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भारत से पूर्व जन्म का नाता है, इसलिए यहाँ आने के लिए हिंदी सीखीः तोमोको किकूची

मेरा मानना है कि भारत से मेरा संबंध पूर्व जन्म का है। वर्ना मैं क्यों भारत की ओर आकर्षित होती। जब मैं कक्षा 11वीं-12वीं की छात्रा थी तब टीवी पर आने वाले उन प्रोग्राम को बहुत चाव से देखती थी जिनमें भारत की संस्कृति या यहां की जानकारियां शामिल होती थी। तभी से भारत को जानने का मन बन गया। पर मुझे पता चला कि यहां बोली जाने वाली प्रमुख भाषा हिंदी है तो मैंने टोक्यो के एक इंस्टीट्यूट से हिंदी सीखना शुरू किया।

वहां आयोजित स्पर्धा में मैंने पहला स्थान प्राप्त किया और पुरस्कार में मिली छात्रवृत्ति के रूप में आगरा आकर एक साल के लिए हिंदी पढ़ने का मौका मिला। इस तरह 1992 में करीब 22 साल की उम्र में भारत आने के बाद मैं यहीं की होकर रह गई। अपने जीवन के इस अहम निर्णय और उसकी वजह से रूबरू कराया जापान मूल की लेखिका तोमोको किकूची ने।

26 साल से भारत में रहकर हिंदी और जापानी भाषा में साहित्य की सेवा कर रही यह ख्यात लेखिका ‘इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल-आह्वान’ के लिए शहर आ रही हैं। हैलो हिंदुस्तान द्वारा नईदुनिया के सहयोग से 21 से 23 दिसंबर तक आयोजित होने वाले इस आयोजन में आने से पहले तोमोको किकूची ने साहित्य और सफर के बारे में चर्चा की।

वे बताती हैं कि आगरा में एक साल पढ़कर जब मन नहीं भरा तो वे महारानी गायत्रीदेवी कॉलेज से हिंदी, समाजशास्त्र और भारतीय शास्त्रीय संगीत में बीए करने के लिए जयपुर आ गई। फिर एमए करने के लिए जेएनयू गई और पीएचडी भी हिंदी में ही कर ली। 2006 के बाद मुझे लगा कि अब क्या किया जाए तब लगा कि हिंदी और जापानी भाषा के बीच सेतु का काम किया जाए। इस तरह अनुवाद और लेखन का सिलसिला शुरू हुआ जो अनवरत जारी है।

जापान एक ऐसा देश है जो परमाणु बम की त्रासदी आज भी झेल रहा है। वहां के लोग आज भी द्वितीय विश्वयुद्ध का खामियाजा भुगत रहे हैं। इसलिए मैंने हिरोशिमा का दर्द पहले बयां किया ताकि घटना का दोहराव न हो। 1982 में जापानी भाष में लिखी गई किताब ‘हिरोशिमा नो टिका’ जो आज भी बच्चों को इस विषय में शिक्षित कर रही है सबसे पहले उसे ‘हिरोशिमा का दर्द’ नाम से हिंदी में अनुवादित किया।

साहित्य समाज का आईना भी है और समाज का पथ प्रदर्शक भी। इसलिए इसे किसी एक पक्ष में नहीं रखा जा सकता। साहित्य में कई संस्कृतियों का समावेश होता है इस नाते इसे किसी एक परिभाषा में भी नहीं बांधा जा सकता। जहां तक बात साहित्य के सुखांत या दुखांत की है तो साहित्य का उद्देश्य पाठक को आशा की किरण दिखाना है। फिर चाहे वह साहित्य भारत का हो या जापान का। समाज और संस्कृति का आपस में संबंध जरूर है लेकिन दोनों देशों की समस्याएं अलग-अलग है। फिर भी दोनों ही देशों में सुखांत पसंद किया जाता है।

सुखांत वाले साहित्य की पसंद के बावजूद दुखांत वाले साहित्य का भी कम वर्चस्व नहीं है। देश, समाज में कई परेशानियां होती है। ऐसे में जब एक निराश, हताश व्यक्ति अपने से भी ज्यादा परेशानी और हताश विवरण वाले साहित्य को पढ़ता है तो वह उसमें आशा कि किरण देख लेता है। इसलिए भी दुखांत वाले साहित्य को पसंद किया जाता है।

ऐसा नहीं कि आज की पीढ़ी साहित्य को पसंद नहीं करती। यदि पाठक साहित्य से दूर हो रहा है तो वह साहित्य की ही खामी है। वक्त के साथ संस्कृति बदलती रहती है। यदि बदलती संस्कृति के अनुरूप साहित्य का सृजन होगा तो उसे पसंद भी किया जाएगा।

साभार- https://naidunia.jagran.com/ से

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