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कोटा गढ़ और राव माधोसिंह संग्रहालय

 हाड़ोती के शासकों का राजसी जीवन, पर्व -उत्सव की परंपरा, गंजीफा – शिकार आदि मनोरंजन के माध्यम, चित्रकला प्रेम, आभूषण,वेशभूषा, स्थापत्य प्रेम, अस्त्र – शस्त्र, व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुएं आदि संस्कृति को नजदीक से देखना – महसूस करना चाहते हैं तो राजस्थान में कोटा का राव माधोसिंह संग्रहालय अवश्य देखना चाहिए।
 कोटा गढ़ स्थित राव माधोसिंह संग्रहालय कोटा,बूंदी और झालावाड़ जिलों के राजकीय संग्रहालयों के पूरक संग्रहालय के रूप में महत्वपूर्ण है। राजकीय संग्रहालय खास तौर पर सम्पूर्ण कोटा परिक्षेत्र की मूर्ति कला का विशद प्रदर्शन की दृष्टि से महत्व रखते हैं वहीं राव माधोसिंह संग्रहालय रियासत युगीन संस्कृति का परिचायक है। यहां प्रदर्शित सामग्री रियासत कालीन संस्कृति का प्रतिबिंब है और पर्यटकों को रजवाड़े की परम्पराओं का दिग्दर्शन करती है।
  कोटा परिक्षेत्र की रियासती कला, संस्कृति एवं इतिहास के दिग्दर्शन के लिये राव माधोसिंह ट्रस्ट संग्रहालय की स्थापना 20 मार्च 1970 को कोटा के महाराव भीमसिंह द्वितीय द्वारा की गई थी। यह संग्रहालय कोटा के टिपटा स्थित प्राचीन गढ़- महल में स्थित है।
संग्रहालय और महलों को देखने के लिए पर्यटक गढ़ के मुख्य द्वार से प्रवेश कर खुर्ररे के चढ़ाई वाले मार्ग को पार करते एक विशाल चौक में पहुंचते हैं जिसे जलेब चौक  कहा जाता है। जलेब चौक में कभी जेठी पहलवानों की कुश्ती हुआ करती थी। चौक के पूर्व की ओर एक कलात्मक छत्रियों से निर्मित विशाल दरवाज़ा दिखाई पड़ता है। यह दरवाज़ा नक्कारखाने का है। इसी इमारत की बग़ल में एक विशाल बुर्ज दिखाई पड़ती है जो जन्तरबुर्ज कही जाती है। यहां से आषाढ़ माह में प्रतिवर्ष ज्योतिष के विद्वानों द्वारा हवा के रुख से वर्षा का अनुमान लगाया जाता है।   पश्चिम की बांईं तरफ कोने में एक कुंवर पदा के महल दिखाई देते हैं जिसकी बाहरी दीवारों पर कलात्मक बेल- बूटे बने हैं। यहीं पर ज़नानी ड्योढ़ी का दरवाज़ा निर्मित है जिसकी बग़ल में लाल पत्थरों की ख़ूबसूरत जालियों से सजा विशाल महल है जिसे महाराव उम्मेद सिंह जी द्वितीय (ई० सन् 1889 से 1940) ने अपनी महारानी केसर कुंवर के लिए बनवाया था।  जलेब चौक की ओर  संग्रहालय में प्रवेश के लिए मुख्य विशाल द्वार है। इसके दोनों ओर छज्जों पर दो विशाल हाथियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। हाथियापोल दरवाज़े का निर्माण महाराव भीमसिंह प्रथम ने करवाया था।
बताया जाता है कि महाराव भीमसिंह ने बूंदी पर दो बार आक्रमण कर बूंदी पर अधिकार कर लिया था। दूसरी बार की चढ़ाई के समय वह वहां के राज महल के बाहर स्थित पत्थर के हाथियों की प्रतिमा कोटा ले आए थे जिनको उन्होंने कोटा गढ़ में स्थित हाथियापोल दरवाज़े के दोनों और स्थापित करवाया था। हाथियापोल दरवाज़े के ऊपर लाल छतरी निर्मित है। इस द्वार की बाहरी दीवार पर दरवाजे के दोनों ओर कोटा चित्र शैली में दो सुन्दर द्वार रक्षिकायें चित्रित हैं। इन्हें कोटा के प्रसिद्व चित्रकार स्वर्गीय प्रेमचन्द शर्मा ने अपने भाई के साथ मिलकर बनाया था। दरवाजे की छत भी चित्रात्मक हैं जो देखते ही बनती है।
कोटा राज्य की 1632 ई. में स्थापना के साथ प्रथम शासक राव माधोसिंह ने एक भव्य राजमहल का निर्माण कराया। माधोसिंह द्वारा निर्मित इसी राजमहल में यह संग्रहालय स्थित है। संग्रहालय के साथ – साथ  पर्यटक कोटा के इस गढ़ को तथा इसमें समय- समय पर निर्मित किए जाने वाले विविध प्रकार के भवन निर्माण  एंव महलों का भी अवलोकन कर सकते हैं। संग्रहालय के मुख्य कक्ष अखाड़े के महल या दरबार हॉल, सिलहखाना एवं उसके बरामदे, अर्जुन महल, छत्र महल, बड़ा महल, भीम महल तथा आनन्द महल इसी राजमहल में स्थित हैं।
टिकट लेकर पर्यटक एक छोटे से द्वार से संग्रहालय के बड़े चौक में पहुंचते हैं और सामने दरबार हाल में संग्रहित सामग्री देखते हैं। संग्रहालय  में प्रदर्शित सामग्री विविध कक्षों में अवस्थित है जो कि इस प्रकार हैं। 1. दरबार हॉल, विविध राजसी वस्तुओं का कक्ष 2. शस्त्र कक्ष 3. वन्य पशु कक्ष 4. फोटो गैलरी 5. चित्रकला कक्ष 6. चित्रित एवं अलंकृत राजमहल 7. अर्जुन महल के भित्ति चित्र 8. दीवान-ए-खास या भीम महल 9. बड़ा महल-भित्ति चित्र एवं जड़ाई का काम 10. छत्र महल के भित्ती चित्र। इन कक्षों में से प्रथम छह पहली मंजिल, दसवां कक्ष तीसरी मंजिल तथा बाकी सब दूसरी मंजिल पर अवस्थित हैं।
 
 दरबार हाल दीर्घा
 दरबार हॉल के बाहर के बरामदे में खगोल यंत्र, जलघड़ी, धूपघड़ी, काष्ठ घोड़ा तथा नौबते वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। दरबार हॉल में राजसी सामान दर्शाये गये हैं। ये सामान सोने-चांदी, पीतल तथा अष्टधातु, हाथी दांत, काष्ठ तथा वस्त्राभूषण आदि अनके प्रकार के हैं। इनमें से अधिकांश वस्तुओं का  उपयोग कोटा राजाओं और महारानियों द्वारा  व्यक्तिगत तौर पर किया जाता था। मुख्य रूप से ये वस्तुएं पूजा कार्य, मनोरंजन या आराम के साधन एवं सवारी आदि से सम्बन्धित हैं। इनमें से कुछ प्रमुख आकर्षक वाद्य यंत्र, गंजफा खेल, चौपड़-चौसर, राजसी परिधान, सवारी सामग्री, कलात्मक वस्तुएं आदि का प्रदर्शन किया गया है। यह दरबार हॉल इनके अतिरिक्त विविध संग्रहों से परिपूर्ण हैं कि सभी का ब्यौरा काफी विस्तार चाहता है। इनमें कुछ प्रमुख सामग्री है – श्रीनाथजी का चांदी का सिंहासन व बाजोट, सुनहरी, हाथीदांत और चांदी की जड़ाई की कुर्सियां, हाथीदांत के ढोलण के पाये, चांदी की पिचकारियां, जड़ाऊ पालना, प्राचीन सिक्के, कागज पर लगने वाली रियासत की 95 मोहरें, रूईदार सदरी सुनहरी, चांदी तथा हाथीदांत के बने पंखों की डंडियां, सोने चांदी के जड़े नारियल, तीन शो केसों में रखे प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ, केरोसीन से चलने वाला प्राचीन पंखा तथा पुराने जमाने के विविध किस्म के ताले और चाबियां हैं। तैरने का तख्ता जिसमें 4 तुम्बे लगे हुए हैं भी यहां प्रदर्शित किया गया है जिसका उपयोग पहले राजमहल के चौक के हौज में तैरने के लिये किया जाता था।  झाला जालिम सिंह के नहाने का 20 सेर पानी का पीतल का चरा भी यहां है। महाराव उम्मेद सिंह जी और एक सजे हुए हाथी और घोड़े के विशाल नमूने भी यहां आकर्षण का केंद्र हैं।
 
 शस्त्र दीर्घा
दरबार के आगे राजमहल के दाहिनी ओर की गैलेरी में मध्ययुगीन अस्त्र-शस्त्रों के अलावा कोटा के शासकों द्वारा काम में लिए गए शस्त्र भी कांच के शोकेसों में सजा कर प्रदर्शित किये गए हैं। एक म्यान में दो तलवारें, पिस्तौल,  तलवार, ढालें, अनेक प्रकार की कटारें, भालें, बरछे, नेजे, तीर-कमान, फरसा, गदा, खुखरी, गुप्तियां, छड़ियां, खंजर, पेशकब्जा, कारद, बन्दूकें, सुनहारी पिस्तौल के अलावा राज्य का झण्डा, निशान, सुनहरी चोब, सुनहरी मोरछल एवं चंवर दर्शनीय हैं। सोने का मुगल-कालीन राजकीय चिन्ह माही मरातिब भी इसी कक्ष में देखा जा सकता है। यह कोटा के शासक महाराव भीमसिंह (प्रथम) को उनकी  सेवाओं के लिए मुगल बादशाह मोहम्मदशाह ने 1720 ई. में प्रदान किया था। इसी मुगल शासक द्वारा प्रदत सर्वधातु की नक्कारा जोड़ी तथा योद्धा एवं अश्व को पहनाने का जिरह बख्तर भी माधोसिंह संग्रहालय के अनूठे संग्रह हैं।
वन्यजीव दीर्घा
 शस्त्र प्रदर्शन के आगे वन्यजीव दीर्घा में कोटा के राजपरिवार के सदस्यों द्वारा शिकार के दौरान मारे गए चुनिन्दा वन्य जीव प्रदर्शित हैं। जिनमें शेर, तेन्दुआ, सिंह, सांभर, भालू, घड़ियाल, गौर मछली, खरमौर एंव काले तीतर आदि सम्मिलित हैं। सैकड़ों वर्षों पूर्व मारे गए जीव-जन्तु विशेष रासायनिक तकनीक से सुरक्षित रखे हुए हैं जो आज भी जीवन्त प्रतीत होते हैं।
 छायाचित्र दीर्घा
वन्यजीव कक्ष से लगे छायाचित्र कक्ष में 1880 ई. से वर्तमान काल तक के अनेक छायाचित्र संग्रहित हैं। सन 1857 की क्रान्ति के दौरान कोटा में किस स्थान पर क्या घटना घटित हुई थी इसका चित्रण यहाँ  एक मानचित्र में प्रदर्शित किया गया है। इसे कोटा के पूर्व महाराव बृजराज सिंह ने तैयार किया था।
  चित्रकला दीर्घा
 इस दीर्घा में मुगल तथा कोटा-बूंदी के चित्रों को प्रदर्शित किया गया है। चित्रकारों द्वारा बनाए गए इन कलात्मक चित्रों में गज एवं अश्व, विश्व दर्शन, श्रीनाथजी का नवनिधि चित्र जिसमें गोस्वामी बालकों को विशेष वेशभूषा में दर्शाया गया है, कोटा चित्र शैली के प्रतिनिधि चित्र हैं।
 राजमहल कक्ष
 जब पर्यटक इन दिर्घाओं को देख कर वापस बाहर आते हैं तो समीप में ही राजमहल कक्ष भी संग्रहालय का ही हिस्सा है जिसमें अभी भी राजगद्दी की प्रतिकृति रखी है। रियासत काल में यहीं पर दरीखाना भी होता था। दरबार राजगद्दी पर बैठते थे और उमराव, सामन्त, उच्च अधिकारी, राज मान्यता प्राप्त विशेष जन हाड़ोती की राज दरबारी पोषाक में अपने निर्धारित स्थान पर बैठते थे। इस कक्ष में कांच की कारीगरी का काम मुगलयुगीन है। कांच की कारीगरी,मीनाकारी, डाक की जड़ाई, जामी कांच की जड़ाई, गोलों के कांच की जड़ाई, साण की जड़ाई कोटा के बेगरी परिवार के शिल्पकारों द्वारा नवीनीकृत है। राजमहल की दीवारों में सफेद चूने में गहरे नीले, हरे तथा कत्थई रंगों के कांच का आकर्षक काम है। इसी कक्ष में कोटा राज्य का केसरिया गरूड़ ध्वज एक चित्र पर प्रदर्शित है। दाहिनी ओर कोटा राज्य का सुन्दर नक्शा, बाई ओर बूंदी राजघराने का वंशवृक्ष तथा उसी के पास कोटा राजघराने का वंशवृक्ष है।
राजमहल की ऊपरी मंजिल पर एक सुंदर बारहदरी बनी हुई है जहां से चंबल नदी की ओर का कोटा का दृश्य मनोहारी प्रतीत होता है। इसके आगे जाने पर अधिकांश कक्ष चित्रित हैं, जिनमें लक्ष्मी भंडार तिबारी, अर्जुन महल, छत्र महल में कोटा शैली के अनुपम भित्ति चित्र बने हैं। भीम महल में लगे कालीन बहुत सुन्दर एवं कलात्मक है जिन्हें कोटा जेल के कैदियों ने बनाया था। तीसरी मंजिल पर स्थित बड़ा महल का निर्माण कोटा के प्रथम शासक राव माधोसिंह (वि.सं.1681-1705) ने करवाया था। इस महल में राजस्थान की सभी चित्र शैलियों में भित्ति चित्र बनाए गए है। पूरा महल चित्रों से भरा हुआ है। सवारी, दरबार और उत्सव आदि विविध विषयों को कलमकारों ने प्राकृतिक रंगों से चित्रित किया है। महल के बाह्य कक्ष में अधिकांश चित्र कांच के फ्रेम में दीवार पर जड़े हुए हैं। इसी से लगा हुआ एक आकर्षक झरोखा है, जिसे सूरज गोख कहते हैं। इसमें रंगीन कांच का काम बड़ा ही सुन्दर बन पड़ा है।
महलों के कमरों,दीवारों,स्तम्भों,आलों, झरोखों में बहुतायत में बने भित्तिचित्र दर्शनीय हैं। कोटा-बून्दी शैली में निर्मित चित्र कहीं-कहीं मुगल और एंग्लो कला से भी प्रभावित हैं। अर्जुन महल के चित्र विख्यात हैं। पहले इन्हें विशेष अनुमति से ही देख सकते थे पर अब इन्हें संग्रहालय का हिस्सा बना दिया गया हैं। अर्जुन महल आज भी विशेष अनुमति प्राप्त कर देख सकते हैं। संग्रहालय प्रातः 9.30 बजे से सायं 6.00 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है। सोमवार को साप्ताहिक अवकाश के साथ-साथ राष्ट्रीय पर्वों के दिन बंन्द रहता है।
(लेखक कोटा में रहते हैं और राजस्थान जनसंपर्क के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं) 
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