाति समुदाय देख कर नहीं। तदनुरूप, भारतीय लोगों में भी, अपने अनुभव से विभिन्न जातियों, समुदायों, कबीलों, क्षेत्रों, आदि की महीन विशेषताएं जानकर अंग्रेजों ने उन के प्रति ठोस, व्यवहारिक नीतियाँ रखीं थीं। वे ‘सब धान बाइस पसेरी’ की तरह सब को एक सा मान जिस किसी को कोई भी काम या पद नहीं दे देते थे! अपराधिक मामलों में कानून के समक्ष समानता के सिवा, वे हर भारतीय समूह की अपनी विशेषता के अनुरूप व्यवहार रखते थे। कारण वही था: कर्तव्यनिष्ठा और अपने संपूर्ण राज्य के लक्ष्य का ध्यान। न कि किसी किताबी सिद्धांत या मतवाद या दलीयता या निजी स्वार्थ का आग्रह। (जारी)
आज शिक्षा में शिक्षक नहीं, बल्कि बाबू, ठेकेदार, एवं पार्टीबंदी महत्वपूर्ण हैं। अच्छा शासन करना नहीं, सारे चुनाव जीतना अधिक महत्वपूर्ण है। उसी तरह, जीवन में भी सच्चाई नहीं, आडंबर महत्वपूर्ण है। पढ़ाने-लिखाने, पत्रिकाओं-पुस्तकों, गोष्ठी सेमिनारों में भी सत्य नहीं, प्रोपेगंडा महत्वपूर्ण है। हर सामाजिक क्षेत्र में उपलब्धि नहीं, उस की भंगिमा, उल्टा-सीधा आँकड़ा बनाना महत्वपूर्ण है। विद्वत-जन नहीं, आईटी-सेल महत्वपूर्ण है। (बड़े नेता ने सत्ता मिलने पर यही आईटी सेल बनाए, जानकारों की सलाहकार समिति नहीं)।
सार्वजनिक शिक्षा: गरीब की लुगाई-1
हाल में, कॉकरोच आंदोलन और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक और गड़बड़ी को लेकर था। एक समाचार के अनुसार, गत दस वर्षों में पेपर लीक की सौ से अधिक घटनाएं हुईं। पर कोई ऐसा समाचार शायद ही आया कि उस पर कहीं व्यवस्थित, जिम्मेदार विचार हुआ। न यह समाचार आया कि उस गड़बड़ी के लिए कोई दंडित हुआ। पहली बार, उक्त आंदोलन के बाद ही कुछ अधिकारियों की छुट्टी, तबादले, पदाधिकारी में बदलाव, और अंततः शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के समाचार सुने गए।
जरा इतिहास उलट कर देखिए। योग्यता के आधार पर सरकारी नौकरी देने का आरंभ ब्रिटिश राज ने 1833 में किया था। फिर ऊँची नौकरियाँ लिखित परीक्षा और अन्य व्यक्तित्व क्षमताओं की परख करके देने का आरंभ भी 1853 में अंग्रेजों ने ही शुरु किया था। उसी लॉर्ड मैकॉले ने वह इंडियन सिविल सर्विस शुरू करवाई, जिस के आज भी भारतीय युवा दीवाने हैं, पर जिस आविष्कारक की निन्दा करना स्वतंत्र भारत के शिक्षा विमर्श की पहली और स्थायी सनक है।
पर जरा खोजिए, पहली वैसी परीक्षा आरंभ करने से लगभग सौ साल चले ब्रिटिश राज में कभी किसी पेपर लीक, गड़बड़ी, भ्रष्टाचार, तथा जानबूझकर कर किसी अयोग्य की नियुक्ति का एक भी उदाहरण मिलता है? याद रहे, तब सभी पेपर, पर्चे, उत्तर पुस्तिकाएं, कागज पर रहती थीं। उन का परीक्षण, मूल्यांकन तमाम परीक्षक अपने-अपने घरों में करते थे। जो परंपरा अनेक तरह की परीक्षाओं के लिए स्वतंत्रता के बाद भी लंबे समय तक चलती रही। पर उस में आम गड़बड़ी की बातें कभी नहीं सुनी गई।
जबकि आज तमाम कथित होशियारी, उपाय, तरह-तरह की गोपनीयता, परीक्षा केंद्र बनाकर पुस्तिकाएं जाँचने, आदि के बावजूद उत्तर पुस्तिकाओं के सही मूल्यांकन नहीं होते। भ्रष्टाचार, पेपर-लीक से लेकर बाकायदा ऊपरी निर्देश से झूठे मूल्यांकन तक किए जाते हैं। फेल छात्रों को भी पास कर देने का हुक्म पहले ही ऊपर से दे दिया जाता है। केंद्रीय विद्यालयों, सीबीएसई की परीक्षाओं में भी यह आम चलन है — फेल को भी पास करना! यह सब क्यों, किसलिए, किस के हित में? इस का विचार करने वाला आज कोई नहीं! इसलिए भी बेचारी सार्वजनिक शिक्षा आज गरीब की जोरू है।
उसी क्रम में, हाल में नया चलन शुरू हुआ। अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं, दाखिलों, आदि के लिए परीक्षाओं का केंद्रीकरण। जिस में केंद्रीय विश्वविद्यालयों के विविध विभागों में दाखिले की परीक्षाएं भी शामिल हैं। यानी, दर्जनों तरह की विशिष्ट संस्थाओं के लिए भी, और लाखों-लाख छात्रों की योग्यता की परीक्षा एक एजेंसी, एक जगह से करे। यह कई तरह से अनुपयुक्त, बल्कि हानिकारक लगता है।
सरसरी तौर पर भी देखें तो यह बारह साल पहले किए गये वादे ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ के भी साफ विपरीत है। यह भारतीय संविधान की संघवाद की भावना के भी विरुद्ध है, जिस में राज्यों को शिक्षा क्षेत्र में स्वतंत्र या स्वायत्त अधिकार दिए गये थे। जिसे देश के केंद्रीय सत्ताधारी धीरे-धीरे कुतरते हुए लगभग खा गये हैं। इस से विभिन्न महत्वपूर्ण शैक्षिक संस्थानों की अपनी-अपनी विशिष्टता का नाश भी हुआ है।
साथ ही, यह तमाम राजकीय शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता के विरुद्ध भी है। वे सभी अब लाचार होकर ऊपर शासकीय नेताओं, उन के अफसरों, क्लर्कों के लिए गये निर्देश के अनुसार सब कुछ करने के लिए विवश कर दिए गये हैं! इस तरह, इस केंद्रीकरण में शिक्षकों और विद्वानों की पूरी उपेक्षा भी कर दी गई है — मानो वे अपनी शिक्षा संस्थाएं चलाने, उस के लिए योग्य छात्रों के चयन और मूल्यांकन करने के भी योग्य नहीं हैं। किस की सलाह से इस तरह का केंद्रीयकरण हुआ, यह अल्लाह जानता है!
एक तरह से परीक्षाओं का केंद्रीकरण शिक्षकों, जानकारों, विद्वानों पर अविश्वास, तथा सब कुछ बाबुओं, क्लर्कों के सिर पर सब कुछ लादने, छोड़ने जैसा है। वह भी अंधाधुंध, हर तरह के विषय, संस्थान, आदि के लिए प्रश्न-पत्र बनाना और उन की लाखों उत्तर पुस्तिकाओं को जाँचना — सब कुछ ऑनलाइन — व्यवहारत: एक पूरी तरह गैर-जबावदेह व्यवस्था है। क्योंकि एक तरफ, किसी भी गड़बड़ी से हजारों या लाखों छात्र प्रभावित हो जाएंगे, जबकि जिम्मेदारी किसी की नहीं बनेगी! क्योंकि हर कहीं मशीन और ठेके के लोग शामिल हैं, जिन्हें डिसमिस कर देने से कुछ नहीं निकलता। क्योंकि व्यवस्था तो वही, मानवीय तत्व विहीन, है! अतः यह सब संकीर्ण बुद्धि लोगों की फूहड़ कल्पना और जिद लगती है। जो कुल मिलाकर शिक्षा की हानि है।
तुलना में, यहाँ ब्रिटिश राज मानवीय तत्व पर अधिक भरोसा करता था। शायद इसलिए भी तब हर क्षेत्र में भारतीयों के बीच अधिक गुणवत्ता विकसित हुई थी। चाहे यह एक अनुमान है, किन्तु परखने योग्य है। उस की तुलना में आज देसी राज सब पर संदेह करता है। देश से अधिक दल, दल से भी अधिक गुट, गुट में भी दो-चार लोग। यही देसी शासकों के भरोसे और विश्वास का दायरा है! ऐसा व्यापक अविश्वास बहुत कुछ चौपट कर रहा है। विशेषकर शिक्षा, संस्कृति और धर्म के क्षेत्र में। यह सब नीयत की बात नहीं, ठोस परिणाम के पड़ताल का मामला है।
आज शिक्षा क्षेत्र की हालत यही है कि कह सकते हैं: मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की! तनिक विस्तार से देखें तो लगता है कि हमारे शासकों के लिए शिक्षा नहीं, परीक्षा और डिग्री बाँट देना महत्वपूर्ण है। बच्चों, किशोरों की बौद्धिक, शारीरिक, आध्यात्मिक आवश्यकताएं नहीं, स्कूल-कॉलेज प्रबंधन के लिए सुभीता होना अधिक महत्वपूर्ण है (सुबह सात बजे से स्कूल शुरु होना बच्चों के स्वास्थ्य और दिनचर्या के विरुद्ध है, यह केवल प्रबंधन की सुविधा के लिए है! वरना तमाम सरकारी आफिस, मंत्रालय, आदि भी क्यों नहीं सुबह सात बजे से कर दिए गये?)। सो, उसी क्रम में, शिक्षा के उद्देश्य में व्यक्तित्व नहीं, केवल खानापूरी करके धनार्जन महत्वपूर्ण है। विद्वान और जानकार नहीं, केवल सत्ताधारी नेता और दलीय कार्यकर्ता महत्वपूर्ण हैं जो आज शिक्षा संस्थानों के असली निर्देशक बन गये हैं।
सो, आज शिक्षा में शिक्षक नहीं, बल्कि बाबू, ठेकेदार, एवं पार्टीबंदी महत्वपूर्ण हैं। अच्छा शासन करना नहीं, सारे चुनाव जीतना अधिक महत्वपूर्ण है। उसी तरह, जीवन में भी सच्चाई नहीं, आडंबर महत्वपूर्ण है। पढ़ाने-लिखाने, पत्रिकाओं-पुस्तकों, गोष्ठी सेमिनारों में भी सत्य नहीं, प्रोपेगंडा महत्वपूर्ण है। हर सामाजिक क्षेत्र में उपलब्धि नहीं, उस की भंगिमा, उल्टा-सीधा आँकड़ा बनाना महत्वपूर्ण है। विद्वत-जन नहीं, आईटी-सेल महत्वपूर्ण है। (बड़े नेता ने सत्ता मिलने पर यही आईटी सेल बनाए, जानकारों की सलाहकार समिति नहीं)।
सो, किसी क्षेत्र में गड़बड़ी बढ़ जाने, और हल्ला मचने पर भी, उचित भूल-सुधार नहीं, बल्कि गलत निर्णय करने वाले की कुर्सी बचाना महत्वपूर्ण है। आज तरह-तरह की गलती खुद करने वाले ही दूसरों को ‘माफ करने’ का दंभ भरते हैं! मानो, वे तो दूध के धुले संन्यासी हैं जिन से कोई पाप, अपराध, लापरवाही, गलती होने की बात असंभव है। जबकि असलियत यह है कि वे मीडिया का सामना नहीं करते। उचित सवालों का भी उत्तर नहीं देना चाहते, या देना नहीं जानते। अपने फैसलों की भी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते।
बहरहाल, पूरे देश के विभिन्न संस्थानों में प्रवेश, विभिन्न तरह की परीक्षाओं, प्रतियोगी परीक्षाओं, आदि को एक जगह केंद्रित करने का फैसला किस समझ से किया गया, यह कौन जानता है? पर यह अविवेकपूर्ण फैसला था। इस के सभी पहलुओं पर विचार करें तो पूरा अधम्मपद बन जाएगा! भोली कल्पनाओं की पूरी श्रृंखला — जो मुख्यतः इसलिए बनी, क्यों कि स्वतंत्र भारत में शिक्षा का क्षेत्र गरीब की जोरू बना दी गई है। उस से ठीक शिक्षक और विद्वान ही मानो निष्कासित कर दिये गये हैं।
यानी, शिक्षा के मामले में कोई भी ताकतवर, साधनवान, अहंकारी, उच्छृंखल, लोभी, मूढ़, आदि जो चाहे कुछ मजाक कर सकता है। यह लंबे समय से चल रहा है। शिक्षा संबंधी निर्णय दशकों से ऐसे लोग लेते रहे हैं जिन्हें वस्तुत: शिक्षा की सच्ची समझ तक नहीं रही है! उन निर्णयकर्ताओं में कोई शिक्षा को आगे चल कर नौकरी पाने का जरिया भर; तो कोई राजकर्मचारी बनाना भर; तो कोई रोजगारी तकनीकी प्रशिक्षण देना-पाना भर; तो कोई सिर्फ औपचारिक डिग्री-डिप्लोमा देना भर; तो कोई विदेश जा बसने का साधन भर; तो कोई पैसे बनाने का व्यापार भर; तो कोई उसे अपना राजनीतिक मतवाद, प्रमाद फैलाने का साधन भर; आदि समझते रहे हैं।
आज की यह स्थिति किसी भी आम अफसर, नेता, स्कूल प्रबंधक, या माता-पिता से भी बात कर के परखी जा सकती है। यह बात कि वे उपर्युक्त किसी न किसी चीज को ही ‘शिक्षा’ समझते हैं। यद्यपि उक्त परिणाम या उपलब्धियाँ शिक्षा संस्थानों से तैयार होकर निकलने वालों को मिलती रही हैं — पर शिक्षा वही नहीं है। वह एक वृहत,अधिक महत्वपूर्ण गतिविधि है। हर बच्चे के जीवन की एक आधारभूत गति उस की शिक्षा है। किन्तु जिस के प्रति नासमझी से ही स्वतंत्र भारत में वह गरीब की जोरू बन गई है। सो हर कोई शिक्षा संबंधी नीति, दस्तावेज तक बना सकता है! जो कोई चाहे, उस पर भाषण और फतवे देने लग सकता है। जिस किसी को शिक्षक बना दिया जा सकता है। जो चाहे, एक स्कूल या विश्वविद्यालय खोल सकता है। उन के स्तर, उद्देश्य, और परिणाम देखने वाला कोई नहीं।
उसी क्रम में, जिस किसी को कोई डिग्री दी जा सकती है! जिस किसी को कहीं भी प्रवेश दिया जा सकता है! जिस किसी को सरकारी स्कूल में किसी विषय के शिक्षक का पद दिया जा सकता है, चाहे उसे उसी विषय की परीक्षा में सौ में मात्र तीन नंबर मिले हों! यानी, किसी को कहीं पद, प्रवेश या नियुक्ति देने के लिए योग्यता का आधार उस की वास्तविक योग्यता नहीं — बल्कि कोरी कागजी
साभार- https://www.nayaindia.com/ से
(लेखक परिचय- हिन्दी लेखक और स्तंभकार। राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। कई पुस्तकें प्रकाशित, जिन में कुछ महत्वपूर्ण हैं: 'भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहासलेखन', 'गाँधी अहिंसा और राजनीति', 'इस्लाम और कम्युनिज्म: तीन चेतावनियाँ', और 'संघ परिवार की राजनीति: एक हिन्दू आलोचना'।)




