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हर बेईमान अफसर एक आतंकवादी या अपराधी पैदा कर देता है

आज से लगभग साढ़े चार दशक पूर्व मणिपुर के एक बेहद गरीब परिवार में जन्मा विश्वेश्वर सिंह अपने माँ-बाप का एकलौता पुत्र था। किसी तरह अभावों में पढ़ाई पूरी करने के बाद वो आजीविका की तलाश में घर से निकला।

उसके बारे में जानने वाले लोग कहतें हैं कि एक अति सामान्य दर्जे की सरकारी नौकरी के एवज में एक अधिकारी ने बतौर रिश्वत उससे दस हज़ार रूपए मांगे, जिसे देना उसके लिए प्रायः असम्भव था। अधिकारी के रिश्वतखोरी की प्रवृति ने उस युवा को एक सामान्य नौकरी से भी वंचित कर दिया और इस गुस्से में उसने इसके खिलाफ कुछ करने की ठान ली, अपने ही तरह भ्रष्टाचार के शिकार कुछ युवकों को इकठ्ठा किया और तिब्बत जाकर चाइनीज युद्ध पद्धति सीखने की योजना बनाई और इसी क्रम में वो गोरखपुर के रास्ते नेपाल होते हुए तिब्बत की राजधानी ल्हासा पहुँच गया। वहां चीन के सैनिकों को विश्वेश्वर के रूप में भारत से लड़ने का एक हथियार मिल गया। उन लोगों ने विश्वेश्वर सिंह और उसके साथियों का जबर्दस्त स्वागत किया, उन्हें अपनी युद्ध पद्धति सिखाई फिर ये बताया कि कैसे हथियार इकट्ठा करना है और पैसों के लिए कैसे बैंकों को लूटना है।

एक साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद विश्वेश्वर सिंह अपने साथियों के साथ वापस मणिपुर लौट आया पर अब वो किसी चतुर्थ श्रेणी के सरकारी नौकरी का याचक न होकर भारत की समूची राजसत्ता और व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़ा एक आतंकवादी बन चुका था। यहाँ आकर उसने चीन के वरदहस्त से 25 सितंबर 1978 को People’s Liberation Army (PLA) नाम के एक आतंकी संगठन का गठन किया। उसके संगठन ने अपने जन्म के पहले ही दिन से अपनी हिंसक गतिविधियों को अंज़ाम देना शुरू कर दिया। वहां के सैकड़ों पुलिस थानों और बैंको को लूटा, सरकारी अधिकारियों और व्यापारियों का अपहरण किया और उसके एवज में फिरौती की मोटी रकम वसूली और इन तरीकों से उसने अपने मणिपुर और नागालैंड के निकटवर्ती कुछ जिलों में अपने संगठन का विस्तार किया। शायद ही कोई दिन गुजरता होगा जिस दिन इस संगठन ने किसी वारदात को अंजाम न दिया हो।

इसने भारत के बाहर मयांमार और बांग्लादेश तक में अपने आतंकी कैंप बना लिये। मणिपुर के तैनात हमारे हमारे कई जवानों की निर्मम हत्या इस संगठन ने की, मणिपुर के प्रायः हर बैंक को लूटा और आज भी इस संगठन की काली छाया पूरे मणिपुर पर प्रकोप रूप में छाई हुई है; इतना ही नहीं विश्वेश्वर के नक़्शे कदम पर चलते हुए देखते-देखते मणिपुर में 23 के करीब और आतंकी संगठन खड़े हो गये। आज मणिपुर की अशांति के पीछे की मुख्य वजह विश्वेश्वर सिंह का ये संगठन ही है, विश्वेश्वर सिंह तो अब इस दुनिया में नहीं है पर उसके संगठन की गतिविधियों में कोई कमी नहीं आई है। हमारी सरकार को वहां शांति बनाये रखने के लिए हर साल अरबों रूपए खर्च करने पड़ते हैं और इसी के संगठन के दुष्प्रचार के चलते मणिपुर में भारत विरोधी भावनाएं चरम पर रही। इन आतंकी संगठनों का उपयोग विस्तारवादी मिशनरियों ने और आईएसआई ने भी किया।

इसे लिखने का मकसद विश्वेश्वर सिंह के प्रति सहानुभूति पैदा करना या उसके कृत्य को उचित ठहराना कतई नहीं है, न ही ये है कि उसके आतंकी बनने के पीछे की वजहों की तफ्शीश की जाये। मकसद ये बताना है कि देश के अंदर अगर एक भी अधिकारी नैतिकता छोड़कर अपनी वर्दी की आड़ में रिश्वत मांगता है या किसी को पीड़ित, प्रताड़ित या अपमानित करता है तो उसका परिणाम कितना भयंकर हो सकता है।

अंग्रेजों के समय के इसी राजशाही वाली लालफीताशाही से गांधी डरते थे कि इनके पावर की हनक देश में नवीन समस्याओं को जन्म देगी। इसीलिए कई चिंतकों ने कहा था कि 15 अगस्त, 1947 को केवल सत्ता का हस्तांतरण हुआ था और एक बड़े शायर ने कहा था :-
जितने हरामखोर थे कप्तान बन गए
शैतान एक रात में इंसान बन गए
किसी के स्वाभिमान को मत ललकारो, किसी का अपमान मत करो और वर्दी धारण करने से पहले सामान्य मानवीय व्यवहार सीखो वरना हम अभी भी यही समझेंगे कि न अंग्रेज गये हैं और न ही अंग्रेजियत।

साभार- https://www.facebook.com/LaurelHighConventSchool/ से

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