Thursday, April 25, 2024
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जीनियसों की भीड़ में…

मनोहर श्याम जोशी

जीनियसों की भीड़ होने से मानदंडों का लोप हो रहा है तो मानदंडों का लोप होने से जीनियसों की भीड़ कुछ और भी बढ़ रही है। आज खरी आलोचना को भी द्वेषपूर्ण ठहराया जा सकता है, इसलिए कि अक्सर आलोचनाएँ द्वेषपूर्ण होती हैं। खरी प्रशंसा को भी गुटबन्दी की देन माना जा सकता है इसलिए कि अक्सर प्रशंसाएँ गुट के सदस्यों की ही की जाती हैं।

अंग्रेजी शब्द जीनियस के जो भी हिन्दी पर्याय अब तक सूझे या सुझाए गए हैं, वे हिन्दी साहित्य के प्रणेताओं, पारखियों और प्रेमियों को नितान्त अपर्याप्त प्रतीत हुए हैं। इसीलिए अंग्रेजी का यह शब्द ज्यों का त्यों हिन्दी में चल पड़ा है। इस शब्द की आवश्यकता हिन्दी साहित्य में है भी खासी। दूसरे साहित्यों में बहुत ढूँढ़ने पर मुश्किल से एक मिलता है तो यहाँ बगैर ढूँढ़े हर पीढ़ी में एक हजार जीनियस मिल ही जाते हैं। आप चाहें तो इसे यों कह लीजिए कि हर पीढ़ी में एक हजार साहित्यिक अपने को जीनियस मानते और मनवाते मिल ही जाते हैं।

यहाँ शायद यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि जीनियस की एक परिभाषा यह भी है कि जीनियस हर परिभाषा से परे होता है- वह दूसरों के बनाए हुए मानकों का पात्र नहीं, अपने अलग अनूठे मानकों का निर्माता होता है। वह अलग मानकों का दावा करता है इसलिए इतर जन अपने मानकों के अनुसार उसके व्यक्तित्व और कृतित्व को प्रपंच घोषित कर सकते हैं और करते हैं। इसलिए जहाँ शब्द जीनियस की आवश्यकता होती है वहाँ इसके एक विपर्यय फ्राड की भी माँग बहुत बढ़ जाती है। हिन्दी साहित्य में फ्राड भी जीनियस की तरह बहुप्रचलित हुआ है। तो आज हिन्दी साहित्य में दो ही तरह के प्राणी बसते हैं― जीनियस और फ्राड। बल्कि यों कहना चाहिए कि निरे जीनियस ही जीनियस बसते हैं जिन्हें समय, सुविधा और सत्ताकांक्षा के आग्रह के अनुसार आप चाहे जब फ्राड करार दे सकते हैं।

पूजन और प्रताड़न का यह सह-अस्तित्व हमारे साहित्यिक मंच का महत्त्व भले ही घटा रहा हो उसका मनोरंजन-तत्त्व निश्चय ही बढ़ा रहा है। यह संयोग नहीं कि लतीफेबाजी इधर हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चित विद्या का स्थान पा गई है। श्रद्धा-भक्ति का यह हाल है कि अगर कोई सत्तारूढ़ व्यक्ति लिखे कि अमुक पीढ़ी के लेखक परम मूर्ख हैं तो अमुक पीढ़ी के लेखक फौरन कह रहे हैं कि आपने तो मेरे मुँह की बात छीन ली। किसी व्यक्ति को इसीलिए नाचीज कहा जा रहा है कि वह प्राध्यापक है, साहित्य का डॉक्टर है, तो किसी व्यक्ति को इसलिए नगण्य माना जा रहा है कि वह प्राध्यापक नहीं है, साहित्य का डॉक्टर नहीं है। अमुक जी के अभिनन्दन समारोह में जो लोग मंच पर जाकर अमुक जी को पुष्पों और प्रशस्तियों के हार पहना रहे हैं वे ही आपस में यह कह रहे हैं कि अमुक जी फ्राड के मामले में सर्वथा न भूतो न भविष्यति हैं और तो और, यह अभिनन्दन भी उन्होंने फ्राड में कराया है।

हर आदरणीय सम्पादक महोदय हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि करने के लिए सराहे जा रहे हैं और पद से हटते ही हिन्दी साहित्य का बंटाधार करने के लिए जिम्मेदार ठहराए जा रहे हैं। आत्मप्रचार और गुटबन्दी को बहुत बुरा बताया जा रहा है मगर मजबूरी कुछ ऐसी है कि थोड़ा-बहुत आत्मप्रचार और गुट-संगठन करना ही पड़ रहा है। किसी को इसी बात का नाज है कि वह अंग्रेजी पढ़ा-लिखा हिन्दी लेखक है तो किसी को इस बात का कि उसे अंग्रेजी नहीं आती। कुल मिलाकर यह कि कस्बा शहर का मुखौटा लगाकर हिन्दी साहित्य के मंच पर छद्म आधुनिकता और छद्म भारतीयता का अभिनय कर रहा है। साहित्यिक परिदृश्य समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय बनता जा रहा है।

हमारे तरुण लेखक इस स्थिति से क्षुब्ध हैं लेकिन इससे निपटने के लिए वे भी पूर्ववर्तियों के मार्ग पर चलने की भूल कर रहे हैं। एक ओर वे अगले जमाने के प्रगतिशील साहित्यकारों की तरह यह दुराग्रह कर रहे हैं कि एक विशिष्ट चिन्तन अपना लेने से ही साहित्य महान या महत्त्वपूर्ण हो जाता है। दूसरी ओर वे प्रयोगवादियों की तरह यह मान ले रहे हैं कि एक लघु-पत्रिका निकालकर, एक मित्र मंडली का मिला-जुला संकलन छपवाकर (जिसमें लेखक परिचय रूमानी मगर चौंकाने वाले हों― यथा ‘सूने देह का अभिज्ञान कराया, जिसने आत्मा का अलौकिक परिचय दिया’) और ‘व्यावसायिक, पोंगापन्थी हिन्दी वालों की फटीचर परम्परा से अलग होने’ और संस्कृत तथा अंग्रेजी की गौरवमयी परम्परा से जुड़े होने का दम भर लेने से ही कोई भी कैसा भी लेखक अपनी और दूसरों की निगाह में महत्त्वपूर्ण ठहरा दिया जा सकता है।

कुल मिलाकर यह कि नई पीढ़ी का नया होने का ढंग भी निहायत ही पुराना है। कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि तथाकथित आधुनिक हिन्दी साहित्य तमाम ‘क्रान्तिकारी’ पीढ़ियों के प्रयत्नों के बावजूद किशोरावस्था को पार नहीं कर पाया है। कैशोर्य उसका स्थायी भाव है― कभी-कभी अपनी इस अदा के कारण वह खासा प्रीतिकर मालूम हो सकता है। लेकिन ज्यादातर वह एक ऐसे किशोर का ही स्मरण करता है जो बड़ा होने से इनकार कर रहा हो मगर बड़ा समझे जाने का आग्रह कर रहा हो। इस दृष्टि से हमारा साहित्य परिदृश्य मनोवैज्ञानिक के लिए रोचक बन जाता है, भले ही पाठक के लिए उसमें ऊब ही ऊब हो।

जीनियसों की भीड़ होने से मानदंडों का लोप हो रहा है तो मानदंडों का लोप होने से जीनियसों की भीड़ कुछ और भी बढ़ रही है। आज खरी आलोचना को भी द्वेषपूर्ण ठहराया जा सकता है, इसलिए कि अक्सर आलोचनाएँ द्वेषपूर्ण होती हैं। खरी प्रशंसा को भी गुटबन्दी की देन माना जा सकता है इसलिए कि अक्सर प्रशंसाएँ गुट के सदस्यों की ही की जाती हैं। हमेशा निस्संग दार्शनिक मुद्रा में बोलने-लिखने वाले महान हिन्दी साहित्यकार की चाटुकारिता का चटखारे ले-लेकर सेवन करते हैं और आत्मप्रचार और आत्मप्रशंसा का अवसर चुकाना अधर्म समझते हैं। ऐसा मालूम होता है कि प्रतिष्ठित होने के बाद भी उन्हें अपनी प्रतिष्ठा के आधार पर कोई भरोसा नहीं है, हिन्दी साहित्य के चंचल संसार का स्मरण करके वे सदा त्रस्त और आशंकित रहते हैं और काफी प्रतिष्ठित व्यक्ति ऐसा करते हैं। इसलिए मान लिया जा सकता है कि सभी लब्ध-प्रतिष्ठ व्यक्ति फ्राड हैं और यह भी कि अगर हम फ्राड करें तो मात्र इसी से हमारी गणना लब्ध-प्रतिष्ठों में होने लगेगी। साहित्य का नीति या राजनीति से सम्बद्ध होना तो आवश्यक है नहीं, शिल्पगत आग्रह का भी कोई अर्थ नहीं होता, इसलिए बिना किसी संशय या संकोच के कोई भी आन्दोलन छेड़ दीजिए, उसे कुछ भी नाम दे दीजिए और उसकी ऐसी परिभाषा कीजिए कि किसी के पल्ले कुछ पड़े ही नहीं। छायावाद से लेकर अकविता तक यही हुआ है― अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य के शास्त्रों के आधार पर लम्बी-चौड़ी बहसें हुई हैं और हिन्दी साहित्य का संसार लगभग ज्यों का त्यों रह गया है। जिस देश में जीनियस बसते हैं उस देश में यही सब होता है।

साभार -https://rajkamalprakashan.com/blog/

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