कई बार किसी मनपसंद विषय पर बनी फिल्म भी तीन घंटे तक देखना मुश्किल हो जाता है, लेकिन कालजयी रचनाकार अमृतलाल नागर पर बने डेढ़ घंटे की फिल्म चौक यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर देखते ही देखते कब खत्म हो गई सुधी दर्शकों को पता ही नहीं चला जैसै ही परदा फिल्म से खाली हुआ, निस्तब्ध दर्शक चौंक गए। ऐसा जादू था महान लेखक पद्मभूषण अमृतलाल नागर (जन्म17 अगस्त 1916 –निधन  23 फरवरी 1990) पर बनी इस फिल्म का। मुंबई के सृजनकारों, साहित्यकारों और कला प्रेमियों की चौपाल में इसे को देखने बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी एकत्र हुए थे। इसकी कसावट किसी मनोरंजनक फिल्म से कहीं ज्यादा थी, एक एक दृश्य, एक एक घटना, संगीत और अमृतलाल नागर को जीवंत करते किरदार दर्शकों के लिए रोमांच पैदा कर रहे थे।

इसका निर्देशन श्रीमती सविता शर्मा नागर एवं राजेश अमरोही ने किया था। फिल्म का निर्माण इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) द्वारा किया गया था। 90 मिनट की ये फिल्म एक लेखक की जिंदगी के साथ ही उस दौर की कई कहानियों को जीवपित कर देती है।

लखनऊ के ऐतिहासिक चौक से शुरू होकर यह फिल्म उनके जीवन, साहित्य, पत्रकारिता, सिनेमा और रेडियो के अनुभवों को जोड़ती है। इसमें उनके जीवन से जुड़े विभिन्न शहरों—लखनऊ, बनारस, मुंबई, दिल्ली और नैमिषारण्य—की यात्रा कराती है.

इस फिल्म को देखकर ही ये पता चल सकता है कि अमृतलाल नागर किस मिट्टी के बने लेखक थे। 1932 में निरंतर लेखन किया। शुरुआत में मेघराज इंद्र के नाम से कविताएं लिखीं। 'तस्लीम लखनवी' नाम से व्यंग्यपूर्ण स्केच व निबंध लिखे सूरदास पर लिखना था तो सूरदास के गाँव में आँखों पर पट्टी बाँधकर कई दिनों तक रहे और सूरदास की नैत्रहीनता को अपने अंदर उतारा। मात्र 16 साल की उम्र में उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा प्रारंभ की और इसी उम्र में अपने प्रिय लेखक शरदचंद्र से मिलने कोलकता चले गए। 1940 तक आते आते वे 40 से ज्यादा कहानियाँ लिख चुके थे। मात्र 31 रुपये लेकर वे 5 मार्च 2940 में मुंबई आ गए और कवि प्रदीप के माध्यम से उस समय के सबसे विख्यात और सबसे पढ़े-लिखे फिल्म निर्माता निर्देशक व अभिनेता किशोर साहू से मिले। दादर के सिराविला में किराये पर घर लिया। यहाँ सुमित्रानंदन पंत, फिल्म निर्माता महेश कौल, पं नरेन्द्र शर्मा अवनींद्र नाथ टैगौर जैसी हस्तियों के संपर्क में आए और बहूरानी, कुँआरा बाप, वीर कुणाल, संगम उलझन कदम जैसी सुपरहिट पारिवारिक फिल्में लिखकर अपनी पहचान बनाई।

1940 से 1947 के बीच, उन्होंने मुंबई  कोल्हापुर और चेन्नई (मद्रास) के फिल्म उद्योग के लिए पटकथाएँ और संवाद लिखे। वे उन शुरुआती अग्रदूतों में से एक थे जिन्होंने सिनेमाई डबिंग के क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल की। उन्होंने रूसी भाषा की फिल्मों नसीरुद्दीन इन बुखारा और जोया का हिंदी में डब किया, तथा एमएस. सुब्बुलक्ष्मी  की तमिल फिल्म मीरा  का भी हिंदी में रूपांतरण किया। इसके लिए उन्होंने तमिल भी सीखी।

उनकी लिखी फिल्मों में बहूरानी (1941), संगम (1941)कुंवारा बाप (1942)उलझन (1942)राजा (1943), पराया धनकिसी से न कहनाकल्पना (1946)गुंजन (1947)चोर (1950) जैसी फिल्में प्रमुख थी।

1857  की क्रांति के इतिहास पर 'गदर के फूल', लिखने के लिए गाँव गाँव में भटके और जिन लोगों को क्रांति के किस्से याद थे और जिन्होंने अपने माता-पिता, भाई दादा, नाना नानी से जो किस्से सुने थे उनको पुस्तक के माध्यम से दस्तावेज बनाकर उन घटनाओं और नायकों को अमर कर दिया। 'ये कोठेवालियां', लिखने के लिए प्रयागराज, काशी से लेकर लखनऊ की कोठेवालियों से मिले, कई बुजुर्ग हो चुकी कोठेवालियों से भी मिलकर उनके दौर के किस्सों को कुरेदा, उसे लिखकर उनकी यादों और इतिहास को जीवित कर दिया।

उन्होंने लखनऊ स्थित ऑल इंडिया यूनाइटेड इंश्योरेंस कंपनी के कार्यालय में 18 दिनों तक डिस्पैच क्लर्क के रूप में कार्य किया। लेकिन एक अधिकारी द्वारा झूठा आरोप लगाने पर उसी समय नौकरी छोड़कर चले आए।

सन् 1939 में उन्होंने नवेल किशोर प्रेस के प्रकाशन विभाग और माधुरी  पत्रिका के संपादकीय कार्यालय में स्वेच्छा से सेवाएँ प्रदान कीं।

दिसंबर 1953 से मई 1956 तक वे लखनऊ स्थित आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) में नाटक निर्माता (ड्रामा प्रोड्यूसर) के पद पर कार्यरत रहे, लेकिन बाद में उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया क्योंकि वे अधिकारियों के दबाव में काम नहीं करना चाहते थे।

उनकी बेटी और जानी मानी फिल्म कहानी व टीवी धारावाहिकों की लेखिका अचला नागर ने अपने बचपन के किस्सों से नागर जी के व्यक्तित्व में मौजूद एक पिता की छवि को जीवंत किया। उन्होंने कहा कि उनको मेरी नानी ने पाला पोसा और उनकी ही पसंद से उनका विवाह मेरी माँ से हुआ। अचला जी ने कहा कि भांग उनका प्रिय पेय था और मुंबई आकर भी वे भांग की महफिल जमाते थे और कौन कितनी भांग पियेगा ये वो पहले से ही तय कर देते थे।

फिल्म की निर्देशक श्रीमती सविता नागर ने फिल्म निर्माण से जुड़े कई रोचक किस्से बताए।