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जिहाद के बदलते रुप..

महोदय,

यह कैसी विडम्बना है कि पहले तो जिहाद के लिए निर्दोषो का कत्लेआम करो,उनकी महिलाओ,बहन बेटियो की इज्जत लूटो फिर उन्हें खुलेआम बाजार में नीलाम करने जैसे घिनौने अत्याचार करों, जिससे वे निराश व हताश होकर वहां से पलायन करने को विवश हो जायें।फिर जब पलायन होने से दुनिया इन जिहादियों को धिक्कारने लगे , तो अपना छदम् उदार रुप दिखाओं ।

इसी कड़ी में जब आई एस के अमानवीय आत्याचारो से बचने के लिए एक अबोध बालक (अयलान कुर्दी) अपने माता , पिता व भाई के साथ शरण लेने के लिए अपने देश सीरिया से दूसरे देश (ग्रीस) जा रहा था तो समुद्र में नाव डूबने से अपनी माँ व भाई के साथ उसकी भी मृत्यु हो जाती है। पर जब इस मासूम अयलान का शव समुद्र के किनारे “रहस्यमय” स्थिति में मिला तो आई एस के इन दुर्दांत आतंकियो ने शव को ही प्रचार का माध्यम बना कर सभी पलायन करने वालो को अपने धर्म का वास्ता देकर देश न छोड़ने को कहा ।आतंकी संगठन आई एस ने अपनी अग्रेजी पत्रिका “दाबिक” में समुद्र तट पर औघे मुंह पड़े अयलान के शव की दर्दनाक फ़ोटो ‘इस्लाम की जमीन छोड़ने का खतरा’ शीर्षक के साथ प्रकाशित करके दुनिया को अपने अंदाज में सन्देश भी दें दिया।इस भावुक करने वाले फ़ोटो से द्रवित होकर मानवता को शर्मसार होने से बचाने के लिए विभिन्न देश जो उनको शरण देने के लिए हिचकिचा रहें थे, ने अपने अपने द्वार इन पीड़ितों के लिए खोल दिए।

यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि आई एस को दोहरा लाभ हुआ एक तो देश न छोड़ने की बात पर उनकी ( छदम् )उदारता का प्रचार हुआ और दूसरा उन पलायन करने वाले पीडितो को बाहरी देशों में शरण मिल जाने से भविष्य में वहां भी इस्लाम का झंडा फहराया जाना सरल हो जाने की आशा से उनके “जिहाद” को भी शक्ति मिली।

क्या यह “जिहाद” का बहरुपियापन तो नहीं ? जिहाद के अनेक रुप है पर इसको समझना इतना सरल नहीं ? काश कोई स्पष्टवादी निर्भीक बुद्धिजीवी लेखक इस पर भी कभी गहन अध्ययन व शोध करके दुनिया के समक्ष इस्लामी विद्वान (स्वर्गीय) अनवर शेख व (अपने ही बंग्ला देश से निष्कासित) तस्लीमा नसरीन के सामान जिहाद का वास्तविक चरित्र उजागर करने का साहस करेंगा ?
भवदीय
विनोद कुमार सर्वोदय
नया गंज, गाज़ियाबाद

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