आज भारत की स्वतंत्रता के 80 वर्ष पूरे होने के अवसर पर सिएटल में भारतीय प्रवासी समुदाय का हिस्सा होने पर गर्व हुआ.
आज मैंने भारत से लगभग 13,000 किलोमीटर दूर, अमेरिका के सिएटल शहर में भारत का स्वतंत्रता दिवस मनाया। भारतीय वाणिज्य दूतावास द्वारा आयोजित यह भव्य समारोह मेरे लिए बेहद भावुक और अविस्मरणीय अनुभव रहा।
इस अवसर पर विशेष आमंत्रित अतिथि के रूप में शामिल होना मेरे लिए गर्व की बात थी। लेकिन समारोह से भी अधिक जिस दृश्य ने मेरे मन को छू लिया, वह कुछ और था।  वाणिज्य दूतावास के बाहर भारतीय मूल के लोगों की एक लंबी कतार लगी थी। उनमें से अनेक लोग या तो तिरंगा लिए हुए थे या फिर तिरंगे वस्त्रों में सजे हुए थे। उन्हें कोई निमंत्रण नहीं भेजा गया था। किसी ने उन्हें आने के लिए नहीं कहा था। वे बस अपने देश के तिरंगे को नमन करने और भारत के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने के लिए स्वयं चले आए थे।
विशेष आमंत्रित अतिथियों में अमेरिका की सिएटल स्थित कई  बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सीईओ, आसपास के शहरों के मेयर और शेरिफ तथा भारत के महान क्रिकेटर सुनील गावस्कर जैसे विशिष्ट लोग मौजूद थे। लेकिन सच कहूँ तो, उन विशिष्ट अतिथियों के बीच खड़े होकर भी मेरा ध्यान उस लंबी कतार पर बार-बार जा रहा था।
मुझे लगा कि शायद उस कतार में ही भारत की असली ताकत खड़ी थी।
वे लोग, जो यहाँ सिएटल में हजारों मील दूर आकर बसे हैं, जिनमें  से ज्यादातर ने IIT और IIM जैसे देश के श्रेष्ठ संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की, अपने परिश्रम और प्रतिभा से दुनिया में अपनी पहचान बनाई और दूर देश की धरती पर सफलता के नए अध्याय लिखे—आज भी उनके दिल में भारत उतना ही जीवंत है।
उस क्षण मुझे भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ का एक बेहद मानवीय और भावुक रूप दिखाई दिया। यह मेरे लिए अत्यंत विनम्र और भावुक कर देने वाला क्षण था।
मेरे गृह नगर मुंबई  से इस अमेरिकी शहर की दूरी भले ही 13,000 किलोमीटर हो सकती है, लेकिन दिल और मातृभूमि के बीच की दूरी कभी नहीं होती।
आज सिएटल डाउनटाउन में में तिरंगे को लहराते हुए देख और भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच खड़े होकर मुझे फिर महसूस हुआ कि भारत की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी संस्थाएँ, उसकी अर्थव्यवस्था या उसकी उपलब्धियाँ नहीं हैं—भारत की सबसे बड़ी ताकत उसके लोग हैं।
वे लोग जो दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न बस जाएँ, जिनकी अगली पीढ़ियाँ भले ही विदेश में पली-बढ़ी हों, लेकिन तिरंगा देखते ही जिनका दिल आज भी कुछ तेज़ धड़कने लगता है। भारतीय होने पर गर्व है।
इस अद्भुत भारतीय प्रवासी समुदाय का हिस्सा होने पर मुझे बेहद आत्मिक आह्लाद हुआ ।  और इस बात के लिए हृदय से आभारी हूँ कि भारत से 13,000 किलोमीटर दूर रहकर भी आज मुझे अपने देश की आत्मा को इतने करीब से महसूस करने का अवसर मिला। भारत दूर नहीं था—भारत आज मेरे साथ था।
(लेखक सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी हैं और अमरीका की यात्रा पर हैं)