मैं चुनाव ड्यूटी के लगभग दो माह बंगाल में बिताकर लौटा हूं। वहां सनातन धर्म के प्रति गहन और व्यापक आस्था है। गरीब से गरीब की झोंपडी में भी दरवाजे पर राधा-कृष्ण का मंदिर, मूर्ति या तस्वीर मिलेगी।
बंगाली लोग जीवन में एक बार बरसाने या वृन्दावन तीर्थ दर्शन के अभिलाषी है।
लोग सचमुच बदलाव के लिए तरस रहे थे। धर्म, दर्शन और संस्कृति सब खतरे में लग रहे थे उनको।
और विकास नाम की कोई चीज ही नहीं है।
सरकारी कर्मचारीगण महज 18% DA पा रहे हैं। मैंने हर जगह कर्मचारीगण को बताया कि भाजपा शासित सभी राज्यों में 60% DA है।
कर्मचारीगण का पोस्टल बैलट 85% भाजपा को मिला है। परिवार का वोट भी इसी पैटर्न पर मिला है।
सचमुच बंगाल की सडकों को देखने के बाद तो हरियाणा और राजस्थान की सडकें यूरोप और अमेरिकन जैसी लगती हैं।
लोगों को सचमुच अहसास हुआ कि जो बंगाल कभी industrial growth का इंजन था वो लेफ्ट और TMC ने कंगाल बना दिया। Industrial sector पूरी तरह तबाह हो चुका है। प्राइवेट सेक्टर में रोजगार है ही नहीं।
मैं कोलकाता एयरपोर्ट से करीब 125 km दूर गंगासागर धाम में तैनात था। मात्र 125 km की दूरी और हर बार 5-6 घंटे लगते थे। सिर्फ दो लेन का रोड और जबरदस्त भीड-भाड। ओवरटेक करना जान जोखिम में डालना है। औसत स्पीड मात्र 25 kmh. कोई डिवाइडर नहीं, कोई फेसिंग नहीं, कोई फ्लाई ओवर या ओवरब्रिज नहीं। लोकल गाडी टोटो की मक्खी-मच्छर की तरह भरमार। जनसंख्या घनत्व उच्चतम। लोगों को बताया कि इस दूरी को तय करने में हरियाणा व राजस्थान में सिर्फ सवा घंटा लगता है तो किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। सारे बंगाल में सड़कों का कोई विकास ही नहीं हुआ। कानून और व्यवस्था तो बस नाम की थी। पूरी गुंडागर्दी चल रही थी। लोगों में सचमुच गुस्सा था।
सचमुच ऐसी अनेक उम्मीदें है पब्लिक की और इन उम्मीदों ने ही बदलाव की आंधी का आधार रखा।




