2 करोड़ के बजट में बनी फिल्म हनुमान अंश ने टॉक्सिक से लेकर आवारापन 2 तक की छुट्टी कर दी है। नीम करोली बाबा की जिंदगी पर बनी फिल्म ने करोड़ों का कारोबार करके फिल्म जगत में सनसनी मचा दी है। एक महीने में 122.13 करोड़ रुपये की शुद्ध कमाई की है। शुरुआत में यह फिल्म करीब 300 स्क्रीनों पर लगी थी, पर लोगों के बीच इसकी चर्चा फैलते ही स्क्रीनों की संख्या तेजी से बढ़कर 1,500 से ज्यादा हो गई है। अब सह-निर्माता अनुप्रिया नागर ने यह पुष्टि की है कि फिल्म का दूसरा भाग (सीक्वल) भी जल्द आएगा।

फिल्म के निर्माण से लेकर इसके पूरा होने तक और इसके सभी पात्रों से एक से एक रोमांचक घटनाएं जुड़ी हुई है, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। 15 दिन के प्रोडक्शन के बाद फिल्म फ्लोर पर गई, लेकिन कैमरा चलने का नाम ही नहीं ले रहा था। बाद में निर्देशक ने सभी को हनुमान चालीसा पढ़ने के लिए कहा। फिर जो सेट पर चमत्कार हुआ, उसका खुलासा खुद फिल्म के एक्टर और निर्देशक ने किया।

हनुमान अंश (Hanuman Ansh)के निर्देशक विशाल चतुर्वेदी और शोभिनव सत्या ने  मीडिया से चर्चा करते हुए बताया कि  "पहले दिन हमारे जो लीड एक्टर थे उनकी तबीयत खराब हो गई थी। सेट पर लगातार परेशानी आ रही थी। दूसरे दिन से जब मैं (शोभिनव सत्या) आया तो हम सुबह 7 बजे की शिफ्ट में पहुंचे हैं, तो 3 घंटे तक कैमरा रोल ही नहीं हो रहा है।

शूटिंग के दौरान अड़चने आ ही रही थीं। इसके बाद तय किया गया कि  सभी मिलकर  हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं।  पाठ पूरा होने के बाद जैसे ही शूटिंग शुरु हुई सब-कुछ व्यवस्थित हो गया।

निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने कहा कि "हमने ये तय कर लिया था कि अगर शूट में कोई भी दिक्कत आएगी तो हम हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे।

हनुमान अंश के कलेक्शन की बात करें तो पहले वीकेंड पर सिर्फ 60 लाख रूपये कमाने वाली इस फिल्म ने घरेलू बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड से ज्यादा कमा चुकी है।

नीम करोली बाबा की अपनी एक अलग दुनिया थी। उनके पास न कोई चमकदार मंच था, न बड़े-बड़े प्रवचन, न अपने नाम का कोई साम्राज्य। वो अक्सर कंबल ओढ़े दिखाई देते थे। उनके आसपास बैठे लोग उन्हें महाराजजी कहते थे। और उनके बारे में जितनी कहानियां कही गईं, उनमें कुछ इतनी असाधारण थीं कि उन्हें सुनकर विश्वास और संशय के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।

उनका असली नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा बताया जाता है। पैदाइश उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव की है, करीब 1900 के आसपास। आज ये इलाका फिरोजाबाद जिले में है। शादी कम उम्र में ही हो गई, जैसा कि उस जमाने में चलन था। बाद में घर छोड़कर साधु बन गए। लेकिन उन साधुओं जैसा नहीं, जो हमेशा के लिए घर-परिवार से कट गए।

जीवन के एक दौर में वो वापस घर लौटे। गृहस्थ जीवन भी जिया। उनके दो बेटे और एक बेटी हुए। यही चीज उनकी शख्सियत को और दिलचस्प बनाती है। उनका जीवन उत्तर भारत के गांवों, कस्बों और धार्मिक स्थलों के बीच घूमते हुए बीता। लोग उन्हें अलग-अलग नामों से जानते थे। कहीं लक्ष्मण दास, कहीं नीब करौरी बाबा, कहीं महाराजजी। बाद में 'नीम करौली बाबा' नाम इतना मशहूर हुआ कि वही उनकी पहचान बन गया।

एक बार बाबा ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। टिकट नहीं था। रेलवे कर्मचारी ने उन्हें उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद इलाके में स्थित नीब करौरी के पास ट्रेन से उतार दिया। बाबा नीचे उतरकर एक जगह बैठ गए। इसके बाद ट्रेन को चलाने की कोशिश हुई, मगर वो आगे नहीं बढ़ी।

कहानी यहीं से चमत्कार का रूप लेती है। बताया जाता है कि रेलवे अधिकारियों को जब पता चला कि बाबा को उतारने के बाद ही ट्रेन रुक गई है, तो वे उनके पास पहुंचे और दोबारा ट्रेन में बैठने का आग्रह किया। बाबा वापस ट्रेन में बैठे और परंपरा के मुताबिक ट्रेन चल पड़ी। अब असल बात जो भी रही हो, मगर नीम करौली बाबा नाम ही उनकी पहचान बना।

लेकिन इस शख्स को समझने के लिए उसके नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसका तरीका।

नीम करौली बाबा ने अपने लिए कोई जटिल दर्शन नहीं बनाया। उनके आश्रमों में हनुमान की उपासना केंद्रीय रही। लेकिन उनका जोर केवल पूजा पर नहीं था। उनके अनुयायी उनके संदेश को इस विचार से जोड़ते हैं कि अगर भगवान को हर जगह देखना है तो मनुष्य की सेवा भी उसी भावना से करनी होगी।

उनके पास आने वाला आदमी चाहे गरीब हो या अमीर, भारतीय हो या विदेशी, पढ़ा-लिखा हो या बिल्कुल साधारण... उनकी परंपरा में सबके लिए जगह थी। यह बात सुनने में साधारण लगती है। लेकिन 1960 और 1970 के दशक में पश्चिम से भारत आने वाले उन युवाओं के लिए, जो अपने समाज की भौतिक समृद्धि के बावजूद भीतर से खालीपन महसूस कर रहे थे, यह तजुर्बा बहुत बड़ा था।

एक दिन अमेरिका से एक आदमी भारत आया... रिचर्ड अलपर्ट।

अलपर्ट कोई आम सैलानी न था। वो हार्वर्ड विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान पढ़ा चुका था। साथी प्रोफेसर टिमोथी लैरी के साथ कुछ खास नशीले पदार्थों पर प्रयोग किया कि उनका दिमाग पर क्या असर होता। उनका सवाल था कि इन चीजों को लेने के बाद इंसान के दिमाग, सोचने के तरीके और आसपास की दुनिया को देखने के अनुभव में क्या बदलाव आता है। लेकिन, फिर प्रयोग विवादित होने लगे। दोनों को हार्वर्ड से निकाल दिया गया।

हार्वर्ड से अलपर्ट का रिश्ता खत्म हुआ। वो उस दौर की आध्यात्मिक बेचैनी के बीच भारत की ओर निकल पड़ा। 1967 में वह भारत पहुंचा। वो यहां किसी एक बाबा की तलाश में नहीं आया था। वह अपने भीतर किसी ऐसी चीज की तलाश में था जिसे पश्चिमी शिक्षा और मनोविज्ञान उसे पूरी तरह नहीं दे पा रहे थे। भारत हमेशा पश्चिम में विज्ञान से ज्यादा अपने अध्यात्म और दर्शन के लिए मशहूर रहा है।

यात्रा के दौरान अलपर्ट की मुलाकात नीम करौली बाबा से हुई। फिर अलपर्ट वो शख्स नहीं रहा, जो भारत आया था। बाबा ने उसे 'राम दास' नाम दिया यानी भगवान का सेवक। यहीं से कहानी भारत की पहाड़ियों से निकलकर अमेरिका की चेतना में प्रवेश करती है।

राम दास बाद में लिखा कि वो अपने गुरु यानी बाबा नीम करौली के साथ बहुत लंबा समय नहीं रहे। उनकी अपनी वेबसाइट के मुताबिक, नवंबर 1967 से मार्च 1968 के बीच उन्होंने महाराजजी के आसपास समय बिताया। कुल मिलाकर शायद कुछ घंटे ही सीधे उनके साथ रहे। लेकिन उन कुछ घंटों का असर इतना गहरा था कि उससे एक किताब पैदा हुई... 'Be Here Now'.

ये किताब 1971 में छपी। और पश्चिमी दुनिया में एक तरह से आध्यात्मिक सनसनी बन गई।

बाबा नीम करौली से संबंधित वैसे तो बहुत सी चमत्कारी घटनाएं प्रचलित हैं लेकिन मुझे एक ऐसी चमत्कारिक घटना स्वयं उस व्यक्ति ने बताई जो उस घटना का एक साक्षी था.

लखनऊ में लखनऊ विश्वविद्यालय के पास गोमती के किनारे हनुमान जी का एक मंदिर है और इसलिए गोमती पर यहाँ बने उस पुल को हनुमान सेतु कहा जाता है. ऐसा बताया जाता है कि यह मंदिर वही है जहां लखनऊ प्रवास के दौरान कभी बाबा नीम करोली की कुटिया हुआ करती थी और क्योंकि वह स्वयं हनुमान जी के परम भक्त थे इसलिए उन्होंने ही इस हनुमान मंदिर की स्थापना की थी. आज इस हनुमान सेतु मंदिर मैं हनुमान जी के साथ साथ बाबा नीम करोली का भी मंदिर है. मंदिर का रखरखाव एक ट्रस्ट करता है जो बहुत ही अच्छा काम कर रहा है इसलिए मंदिर का न केवल लगातार विस्तार हो रहा है बल्कि इसे भव्य स्वरूप भी दिया जा रहा है.

फेसबुक पर एक यूज़र https://www.facebook.com/rakesh3kr लिखते हैं-

" एक चमत्कारिक घटना स्टेट बैंक के एक अधिकारी के साथ घटी है. उन्हें बहुत खतरनाक जोंडिस (पीलिया) हो गया था. अधिकारी का परिवार पाकिस्तान से विस्थापित होकर आया था और उनके परिवार में माता पिता गुजर चुके थे, केवल एक बहन थी जो मुंबई में रहती थी.

उस अधिकारी को मुंबई के केजीएमसी (किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज) में भर्ती कराया गया लेकिन 10 दिन के बाद भी उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. अंत में मेडिकल कॉलेज से उन्हें एसजीपीजीआई (संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेस) रिफर कर दिया गया. यहां भी उनका इलाज चलता रहा लेकिन उनकी हालत निरंतर बिगड़ती जा रही थी. वह आईसीयू में भर्ती थे इसलिए घरवालों और उन्हें देखने आने वालों को भी बहुत असुविधा होती थी. विजिटिंग आवर में सिर्फ एक आदमी जा सकता है. उनकी पत्नी और उनके बड़े साले दिन भर इंतजार करते तब दिन में दो बार उन्हें देख पाते थे. उनकी हालत इतनी खराब हो गई थी कि उन्होंने घर के लोगों को पहचानना भी बंद कर दिया था और तकलीफ के समय हाथ से इशारा करते थे.

जब उनके घर वालों ने डॉक्टर से पूछा तो लगभग सभी ने कहा कि इनका बचना संभव नहीं है. लीवर ने काम करना बंद कर दिया है सिरम बिलुरुबिन का लेवल बहुत बढ़ गया है और उसका असर दिमाग पर भी होने लगा है. इनके पास 2 या 3 दिन से ज्यादा समय नहीं बचा है इसलिए अगर आप चाहे तो इन्हें घर ले जा सकते हैं और अपने संतोष के लिए इनकी आखिरी इच्छाएं पूरी कर सकते हैं. घरवालों ने उन्हें डिस्चार्ज करवा लिया और उन्हें लेकर फैजाबाद चले गए जहां उनकी हालत और बिगड़ती गई.

उन्हें देखने के लिए उसी रात उनके छोटे साले भी मुंबई से आ गए. उनके परिवार में वही सबसे ज्यादा पढ़े लिखे और समझदार व्यक्ति माने जाते थे. वह अपने बड़े भाई पर इस बात के लिए बहुत नाराज हुए कि उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज करवा कर घर नहीं ले आना चाहिए था. "हम इन्हें यों तिल तिल कर मरता हुआ नहीं देख सकते. यह बचें न बचें , ईश्वर की इच्छा लेकिन हम आखरी सांस तक प्रयास करेंगे, इनका इलाज करवाएंगे. कम से कम हमें पूरी जिंदगी है पछतावा नहीं रहेगा कि हमनें प्रयास नहीं किया."

सुबह जल्दी से ही एक एंबेस्डर कार में उनको लिटाकर उनके दोनों साले और पत्नी लखनऊ के लिए रवाना हो गए . लखनऊ से करीब 40 किलोमीटर पहले उनकी हालत बहुत खराब हो गई और उन्होंने हाथ के इशारे से ही जमीन पर लिटाने के लिए इशारा किया. कार रुकवाई गई उनके दोनों साले उन्हें उठाकर सड़क के किनारे पेड़ के नीचे लेटाने के लिए चल दिए. उनकी पत्नी उनके पीछे थी. तभी एक साधु बाबा सामने आए और हाथ फैला कर कुछ देने के लिए कहा . उनका छोटा साला बहुत नाराज हो गया और बोला कि "तुम्हें दिखाई नहीं पड़ता है कि हम लोग इतनी परेशानी में है और तुम इस समय मांग रहे हो."

उनकी पत्नी रोती हुई उनके पीछे थी उसने अपने भाई को रोका और उन साधु बाबा के हाथ में कुछ पैसे रुपए रख दिए. साधु बाबा ने पूछा "क्या हुआ है."

पत्नी ने पूरी राम कहानी रोते-रोते सुना दी. साधु बाबा ने कहा कि इन्हें कुछ नहीं होगा चिंता मत करो और उन्होंने सड़क के किनारे से एक छोटा सा कंकड़ उठाकर सड़क के बीचो-बीच कुछ लिख दिया जो उनकी पत्नी के अनुसार 2 ( अंक) था.

उन्होंने कंकड़ उनकी पत्नी को देकर कहा कि "यह इनकी जीभ में लगा कर चटवा दो , यह ठीक हो जाएंगे. चिंता मत करो मैं अभी यहीं बैठा हूं .अगर इनकी हालत और बिगड़े तो मुझे बताना "

यह कहते हुए थोड़ी दूर जाकर वह स्वयं एक पेड़ के नीचे बैठ गए. उनकी पत्नी हर तरफ से निराश हो चुकी थी इसलिए उन्हें ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं हुआ और उन्होंने वह कंकड उनकी जीभ में लगाया. इसके बाद वह मरीज सो गया . घर के लोग बीच-बीच में यह चेक करने के लिए वह जीवित हैं, उनकी नब्ज और सांसे चेक करते रहे. एक डेढ़ घंटे बाद वह उठ कर बैठ गए और उन्होंने पूछा कि "हम लोग कहां जा रहे हैं? "

सब लोगों ने बताया कि कि वे लोग लखनऊ जा रहे हैं ताकि उन्हें किसी अस्पताल में दिखाया जा सके. सभी लोग बहुत हैरान थे कि जो व्यक्ति पिछले कई दिन से बोल भी नहीं पा रहा था, कमजोरी के कारण जिसे हिलने ढूंढने में भी दिक्कत होती थी, वह अपने आप उठ कर बैठ गया और बात कर रहा है. फिर उसने पानी मांगा और कुछ खाने के लिए भी. जो भी कुछ उन के पास था, वह दिया गया. सभी आश्चर्यचकित थे . इस बीच सभी को उन साधु बाबा की याद आई, जिन्होंने कंकड़ जीभ पर रखने के लिए दिया था और जो थोड़ा आगे पेड़ के नीचे बैठे थे. देखा गया वह वहां नहीं थे. सभी ने इधर-उधर बहुत खोजा लेकिन वह साधु बाबा नहीं मिले.

अंत में वे सभी लोग लखनऊ आए और एक निजी चिकित्सक को दिखाया गया. चिकित्सक को उनमें कमजोरी के अलावा कोई भी असामान्य बात नहीं लगी. उनके टेस्ट कराए गए लेकिन आश्चर्य की बात कि सभी टेस्ट सामान्य निकले . उन्हें चलने फिरने में भी कोई दिक्कत नहीं थी. सब लोग बहुत प्रसन्न थे और उनकी प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं थी. फिर जैसा कि होता है वह लोग लखनऊ के प्रमुख मंदिरों में पूजा पाठ के लिए गए और इसी क्रम में इस हनुमान मंदिर में भी आए. जब उन्होंने वहां बाबा नीम करौली की फोटो लगी देखी तो चौंक गए.

"यह तो उन्हीं की फोटो है," उनकी पत्नी ने आश्चर्यचकित होकर कहा. उन लोगों में से कोई भी उस समय तक बाबा नीम करौली को नहीं जानता था और न ही उसके पहले उनकी फोटो ही देखी थी. पहली बार उन लोगों ने विस्तार से बाबा नीम करोली के बारे में जाना और समझा. बाबा नीम करौली के चमत्कार के रूप में यह घटना भी जुड़ गई."

मैंने अपने उन सहकर्मी से पूछा कि "स्टेट बैंक के वह अधिकारी कौन थे ?"

वह पुनः गंभीर हो गए और कुछ रुक कर बोले, " वह व्यक्ति मैं स्वयं हूं,लेकिन आप मेरा नाम किसी को भी कृपया मत बताएगा "

द्वितीय महायुद्ध की बात है। झाँसी के सिविल सर्जन बाबा नीब करौरी के भक्त थे। उन दिनों बाबा उनके यहाँ ठहरे हुए थे। एक दिन भोजन के पश्चात् बाबा तख्त पर सो गए। सिविल सर्जन साहब ने बाबा के पास ही फर्श पर बिस्तर लगाया ताकि गत को अचानक बाबा को कोई जरूरत हो तो तुरंत सेवा कर सकेंगे।

रात एक बजे अचानक बाबा तड़पने लगे। सिविल सर्जन की नींद खुल गई। बाबा ने अपने शरीर से कम्बल उतारकर उन्हें देते हुए कहा—''इसे किसी जलाशय में फेंक आ।''

सिविल सर्जन ने कहा--''इतनी रात को कहाँ जाऊँगा?'' कल सबेरे फेंकवा दूँगा।'!

बाबा ने कहा—'नहीं, अभी ले जा।”!

बाबा की आज्ञा का उल्लंघन करने की हिम्मत सर्जन साहब को नहीं हुई। गैरेज से गाड़ी निकालकर चल दिये। जब वे लौटे तब सबेरा हो गया था। घर में प्रवेश करने पर उन्होंने देखा—बाबा प्रसन्न मुद्रा में सबसे बातचीत कर रहे हैं।

बाद में उन्होंने बाबा से कंबल बहाने का कारण पूछा।

बाबा ने कहा- “'तेरा जो लड़का फौज में है, कल वह जर्मन सैनिकों का सामना नहीं कर सका। उसकी टुकड़ी में भगदड़ मच गई। वह स्वयं भी भागा और पहाड़ की चोटी से नीचे कूद गया। नीचे दलदली जमीन थी, उसमें फँस गया। पहाड़ों के ऊपर से सैनिक गोलियों की बौछार करते रहे। बाद में उन लोगों ने सोचा कि अब तक वह मर गया होगा। जर्मन सैनिक ऊपर से ही वापस चले गए। वे सारी गोलियाँ मेरे कम्बल में आ गयी थीं। उसकी गर्मी मुझे परेशान कर रही थी। जब तूने कम्बल को पानी में बहाया तब शान्ति मिली।””

बाबा इस घटना का वर्णन इस तरह कर रहे थे जैसे घटनास्थल पर स्वयं मौजूद थे। रात की नींद खराब होने के कारण सिविल सर्जन साहब असंतुष्ट होकर भीतर चले गये। उन्होंने बाबा की बातों पर विश्वास नहीं किया।

बाबा के वापस जाने के दो सप्ताह बाद लड़के ने अपनी पत्नी के नाम पत्र लिखते हुए इस घटना का जिक्र किया। अन्त में लिखा, किसी दैवी-शक्ति के कारण मैं उस दिन जीवित बच गया। इस पत्र को पढ़ने के बाद सिविल सर्जन साहब दंग रह गए। मन ही मन अविश्वास के अपराध के लिए बाबा से क्षमा माँगते रहे।

सन्‌ 1940 ( अनुमानित ) के आसपास बाबा नैनीताल आए। यहाँ आकर आदत के अनुसार चारों ओर घूमते रहे। एक बार मनोर आये तो यहाँ का वातावरण उन्हें इतना पसन्द आया कि भविष्य में नैनीताल के भक्तों के यहाँ न रुक कर इस सुनसान स्थान में चले आते थे और किसी पेड़ के नीचे रात गुजारते थे। आगे चलकर यहाँ आश्रम तथा हनुमानजी का मंदिर बनवाने के कारण इस स्थान का नाम हनुमानगढ़ हो गया।

श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जिन दिनों उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे, उन दिनों बाबा की ख्याति सुनकर आपके सम्पर्क में आये थे। नैनीताल में बाबा से आपकी मुलाकात बराबर होती थी। आपने अपने एक संस्मरण में लिखा है—'नीब करौरी के बाबा हमेशा एक कम्बल ओड़े घूमा करते हैं। वे प्राय: नैनीताल आते हैं। यहाँ हनुमानगढ़ में ठहरते हैं। यह बात कोई नहीं जानता कि वे कहाँ से आते हैं और कहाँ चले जाते हैं। कोई उनका वास्तविक नाम तक नहीं जानता।"

अकबरपुर से बाबा आगरा आये। यहाँ भी बाबा के अनेक भक्त थे। वे एक भक्त के यहाँ ठहर गए। आपके दर्शन करने के लिए आपके भक्त डॉक्टर लक्ष्मीचन्द्र के साथ डॉक्टर सुरेशचन्द्र मेहरोत्रा भी आये हुए थे। इनकी शक्ल देखते ही बाबा ने कहा—"खाली हाथ क्‍या आया है, मिठाई खिला, हम मिठाई खाएँगे।''

तुरंत बाजार से मिठाई मँगवायी गयी। एक टुकड़ा खाने के बाद बाबा ने सारी मिठाई लोगों में बँटवा दी।

डॉ. मेहरोत्रा ने पूछ--“बाबा, किस खुशी में मिठाई बँटवायी गयी?

बाबा ने कहा—“तू बाप बन गया है, इस खुशी में।”'

यह बात सुनकर डॉ मेहरोत्रा विस्मित हुए। उनकी पत्नी गर्भवती थी और प्रसव के सिलसिले में इन दिनों मायके गई हुई है। बच्चे के पैदा होने की सूचना अभी तक उन्हें नहीं मिली है। ऊहापोह स्थिति में वे घर वापस आये तो इस आशय का तार प्राप्त हुआ कि उनकी पत्नी को लड़का हुआ है। बाबा नीब करौरी के अनेकों चमत्कारी घटनाएं लोगों में प्रचलित हैं जो कही सुनी जाती है |

युवावस्था में साधु के रूप में घूमते समय वे बिना टिकट ट्रेन में सवार थे। फर्रुखाबाद क्षेत्र के नीब करौरी (नीम करोली) गांव के पास टिकट न होने पर उन्हें उतार दिया गया। इसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। अधिकारियों के अनुरोध पर वापस बैठने के बाद ही ट्रेन चली। इसी घटना और उस स्थान से जुड़ाव के कारण वे नीब करौरी बाबा या नीम करौली बाबा के नाम से प्रसिद्ध हो गए। उन्हें हांडी वाले बाबा, तलैया बाबा, तिकोनिया बाबा और चमत्कारी बाबा जैसे नामों से भी जाना जाता था। बचपन में ही वैराग्य की ओर रुझान था। कुछ समय घर छोड़कर साधना की, बाद में परिवार के अनुरोध पर लौटे, फिर आध्यात्मिक पथ पर आगे बढ़े।

‘'हनुमान अंश’' देखने के बाद एक बात जरूर सोचने पर मजबूर करती है—नीम करोली बाबा का किरदार निभाने वाले शोबिनॉ सत्या आखिर इस फिल्म में आए कैसे?

कहानी काफी दिलचस्प है। शोबिनॉ सत्या इस फिल्म में एक्टर के तौर पर आए ही नहीं थे। वो फिल्म के सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर थे और शूटिंग से जुड़े दूसरे काम देख रहे थे। लेकिन फिल्म के लीड एक्टर की अचानक तबीयत खराब हो गई और पूरी कास्टिंग का मामला ही बदल गया।

निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की नजर शोबिनॉ पर गई। उन्हें लगा कि शोबिनॉ के चेहरे और व्यक्तित्व में नीम करोली बाबा से कुछ समानता है। फिर उनका ऑडिशन लिया गया, जो करीब पाँच घंटे तक चला।

और इसके बाद जो हुआ, वो वाकई काफी अलग कहानी है। जो आदमी एक दिन पहले तक फिल्म के पीछे काम कर रहा था, वही अगले दिन फिल्म का लीड एक्टर बन चुका था।

इंग्लैंड की प्रतिष्ठित 'यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ' से इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन करने वाली 21 वर्षिया अनुप्रिआ नागर के सामने स्विट्जरलैंड में एक शानदार नौकरी का सुरक्षित रास्ता था। लेकिन दिल में एक ही धुन थी—पूज्य नीम करोली बाबा के जीवन और शिक्षाओं पर फिल्म बनाना। फिल्म इंडस्ट्री से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था, न ही कोई बैकग्राउंड था।

उन्होंने यूके में 3-3 पार्ट-टाइम जॉब्स करके पाई-पाई जोड़ी और अपनी पूरी ज़िंदगी की बचत ₹2 करोड़ के बजट वाली फिल्म 'हनुमान अंश' में झोंक दी।

उस समय शायद कई लोगों को यह फैसला एक नासमझी भरा जोखिम लगा होगा।

अनुप्रिया नागर जब स्टीव जॉब्स पर कॉलेज असाइनमेंट तैयार कर रही थीं, तब उन्हें जॉब्स के नीम करोली बाबा से जुड़ाव का पता चला और इस खोज ने उनकी सोच की दिशा ही बदल दी। बाबा के विचारों से गहराई से जुड़ने के बाद जब वह स्वदेश लौटीं, तो उनकी मुलाकात फिल्म मेकर विशाल चतुर्वेदी से हुई, जो नीम करोली बाबा पर ही काम कर रहे थे। इसके बाद अनुप्रिया ने स्विट्जरलैंड में आर्ट इंडस्ट्री का अपना तय करियर छोड़कर विशाल के साथ हाथ मिलाया और बिना किसी सिनेमाई अनुभव के फिल्म 'हनुमान अंश' की को-प्रोड्यूसर बन गईं, जिसके बाद महज़ 2 करोड़ रुपये में तैयार हुए उनके इस पहले ही प्रोजेक्ट ने सिनेमाघरों में 100 करोड़ रुपये से अधिक का धुआंधार कारोबार करके हर किसी को चौंका दिया।

मगर जब फिल्म थिएटर्स में उतरी, तो बिना किसी भारी भरकम प्रचार के, सिर्फ दर्शकों की आँखों के आँसुओं और सच्ची आस्था के दम पर इसने दुनिया भर के 1,500 से अधिक स्क्रीन्स पर दस्तक दी और भारत में ₹100 करोड़ क्लब पार करके इतिहास रच दिया।

इसी फिल्म में पूर्णिमा तिवारी ने नीम करोली बाबा की पत्नी रामबेटी शर्मा का किरदार निभाया है। अपने सादगी भरे अंदाज और भावपूर्ण अभिनय से उन्होंने दर्शकों का ध्यान खींचा है।

पूर्णिमा तिवारी का फिल्मी सफर सिर्फ बड़े पर्दे तक सीमित नहीं है। वह टेलीविजन, वेब सीरीज और फिल्मों में काम कर चुकी हैं। उन्हें ‘प्यार की राहें’, ‘गुम है किसी के प्यार में’ और ‘चूना’ जैसे प्रोजेक्ट्स में देखा जा चुका है। इसके अलावा वह ‘लकीरें’, ‘हुरदंग’ और ‘रात अकेली है’ जैसी फिल्मों का भी हिस्सा रही हैं।

‘हनुमान अंश’ में रामबेटी के किरदार के लिए पूर्णिमा ने अपने लुक में बड़ा बदलाव किया। उनका फिल्मी अवतार सोशल मीडिया पर नजर आने वाली उनकी ग्लैमरस छवि से बिल्कुल अलग है। यही वजह है कि कई दर्शक उन्हें पहली नजर में पहचान भी नहीं पाए।

फिल्म में उनका किरदार नीम करोली बाबा की आध्यात्मिक यात्रा के शुरुआती दौर और उनके पारिवारिक जीवन का भावनात्मक पक्ष सामने लाता है। यही सादगी और संवेदनशीलता पूर्णिमा के अभिनय को खास बना रही है।

नीम करौरी बाबा का किरदार निभाने वाले शोबिनॉ सत्या आखिर इस फिल्म में आए कैसे?

शोबिनॉ सत्या इस फिल्म में एक्टर के तौर पर आए ही नहीं थे। वो फिल्म के सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर थे और शूटिंग से जुड़े दूसरे काम देख रहे थे। लेकिन फिल्म के लीड एक्टर की अचानक तबीयत खराब हो गई और पूरी कास्टिंग का मामला ही बदल गया।

निर्देशक विशाल चतुर्वेदी की नजर शोबिनॉ पर गई। उन्हें लगा कि शोबिनॉ के चेहरे और व्यक्तित्व में नीब करौरी बाबा से कुछ समानता है। फिर उनका ऑडिशन लिया गया, जो करीब पाँच घंटे तक चला।

और इसके बाद जो हुआ, वो वाकई काफी अलग कहानी है। जो आदमी एक दिन पहले तक फिल्म के पीछे काम कर रहा था, वही अगले दिन फिल्म का लीड एक्टर बन चुका था।

शोबिनॉ ने एक इंटरव्यू में बताया कि उस वक्त उन्होंने ज्यादा कुछ सोचने के बजाय खुद को बस समर्पित कर दिया। उनका कहना था कि उन्हें सिर्फ अपना काम करना था और बाकी सब बाबा पर छोड़ देना था।

और यहां कहानी थोड़ी और दिलचस्प हो जाती है।

शोबिनॉ का नीब करौरी बाबा से जुड़ाव कोई फिल्म मिलने के बाद शुरू नहीं हुआ था। वो कई सालों से बाबा से जुड़े हुए हैं, काफी समय से शाकाहारी जीवन जी रहे हैं और 2018 से मंगलवार का व्रत भी रखते हैं। यानी जिस किरदार को निभाने का मौका उन्हें अचानक मिला, उससे जुड़ी कई चीजें उनके जीवन में पहले से ही आती चली गई थीं।

लेकिन अगर शोबिनॉ की बताई बातों को वैसे ही मानें, तो ऐसा लगता है जैसे किसी किरदार में आने की तैयारी फिल्म शुरू होने से कई साल पहले ही शुरू हो गई थी।

शोबिनॉ इस पूरे घटनाक्रम को एक तरह का चमत्कार मानते हैं। उनका मानना है कि शायद बाबा ने उन्हें इस किरदार के लिए पहले से तैयार किया था।

फिल्म के भजन गायक सुनील लोधी फिल्म का हिस्सा कैसे बने....

जिसकी आंखों ने कभी सूरज की रोशनी नहीं दिखी, बुंदेलखंड के उस 25 वर्षीय 'सूरदास' सुनील लोधी की आवाज आज पूरे देश में गूंज रही है। रास्ता भटकने पर भंवरे की गूंज से घर पहुंचने वाले सुनील का भजन ‘मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान...’ अब बॉलीवुड फिल्म ‘हनुमान अंश’ का मुख्य गीत बन चुका है, जिस पर इंस्टाग्राम पर लाखों रील्स बन रही हैं। मध्यप्रदेश के सागर के छोटे से गांव अगरा के सुनील लोधी की जिंदगी सिर्फ सुरों की नहीं, बल्कि चमत्कारिक विश्वास की मिसाल है। सुनील बताते हैं कि एक बार वे गांव के नाले के पास रास्ता भटक गए थे। जब उन्होंने हारकर ईश्वर से शिकायत की, तभी एक भंवरा उनके कान के पास मंडराने लगा। सुनील ने भंवरे की आवाज की दिशा पकड़ी और सही-सलामत घर पहुंच गए। इसी अटूट भक्ति ने उनके भजनों में वह रूहानियत भरी, जिसने आज करोड़ों दिलों को छू लिया है।

उनके प्रमुख आश्रमः

  • कैंची धाम (नैनीताल,उत्तराखंड) – 1964 में स्थापित, हनुमान मंदिर सहित सबसे प्रसिद्ध केंद्र।
  • वृंदावन (उत्तर प्रदेश)
  • अन्य स्थानों पर भी कई मंदिर और आश्रम बने (भूमियाधार,काकरीघाट, हनुमानगढ़ी आदि)।

वे “सब एक" (सभी एक हैं), प्रेम, सेवा और सत्य पर जोर देते थे। भक्त उन्हें हनुमान जी का अंश मानते हैं और कई चमत्कारिक घटनाओं से जोड़ते हैं।

 
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