भारत में रहने वाला हर व्यक्ति है भारतीय, जो गर्व से जय भारत और भारत माता की जय बोलता है, वह भारतवासी है। भारत का अपना अलग महान इतिहास है। दुनिया में भारत की संस्कृति, सभ्यता और परंपरा सबसे प्राचीन है।

भारत से संदर्भित 18 नाम ज्ञात हुए हैं। इनकी नामों की अर्थवत्ता है। जो सभ्यता और संस्कृति की लंबी यात्रा से उपजे हैं। भारत का परिचय प्रकृति से जुड़े तीन ग्रंथों से है। हजारों साल पहले भारत भूमि के जम्बूद्वीप का क्षेत्रफल विशाल रहा है। वह जामुन वृक्ष से भरा हुआ था। इस वृक्ष के कारण नाम जम्बुद्वीप कहा गया। पौराणिक भूगोल के अनुसार यह जामून की जन्मस्थली है। भारत के उत्तर में हिमालय की पर्वतमाला केवल भूगोल नहीं भारतीय सभ्यता की रीढ़ है। हिमालय पर्वतमाला से नाम हिमवर्ष हुआ। साधना भूमि होने से नाभिवर्ष, अजनाभ ऋषि मुनि परंपरा के प्रभाव से भारत भू-भाग तीर्थंकर की तपस्या स्मृति से जुड़ा होने से का संसार का अकेला उदाहरण है। नाभिराय के पुत्र ऋषभदेव हुए जिनके बड़े पुत्र का नाम भरत था। जिनके नाम पर सर्वप्रथम भारत कहलाया। दूसरे पुत्र का नाम बाहुबली था। जिसकी विश्व प्रसिद्ध खड़गासन मूर्ति कर्नाटक के गोमटेश्वर में है।

जम्बूद्वीप का व्यवस्थित हिस्सा नक्शे पर ही नहीं संस्कृति में भी चिह्नित किया गया। वर्ष शब्द की विशिष्टताओं का केंद्र भारतवर्ष है। आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठ आचरण वाला है। जहां यज्ञ की मर्यादा हो और कर्त्तव्य जीवन का केंद्र हो यह नाम भारत का आर्यावर्त हुआ।

उड़िसा की राजधानी भूवनेश्वर के नजदीक कुमारी पर्वत पर खण्डगिरी-उदयगिरी पहाडी पर स्थित प्राकृतिक गुफाओं में ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का शिलालेख है। उदयगिरी का अर्थ सूर्य पर्वत जिस पर 18 गुफाएं और खण्डगिरी पर्वत में 15 गुफाएं हैं। इन गुफाओं में जैन मुनि तपस्या करते थे। राजा खारवेल जैन साधुओं का भक्त था। दूसरी शताब्दी के राजा खारवेल के द्वारा उदयगिरी की गुफाओं के एक शिलालेख पर ‘भारतवर्ष’ शब्द का पहला प्रयोग शिलालेख पर उत्कीर्ण किया हुआ है।

हमारे पास भारत के के 18 नामों की लंबी परंपरा है। जो संसार के किसी देश के पास नहीं है। ये नाम जम्बूद्वीप, हिमवर्ष, अजनाभवर्ष, हिमवर्ष, नाभिवर्ष, आर्याववर्त, भारतवर्ष, अलहहिंद, ग्याहरवीं, फगुउल, होड़, हिंदुस्तान (हिंदुस्थान), हिंद, सोने की चिड़िया, सिंध और इण्डिया है।
भारत की आत्मा एक है। भारतमाता की जय किसी शब्द को नहीं अपितु हजारों-हजार वर्ष की संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, जीवन पद्धति और परंपरा से जुड़ा हुआ है। भारत का नाम मात्र देश नहीं है, बल्कि यह तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात् ज्ञान के प्रकाश की खोज है ‘भारत’। जिसकी बुनियाद तार्किकता और पुख्ता विरासत है ।

पिछले पन्द्रह वर्षों से जैन आचार्य विद्यासागर सतत् आव्हान करते रहे हैं कि-इण्डिया के कारण भारत की कुण्डली भटक गई है। उनके अनुसार इण्डिया नाम ही गड़बड़ है। भारत की पहचान को इण्डिया से विपरित दिशा में घुमाना है। भारतीय संस्कृति को पूर्व के स्थान पर पश्चिम कर दी गई है। हम ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहां से हमें विपरित दिशा की ओर जाना होगा। हम अपनी संस्कृति में परिवर्तन के साथ ही समाज का कल्याण चाहते हैं। भारत को अपने अतीत की दिशा में ले जाना होगा। संकल्प लेना होगा कि हमें भारत के अतीत के गौरव से जोड़ना होगा। भारत को अपने पूर्व की ओर जाने का रास्ता सीधा-सीधा है। भारत की नीति को सीधे चलने के लिए अच्छा बना हुआ है। रोड़ व मोड़ का रास्ता छोड़ दीजिए। नीचे देखकर चलोगे तो कभी ठोकर नहीं लगेगी।

भारत के दक्षिण में स्थित देश ने ‘सीलोन’ नाम को हटाकर अपने देश का दुनिया में ‘श्रीलंका’ परिवर्तित कर दिया। वैसे ही दुनिया में गुलाम मानसिकता की निशानी ‘इण्डिया’नाम को परिवर्तित करके ‘भारत’ नाम बदलना होगा। भारत का नाम है बड़ा प्यारा। इसे फिर से जगमगाना है। स्वाधीनता के बाद हम स्वतंत्र तो हैं। किंतु हम व्यवहार में तब ही स्वतत्र होॉगे, जब संविधान सम्मत स्वाधीन भारत का सिर्फ एक नाम होगा ‘भारत’।

 

साभार- www.vhindi.in

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