आज आर्यभट जयन्ती है। भारत में जिस तरह का सच्चा साइंटिफिक टेम्पर चाहिए, उसके प्रतीक पुरुष की। आज ISRO की स्थापना किसके कार्यकाल में पाकिस्तान से कितने वर्ष बाद हुई, इस पर बात होती है पर आर्यभट की जयंती मनाना हम भूल ही गए हैं।
आर्यभट (४७६–५५० ईस्वी) ने जब आर्यभटीय नामक ग्रन्थ लिखा तब वे २३ वर्ष भर के थे। ग्रन्थ केवल ११८ श्लोकों का है, किन्तु इसमें गणित, त्रिकोणमिति, कालगणना और खगोलविज्ञान की ऐसी स्थापनाएँ हैं जिन्हें आज का विज्ञान भी सत्य मानता है। इस ग्रन्थ के चार अध्याय हैं — गीतिकापाद, गणितपाद, कालक्रियापाद और गोलपाद।
पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूर्णन आर्यभट की सबसे साहसी और क्रान्तिकारी स्थापना थी। जब सारा विश्व मानता था कि आकाश घूमता है, तब आर्यभट ने कहा — पृथ्वी घूमती है। श्लोक (गोलपाद ९): अनुलोमगतिर्नावस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत्। अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लङ्कायाम्॥ कि जैसे नाव में बैठा मनुष्य आगे बढ़ते हुए किनारे के वृक्षों को उल्टी दिशा में जाते हुए देखता है, उसी प्रकार लंका (भूमध्यरेखा) पर स्थित व्यक्ति को स्थिर नक्षत्र सीधे पश्चिम की ओर जाते दिखाई देते हैं।
यह एक अत्यन्त सूक्ष्म और वैज्ञानिक उपमा थी। आर्यभट यहाँ स्पष्ट करते हैं कि तारों का पश्चिम जाना भ्रम है — वास्तव में पृथ्वी पूर्व दिशा में घूम रही है। आधुनिक भौतिकी इसे पूर्णतः सत्य मानती है। पृथ्वी लगभग २३ घण्टे ५६ मिनट में एक बार अपनी अक्ष पर घूमती है। आर्यभट ने ४९९ ईस्वी में कहा था कि पृथ्वी घूमती है। यूरोप में यह बात कोपर्निकस ने १५४३ में मानी — और तब भी चर्च ने उनकी पुस्तक De Revolutionibus को प्रतिबन्धित कर दिया। गैलीलियो को १६३३ में इसी सत्य के लिए नजरबन्द किया गया। अर्थात् जो सत्य आर्यभट ने उपमा देकर सहज भाव से कहा था, उसे यूरोप में स्वीकार करने में न केवल एक सहस्राब्दी लगी, बल्कि उस स्वीकृति पर भी संघर्ष हुआ।यहाँ एक सूक्ष्म बात और है — आर्यभट के शिष्य और टीकाकार भास्कर प्रथम (६२९ ईस्वी) ने इस मत को और स्पष्ट किया, जबकि यूरोप में टॉलेमी का भूकेन्द्री मॉडल १४०० वर्षों तक अखण्ड सत्य माना जाता रहा।
आर्यभट ने π का जो मान दिया, वह आज भी अत्यन्त सटीक माना जाता है। श्लोक (गणितपाद १०): चतुराधिकं शतमष्टगुणं द्वाषष्टिस्तथा सहस्राणाम्। अयुतद्वयविष्कम्भस्यासन्नो वृत्तपरिणाहः॥ कि (४+१००) अर्थात् १०४ को ८ से गुणा करो = ८३२, फिर ६२,००० जोड़ो = ६२,८३२। यह २०,००० व्यास वाले वृत्त की परिधि का सन्निकट (आसन्न) मान है। अर्थात् π = ६२८३२ ÷ २०००० = ३.१४१६

यहाँ उल्लेखनीय यह है कि आर्यभट ने स्वयं लिखा — यह मान आसन्न है, अर्थात् सन्निकट है। यह वैज्ञानिक ईमानदारी का प्रमाण है कि उन्हें पता था π अपरिमेय है। आधुनिक विज्ञान भी π को अपरिमेय और अनन्त दशमलव स्थानों वाली संख्या मानता है। १४२४ — अल-काशी (फ़ारसी) ने π को १७ दशमलव स्थान तक निकाला — ९२५ वर्ष बाद। यूरोप में Ludolph van Ceulen ने १५९६ में ३५ दशमलव दिए।
पाँचवीं शताब्दी में जब ग्रहण को राहु-केतु का ग्रास माना जाता था, आर्यभट ने इसे छाया के विज्ञान से समझाया।
श्लोक (गोलपाद ३७):
छादयति शशी सूर्यं शशिनं महती च भूच्छाया।
मासि मासि चन्द्रार्काभ्यां तत् सूर्यग्रहणं ग्रहणम्॥
चन्द्रमा, सूर्य को ढकता है (सूर्यग्रहण) और पृथ्वी की विशाल छाया, चन्द्रमा को ढकती है (चन्द्रग्रहण)। प्रत्येक मास में सूर्य और चन्द्रमा के मिलन और प्रतिपक्ष के समय ही ग्रहण होता है।
यह स्थापना आज पूर्णतः वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है। नासा भी वही सिद्धान्त अपनाता है जो आर्यभट ने डेढ़ हजार वर्ष पूर्व प्रतिपादित किया था। आर्यभट ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्रहण तभी होता है जब तीनों पिण्ड एक सीध में हों

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नक्षत्र वर्ष (Sidereal Year) की गणना भी वे ही कर गये थे।
श्लोक (गीतिकापाद ३):
षष्ट्यब्दानां षष्टिर्यदा व्यतीतास्त्रयश्च युगपादाः।
त्र्यधिका विंशतिरब्दाः तदेह मम जन्मनोऽतीताः॥
और कालक्रियापाद में आर्यभट बताते हैं कि एक कल्प में १,५८२,२३७,५०० भगण (पृथ्वी के चक्कर) होते हैं। इससे एक वर्ष का मान निकलता है —
३६५ दिन, ६ घण्टे, १२ मिनट, ३० सेकण्ड
अर्थात् ३६५.२५८ दिन।


आर्यभट ने सूर्य की एक राशि-चक्र परिक्रमा के आधार पर जो नक्षत्र वर्ष की गणना की, वह आधुनिक मापन (३६५.२५६ दिन) से केवल ३ मिनट ३० सेकण्ड का अन्तर रखती है। यह अन्तर आधुनिक परिशुद्ध उपकरणों के बिना लगभग शून्य ही है। यूरोप जब Julius Caesar के कैलेण्डर (४५ ईपू) में सुधार कर रहा था, तब Pope Gregory XIII ने १५८२ में Gregorian Calendar बनाया जो ३६५.२४२५ दिन पर आधारित है। आर्यभट का मान ३६५.२५८ दिन था — यह थोड़ा भिन्न है क्योंकि आर्यभट ने नक्षत्र वर्ष (तारों के सापेक्ष) मापा था, जबकि Gregorian उष्णकटिबन्धीय वर्ष (ऋतुओं के सापेक्ष) है। दोनों अलग माप हैं और दोनों अपने-अपने सन्दर्भ में सटीक हैं।
ज्या सारणी — Sine Function का आधार
आर्यभट ने त्रिकोणमिति का आधार स्थापित करते हुए पहली ज्या (sine) सारणी की रचना की।
श्लोक (गणितपाद १२):
प्रथमाज्याऽर्धज्याविस्तारो द्वितीयस्तु तस्मात् प्रथमाज्याविहीनः।
एवं क्रमात् सकलाः खखाद्यविखाग्रजाः पृथक्शः॥
कि प्रथम ज्या-चाप का विस्तार ही प्रथम ज्या है। द्वितीय ज्या, प्रथम ज्या से कम होती है। इस प्रकार क्रमशः ज्याओं की गणना होती है।
आर्यभट ने ०° से ९०° तक के ज्या-मानों की सारणी २४ भागों में बनाई, जिसे अर्धज्या कहा। यही शब्द अरबी में जीब और लैटिन में sinus बना, जिससे आज का Sine शब्द आया। यह विश्व की प्रथम त्रिकोणमितीय सारणी थी और आधुनिक त्रिकोणमिति का मूलाधार है।


Sine — शब्द और विज्ञान दोनों भारत से गए
और यह शायद सबसे रोचक यात्रा है। आर्यभट का शब्द था अर्धज्या (अर्ध = आधा, ज्या = धनुष की प्रत्यंचा)। यह शब्द संक्षेप में जीवा या जयब बना। जब अरब विद्वानों ने आर्यभटीय का अनुवाद किया तो उन्होंने jīb लिखा। इस शब्द का अरबी में कोई अर्थ नहीं था, इसलिए बाद के अनुवादकों ने इसे समान उच्चारण वाले अरबी शब्द jaib वक्ष, खाँच) से जोड़ दिया।
जब १२वीं सदी में यूरोपीय विद्वान Gerard of Cremona ने अरबी से लैटिन अनुवाद किया, तो jaib का लैटिन sinus खाँच, वक्र) हुआ — और यही आज का Sine है।अर्थात् आधुनिक त्रिकोणमिति का सबसे मूल शब्द भी भारत की देन है।


ग्रहों की कक्षा का सूर्य-केन्द्रीय संकेत भी आर्यभट्ट का किया हुआ है।
श्लोक (कालक्रियापाद १७):
शीघ्रोच्चं सूर्यः सर्वेषामेव ग्रहाणां मन्दोच्चं च।
भूगोलमध्ये वर्तत इत्युक्तं सूक्ष्मगणितज्ञैः॥
कि सभी ग्रहों के शीघ्रोच्च (aphelion) का केन्द्र सूर्य है। यह सूक्ष्म गणित के ज्ञाताओं ने कहा है।
यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थापना है। आर्यभट की कक्षीय गणनाओं में बुध और शुक्र के शीघ्रोच्च को सूर्य पर केन्द्रित बताया गया है — यह सूर्यकेन्द्रीय (heliocentric) विचार का संकेत था, जो कोपर्निकस से लगभग एक हजार वर्ष पूर्व प्रतिपादित हुआ। आधुनिक खगोलशास्त्र इन कक्षाओं को पूर्णतः सत्य मानता है।



पृथ्वी का व्यास और परिधि भी आर्यभट्ट ने बताई।
श्लोक (गीतिकापाद ७):
उदयास्तमयान् मेरोः सव्येतरतो ऽस्तोदयावुभौ।
नक्षत्रग्रहाणां तु सप्तभिर्भूव्यासः समाहृतः॥
और गणितपाद में —
भूवृत्तस्य विष्कम्भः सप्तभिरेको योजनशतानि।
कि पृथ्वी का व्यास १,०५०.० योजन है।
यदि आर्यभट के योजन मान को ७.२ किलोमीटर माना जाए, तो पृथ्वी का व्यास लगभग १२,८७४ किलोमीटर निकलता है। आधुनिक मापन के अनुसार पृथ्वी का व्यास लगभग १२,७४२ किलोमीटर है — अन्तर न्यूनतम है।


चन्द्रमा और ग्रहों का प्रकाश बताने वाले वे ही थे।
श्लोक (गोलपाद १५):
भास्करतो विमलकिरणा भास्वरमुखाः सर्वग्रहा लोकाः।
सूर्यसमीपं गत्वाऽस्तमयन्ति तदाभासाः॥
कि सभी ग्रह और चन्द्रमा सूर्य से प्रकाश लेकर चमकते हैं — वे स्वयंप्रकाशित नहीं हैं। जब वे सूर्य के निकट होते हैं, तो अदृश्य हो जाते हैं।


यह तथ्य आज का विज्ञान शत-प्रतिशत सत्य मानता है। चन्द्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं है — वह केवल सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करता है। यही बात सभी ग्रहों पर लागू होती है। १५४३ में पश्चिम में कोपर्निकस ने इसे कहा और १६०९ में केप्लर ने सूर्यकेन्द्री मॉडल को पूर्णतः स्थापित किया। आर्यभट के संकेत से ११०० वर्ष बाद केप्लर ने कक्षाएँ सिद्ध कीं।


ऐसा नहीं होता कि किसी वैज्ञानिक की हर स्थापना सही हो। विज्ञान कभी अपने आप को अंतिम नहीं कहता। पर जिसने यह सब पहले पहल कहा, उसकी commemorating तो बनती है।


 

(लेखक मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त आएएएस अधिकारी हैं और मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)