लॉस एंजेल्स में 31 मई की शाम संगीत, मनोरंजन और समाजसेवा के नाम रही, जब Sankara Eye Foundation द्वारा आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में मशहूर गायक, मिमिक्री कलाकार और एंटरटेनर Sudesh Bhosle ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। खचाखच भरे सभागार में सुदेश भोंसले और उनकी साथी गायिका अनुराधा जुजु ने गीत-संगीत और मनोरंजन का ऐसा समां बांधा कि दर्शक देर तक तालियां बजाते रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आंखों की चिकित्सा और अंधत्व उन्मूलन के लिए लोगों में जागरूकता फैलाना भी था।

कार्यक्रम के दौरान सुदेश भोंसले ने अपने संघर्ष, संगीत यात्रा और समाजसेवा से जुड़े कई अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि उनका बचपन शास्त्रीय संगीत के माहौल में बीता। उनकी नानी दुर्गाबाई शिरोडकर को शास्त्रीय और नाट्य संगीत से विशेष लगाव था, जिसकी छाप उनके जीवन पर भी पड़ी। उन्होंने कहा कि शुरुआती दिनों में हिंदी फिल्म संगीत सुनने की ज्यादा अनुमति नहीं थी, लेकिन रेडियो के जरिए संगीत से उनका जुड़ाव लगातार बढ़ता गया।

सुदेश भोंसले ने बताया कि के. एल. सहगल का एक गीत सुनकर उन्हें पहली बार अपनी आवाज़ की विशेषता का एहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, मुकेश और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज गायकों की आवाज़ों में गाने का अभ्यास शुरू किया। कॉलेज के दिनों में दोस्तों और परिवार के बीच उनकी मिमिक्री और गायन काफी लोकप्रिय हो गए। उन्होंने बताया कि एक बार जब लोगों को उनकी आवाज़ सुनकर लगा कि Amitabh Bachchan बोल रहे हैं, तब यहीं से उन्हें अपनी अलग पहचान का एहसास हुआ।

उन्होंने कहा कि उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब Asha Bhosle ने उनका एक कार्यक्रम देखा और उनकी प्रतिभा की सराहना की। इसके बाद फिल्मों, स्टेज शो और विज्ञापनों में उन्हें लगातार अवसर मिलने लगे। सुदेश भोंसले ने कहा, “मैं सिर्फ गायक नहीं बनना चाहता था, बल्कि एक सम्पूर्ण एंटरटेनर बनना चाहता था।” उन्होंने बताया कि पिछले लगभग 48 वर्षों से वे मंच और फिल्मों में सक्रिय हैं तथा हिंदी के अलावा मराठी, गुजराती, बंगाली, पंजाबी और दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी काम कर चुके हैं।

उन्होंने कहा, “दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान लाना और लोगों को खुश करना ही मेरी सबसे बड़ी कमाई है।”

समाजसेवा पर बात करते हुए सुदेश भोंसले ने कहा कि कलाकार का दायित्व केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं होना चाहिए। उन्होंने बताया कि वे वर्षों से विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के लिए फंडरेज़र कार्यक्रम करते रहे हैं। विशेष रूप से उन्होंने Sankara Eye Foundation और कुष्ठ रोग उन्मूलन से जुड़ी संस्थाओं के लिए भी कई कार्यक्रम किए हैं। उनके अनुसार कला तभी सार्थक है जब वह समाज के काम आए।

इस अवसर पर Murali Krishnamurthy ने भी संस्था के मिशन और भविष्य की योजनाओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि Sankara Eye Foundation की स्थापना 1998 में हुई थी और आज संस्था लाखों लोगों तक नेत्र चिकित्सा पहुंचा रही है। उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अस्पतालों और डॉक्टरों पर भरोसा करने से डरते थे, लेकिन लगातार सेवा और समर्पण के जरिए संस्था ने लोगों का विश्वास जीता।

मुरली कृष्णमूर्ति ने बताया कि संस्था का लक्ष्य वर्ष 2030 तक हर साल 10 लाख मुफ्त नेत्र सर्जरी करना है। उन्होंने कहा कि “अंधत्व-मुक्त भारत” केवल एक सपना नहीं, बल्कि देश का राष्ट्रीय लक्ष्य होना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर भारत के कई हिस्सों में नए अस्पताल स्थापित किए जा रहे हैं और संस्था कई साझेदार संगठनों के साथ मिलकर काम कर रही है।

युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़े। उन्होंने Swami Vivekananda और Mahatma Gandhi के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि सेवा के माध्यम से ही व्यक्ति अपने जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझ सकता है। उन्होंने संस्था के “सेल्फ-सस्टेनेबल मॉडल” की भी चर्चा की, जिसमें सक्षम लोग भुगतान करेंगे ताकि गरीबों का मुफ्त इलाज संभव हो सके।

कार्यक्रम की सफलता के पीछे केवल मंच पर मौजूद कलाकार ही नहीं, बल्कि कई समर्पित लोगों की मेहनत भी शामिल रही। संस्था के दानकर्ताओं और कार्यकर्ताओं ने पूरे आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस आयोजन में अंजू देसाई, वेंकट मद्दीपति, सुमंत राजगोपाल, दिव्योगी पटेल, श्रीधरन, राधाकृष्णन, पद्मा जी, हेमा जी, सोनल जी और गिरीश मेहता का विशेष सहयोग रहा।

फोटोग्राफ्स:
अविनाश श्रीवास्तव




रचना श्रीवास्तव लॉस एंजेल्स में रहती हैं और वहां से हिंदी मीडिया के लिए नियमित लिखती रहती हैं!