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हाड़ोती संस्कृतिः लुप्त होती दास्ताना कठपुतली कला

हाड़ोती की लोक कलाओं में दास्ताना
कठपुतली नचाने की कला को 46 वर्षीय संजय पिछले 30 वर्षों से कोटा में विरासत में मिली कला को न केवल जीवित रखे हुए हैं वरन देश – विदेश में अपनी कला का प्रदर्शन कर नाम कमा चुके हैं और इस कला के राजस्थान में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सर्वश्रेष्ठ कठपुतली कलाकार बन गए हैं। आधुनिक मनोरंजन माध्यमों के बीच उनकी यह कला मात्र प्रदर्शन का माध्यम बन कर रह गई है।


“संजय मनोरंजन कठपुतली केंद्र” के माध्यम से ये आज तक 400 से ज्यादा प्रदर्शन देश – विदेश में कर चुके है। देश के समस्त सातों सांस्कृतिक केंदों, पर्यटन विभाग और अन्य विभागों के माध्यम से इन्हें देश – विदेश में कला प्रदर्शन का मौका मिला। देश के बाहर नेपाल, जापान,स्पेन और आस्ट्रेलिया देशों में दल के पांच कलाकारों के साथ प्रदर्शन करने का गौरव प्राप्त हुआ। इनके दल में स्व. पारस दुलारी, अंबिका,अलका और कोमल भी इनके साथ विदेश गए।


कठपुतली के माध्यम से राजस्थान की संस्कृति के अंतर्गत गणेश जी की भव्य आरती के साथ – साथ चरी नृत्य, कालबेलिया नृत्य, राजस्थानी धूमर, सांप – सपेरा नृत्य जेसे सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। वे अपने दल के पांच कलाकारों के माध्यम से दस कठपुतलियों पर कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। नाचती कठपुतलियों के पीछे से कलाकार संवाद और गीत के माध्यम से स्वर देते हैं। प्रस्तुति और स्वरों का संगम मिल कर आश्चर्जनक कार्यक्रम की प्रस्तुति बन जाती है।

संजय बताते हैं कि इस कला को जीवित रखने के लिए नए प्रयोग करते हुए इसे मनोरंजन के साथ राष्ट्रीय हित जेसे साक्षरता, परिवार कल्याण, नशामुक्ति, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, भिक्षावृत्ति रोकथाम, बाल विवाह और एकता आदि मुद्दों पर जनमानस को जागृत करने के संदेशों के साथ जोड़ा। इससे राष्ट्रीय हित भी सदा और हमारी कला को संरक्षण भी मिला।

वह बताते हैं कठपुतली के पांच प्रकार हैं। एक तो मनुष्य जो जीवित कठपुतली है और इसकी डोर प्रकृति के हाथ में होती है। दूसरे प्रकार की छाया कठपुतली जो मानव के साथ – साथ चलती है। धागा कठपुतली, छड़ी कठपुतली और दास्ताना कठपुतली जिसकी डोर हम जैसे कलाकारों के हाथ में होती हैं। हमारी उंगलियों के इशारे पर नाच कर लोगों का दिल बहलाती हैं।

दास्ताना कठपुतली कला की प्रेरणा उन्हें उनकी स्व.माता जी पारस दुलारी जी जो स्वयं अंतर्राष्ट्रीय कलाकार थी से मिली। इस प्रकार की कठपुतली बनाना उनकी अपनी कल्पना थी। मिट्टी से विभिन्न रंगों से बनी रंगबिर्ंगी कठपुतली पर दस्ताने चढ़ा कर यह अंगूठे और उंगलियों के इशारे से नचाई जाती है। पहले माता जी ने इसका अभ्यास किया और उन्हें देख कर मेरी रुचि जागृत हुई तो मैने भी इन्हें बनाना और नचाना सीख लिया और अपना एक ग्रुप बनाया। जब वे 15 वर्ष आयु के थे तब ही उन्होंने इस कला का प्रथम सार्वजनिक प्रदर्शन किया। वह दिन था और आज का दिन कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।

कठपुतली कलाकार संजय को कई कार्यक्रमों में राजस्थान के मुख्य मंत्री अशोक गहलोत जैसी बड़ी – बड़ी हस्तियों का आशीर्वाद भी मिला। विदेशों में भी खूब चर्चा रही। कार्यक्रमों की लोकप्रियता का साक्ष्य हैं एक पेटी भरे वो प्रमाणपत्र जो विभिन्न संस्थाओं ने इन्हें उत्साहवर्धन स्वरूप प्रदान किए।

संजय का कहना है कि आज यह कला दम तोड रही है जिसे समुचित संरक्षण की दरकार है।
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