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सत्ता मिलते ही केजरीवाल कपिल सिब्बल हो गए!

पता नहीं क्यों ऐसा होता है कि जो सत्ता में आता है वह अपने को उन बातों में भी बदल डालता है जिनकी बदौलत वह सत्ता पाता है। तभी सवाल है कि ऐसा कैसे हुआ कि जिस जन लोकपाल के नाम पर अरविंद केजरीवाल का आंदोलन था, जिससे उनकी राजनीति बनी, पार्टी बनी और सत्ता पाई उसी जनलोकपाल में भी वे बेईमानी कर बैठे! उनका क्या बिगड़ रहा था यदि वे वही जनलोकपाल बिल विधानसभा में रख देते जिसका मसौदा उन्होंने खुद मनमोहन सरकार के सामने रखा था? अरविंद केजरीवाल की पूंजी यदि कोई है तो वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का उनका चेहरा है। याद करें उस चेहरे को जो अन्ना हजारे के साथ अनशन पर था। जिसने जन लोकपाल के लिए आमरण अनशन करके अपने को सुखाया था।
हां, अन्ना और अरविंद के चेहरे ने एक वक्त पूरे देश को दीवाना बनाया था। इन चेहरों ने पूरे देश में मनमोहन सरकार को भ्रष्टाचार में बदनाम बनाया। देश का नौजवान उठ खड़ा हुआ। संदेह नहीं उस मौके का फायदा नरेंद्र मोदी ने अधिक उठाया। लेकिन अरविंद केजरीवाल का महज तीन साल में पार्टी बना कर देश की राजधानी में छा जाना मामूली उपलब्धि नहीं है। दिल्ली उनके लिए पांच साल बाद राष्ट्रीय मिशन का लॉन्च पैड भी बन सकती है।
मगर आज वे उसी जन लोकपाल की अलख को बुझाने वाले खलनायक करार दिए जा रहे हैं। जिन प्रशांत भूषण, शांति भूषण के साथ जनलोकपाल के ड्राफ्ट में केजरीवाल ने सत्तावानों के सामने बैठ कर जुनून पैदा किया था, वे आज प्रशांत भूषण, शांति भूषण की आलोचना के केंद्र में हैं। देश सुन रहा है कि केजरीवाल महा फ्राड हैं। यह जनलोकपाल नहीं बल्कि जोकपाल है। लगता है अरविंद केजरीवाल आज वैसे ही सोच रहे हैं जैसे 2012-13 में कपिल सिब्बल सोचते थे। मतलब सरकार चलाना, राज करना है तो उसके कायदे में बंध कर कानून बनाना होगा। प्रणब मुखर्जी, कपिल सिब्बल, पी. चिदंबरम ने जनलोकपाल को जोकपाल बनाने की उस वक्त जैसी जिद्द की थी वही जिद्द आज अरविंद केजरीवाल की है!

क्यों?
इसलिए कि वे आज मुख्यमंत्री हैं। सत्ता में हैं!

सत्ता ने एक आदमी को कितना व कैसा बदला है इसकी मिसाल आज अरविंद केजरीवाल बन गए हैं!

यह बहुत त्रासद है। हिसाब से केजरीवाल को सीधा, सच्चा, सरल और आंदोलनकारी बना रहना चाहिए था। सत्ता में आ कर भी सिस्टम के खिलाफ, सिस्टम को ठोकने के लिए उन्हें जितनी तरह के कदम उठाने चाहिए थे, उठाने थे। उन्होंने थीसिस दी थी कि चोरों से लड़ने के लिए पहली जरूरत राजनीति है। सत्ता में आना है। अब सत्ता में हैं और दो-तिहाई बहुमत वाली सत्ता है तब भी अरविंद केजरीवाल को क्यों यह सोचते हुए काम करना चाहिए कि जनलोकपाल ऐसा बने, जो उनके कहे में रहे। मतलब वह राजनीतिबाजों की दबिस में रहे। नेता के हाथों नियुक्त हो और नेता उसे हटाने का अधिकार रखते हों।

सचमुच प्रशांत भूषण की विधेयक को ले कर जितनी आपत्तियां हैं वे इसलिए सही हैं क्योंकि मनमोहन सरकार के साथ ड्राफ्ट बनवाते वक्त अरविंद केजरीवाल के जो तेवर थे वे तेवर उनके खुद के बनाए आज के जनलोकपाल विधेयक में नहीं हैं। वे आंदोलन की भावना, भ्रष्टाचार और खासकर नेताओं, अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जेहाद छेड़ने के मकसद से नहीं है। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने जनलोकपाल आंदोलन की भावना, आत्मा को मार कर विधेयक बनाया है।
यही नहीं ऐसा करते वक्त भी ऐसी पंगेबाजी की बातें विधेयक में डाली हैं जिससे केंद्र सरकार इस बिल को विधानसभा से मंजूरी के बाद भी नहीं मानेगी। एक तरह से केजरीवाल सरकार के कानून का मकसद केंद्र सरकार से पंगेबाजी है न कि दिल्ली की छोटी प्रयोगशाला में कानून से भ्रष्टाचार विरोधी प्रभावी मेकेनिज्म बनवाने का मकसद है।
अरविंद केजरीवाल क्यों ऐसा कर रहे हैं? वजह राजनीति में रंगना और महत्वकांक्षा है। वे अब सच्चे आंदोलनकारी नहीं रहे। यों यह बात प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव याकि अन्ना की पूरी टीम पर लागू है। यदि आज 2012-13 के आंदोलन के उन चेहरों को याद करें और सम्यक भाव सोचें तो ले दे कर यह इमेज उभरेगी कि अन्ना हजारे अकेले सही व्यक्ति निकले। उन्होंने दिल्ली में पैदा हुए आंदोलनकारियों उर्फ केजरीवाल, प्रशांत, योगेंद्र, रामदेव सबकी समय रहते हकीकत समझी। सबसे दूरी बनाई और अपने घर जा बैठे। अन्ना हजारे राजनीति, सत्ता के पीछे नहीं भागे। अपनी सीमाएं समझते हुए उन्होंने अपने आपको समेटे रखा।
बहरहाल, दिल्ली विधानसभा में पेश जनलोकपाल इस हकीकत का प्रमाण है कि सत्ता सबको भटका देती है। अरविंद केजरीवाल का भटकना इसलिए त्रासद है क्योंकि वे पुरानी, परंपरागत राजनीति के बीच नौजवानों की चाहना से बना अभिनव प्रयोग था। लगा कि सिविल सोसायटी और एनजीओ जमात से भी लोग निकल कर नेतृत्वकर्ता बन सकते हैं। मगर अरविंद केजरीवाल से ले कर प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव की पूरी जमात ने यह हकीकत उजागर की है कि परंपरागत राजनीति में फिर भी सब सामूहिकता, विचारधारा, जिम्मेवारियों में बंधे होते हैं। कांग्रेस और भाजपा में दस तरह के लोग खप सकते हैं जबकि सिविल सोसायटी और एनजीओ की तो धुरी ही व्यक्तिवाद है, महत्वकांक्षा है। इसमें कोर याकि आत्मा को भी घोंट देने में हिचक नहीं है।
हां, जनलोकपाल का मुद्दा आप पार्टी की आत्मा है। यदि आत्मा के साथ ही अरविंद केजरीवाल ने खेल खेला है तो फिर आप पार्टी में बचेगा क्या? भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई और ईमानादी झंडे के बिना पंजाब में फिर केजरीवाल अपने को कैसे बेच सकेंगे?

साभार-http://www.nayaindia.com/ से

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