चालीस साल बाद मिलीं दो सगी बहनें — किस्मत भी कभी-कभी ऐसा खेल खेलती है कि भगवान भी मुस्कुरा दें
सोचिए ज़रा…
एक ही माँ की दो बेटियाँ। दोनों अभी ठीक से दुनिया देखना भी नहीं सीख पाई थीं कि ज़िंदगी ने उन्हें ऐसी ठोकर मारी कि दोनों अलग-अलग अनाथालयों में पहुँच गईं। न माँ का आँचल, न पिता की उँगली, न घर का आँगन… बस एक पालना, कुछ अनजान चेहरे और इंतज़ार।
यह बात आज से करीब चालीस साल पहले की है।
भारत के किसी अनाथालय में दो नन्हीं बच्चियाँ थीं। शायद उन्हें खुद भी नहीं मालूम था कि उनकी एक सगी बहन इसी दुनिया में कहीं और है। फिर एक दिन किस्मत ने दोनों को अलग-अलग रास्तों पर भेज दिया। नीदरलैंड्स के दो अलग-अलग परिवार आए, दोनों बच्चियों को गोद लिया और अपने साथ विदेश ले गए।
अब सोचिए, दोनों एक ही देश में थीं… लेकिन एक-दूसरे से अनजान।
एक डच परिवार में पली, दूसरी भी डच परिवार में पली। दोनों ने डच भाषा सीखी, वहीं के स्कूलों में पढ़ीं, वहीं के त्योहार मनाए। लेकिन दिल के किसी कोने में एक खाली जगह हमेशा बनी रही। जैसे कोई अपना कहीं छूट गया हो।
वक्त बीतता गया। दोनों जवान हो गईं।
एक बार गोद लिए गए बच्चों के एक कार्यक्रम में उनकी मुलाकात हुई। पहली बार जब आमने-सामने आईं, तो लोगों ने कहा — “अरे, तुम दोनों तो एक जैसी लगती हो! क्या बहनें हो?”
दोनों हँस पड़ीं। बोलीं — “नहीं-नहीं, बस चेहरा मिलता होगा।”
लेकिन अजीब बात यह थी कि दोनों को एक-दूसरे के साथ ऐसा अपनापन महसूस होता था, जिसे शब्दों में समझाया नहीं जा सकता। मज़ाक-मज़ाक में वे एक-दूसरे को “सिस” कहकर बुलाने लगीं।
फिर ज़िंदगी की भागदौड़ ने उन्हें दोबारा अलग कर दिया। संपर्क टूट गया। साल बीत गए। फिर दशक बीत गए।
उधर दोनों के मन में एक ही सवाल पलता रहा — “मैं आखिर हूँ कौन? मेरा अपना कौन है?”
अपनी जड़ों की तलाश में दोनों ने अलग-अलग रहते हुए MyHeritage नाम की वेबसाइट पर DNA टेस्ट करवाया। शायद उन्हें उम्मीद भी नहीं थी कि कुछ मिलेगा।
लेकिन जिस दिन रिपोर्ट आई, उस दिन विज्ञान ने वह कर दिखाया जो किस्मत ने चालीस साल तक छिपाकर रखा था।
स्क्रीन पर लिखा था — 100% Biological Sisters.
यानी वे सचमुच सगी बहनें थीं।
जब दोनों नीदरलैंड्स के डेन बॉश शहर में दोबारा मिलीं, तो कोई शब्द नहीं था। बस आँसू थे। दोनों एक-दूसरे से ऐसे लिपट गईं जैसे चालीस साल का बिछोह उसी एक पल में पिघल गया हो।
एक बहन रोते-रोते बोली — “तुम्हें देखकर ऐसा लग रहा है जैसे मैं बरसों बाद अपने घर लौट आई हूँ।”
सोचिए, दुनिया कितनी बड़ी है। इंसान कितनी दूर चला जाता है। लेकिन खून का रिश्ता… वह अपना रास्ता ढूँढ़ ही लेता है।
इसलिए कहते हैं — जिसे भगवान मिलाना चाहता है, उसे पूरी दुनिया भी अलग नहीं रख सकती।




