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मुस्लिम जगत – पश्चिम एशिया में उथल-पुथल यमन का अमन खतरे में

एक बार फिर यमन का अमन खतरे में पड़ गया है। दुनिया को यह चिंता सताने लगी है कि अदन से मिलने वाले खनिज तेल का प्रवाह रुक गया तो विश्व के आर्थिक मोर्चे पर भूचाल आ सकता है। दुनिया के कई देश मंदी से जूझ रहे हैं, ऐसी स्थिति में खनिज तेल की पूर्ति न हो पाना और भी चिंता उपजा देने वाली बात है। इस क्षेत्र की दो बड़ी ताकतें सऊदी और ईरान की मिलीभगत से यह युद्ध चल रहा है। जब से दुनिया अस्तित्व में आई तब से पश्चिमी एशिया में केवल दो ही भौगोलिक इकाइयों की चर्चा हुआ करती थी उनमें एक था अरब और दूसरा था ईरान। समय के साथ अरब का क्षेत्र अनेक देशों में बंटता चला गया जिसका सबसे बड़ा क्षेत्र जो आज सऊदी अरब कहलाता है, प्रारंभ से उसका अधिकांश भाग यमन का ही प्रदेश था। यहां की जलवायु अत्यंत शुष्क थी। पश्चिम एशिया में इस क्षेत्र के मूल निवासी अरब कहलाए। इसके अधिकांश भागों में मानव जीवन के लिए अनेक चुनौतियां थीं। लेकिन उसका पड़ोसी क्षेत्र हरा-भरा और खेती बाड़ी वाला प्रदेश था। जिसे ईरान का नाम दिया गया।
 
ईरान में मुख्यत: जरथ्रुष्ट के अनुयाई थे जिन्हें आज पारसी कहा जाता है। लेकिन जहां भी कहीं मरुभूमि वाले प्रदेश थे उनमें अनेक नगर बसे और मानव सभ्यता वहां की आबोहवा के अनुसार विकसित हुई। आज तो इस अरब प्रदेश में लगभग 16 देशों का समावेश होता है। जिसमें क्षेत्रफल के आधार पर सऊदी सबसे बड़ा है। इसी सऊदी में पश्चिमी एशिया के तीन बड़े पंथ जन्मे जिन्हें यहूदी, ईसाइयत और इस्लाम के नाम से जाना जाता है। समय-समय पर तीनों पंथ के अनुयाई अपने रिेगस्तानी प्रदेश से बाहर निकले और तीनों बड़े पंथों के प्रचारक बन गए। इनमें सबसे पुराना पंथ यहूदियत है उसके पश्चात ईसाइयत आता है। अंत में मक्का नगर में पैगम्बर मोहम्मद साहब का जन्म हुआ। जिन्होंने इस्लाम को प्रतिपादित किया। तीनों पंथों की जन्मभूमि का परिसर रेगिस्तान ही है। इन तीनों के पास अपनी मजहबी पुस्तकें हैं। जिन्हें हम जबूर, बाइबिल और कुरान कहते हैं।
 
ईसामसीह का जन्म यरुशलम के निकट हुआ लेकिन मोहम्मद साहब के जन्म की नगरी होने का सौभाग्य मक्का को हुआ। एक ही पिता आदम की संतानें अनुयायी होने का दावा करती हैं। लेकिन तीनों के बीच भारी अंतर और मतभेद हैं। बड़े पैमाने पर इस्लाम के प्रचार-प्रसार के कारण इन तीनों मजहब-पंथों के बीच हमेशा टकराव रहा। ये संघर्ष ही अब तक युद्ध के रूप में चले आए हैं। अरब प्रायद्वीप के इन तीनों मजहब-पंथों में समय-समय पर जो संघर्ष होते रहे हैं वही आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति कहलाती है। इस बार मजहबी खूनी संघर्ष में एक बार फिर से प्राचीन देश यमन हिंसा और उठापटक की राजनीति का केन्द्र बन गया है। दो भागों में बंटा यमन इस्लाम के अंतर्गत भी आज सबसे जटिल समस्या बनकर उभरा है। यमन के पहाड़ों में अलग-अलग मुस्लिम पंथों ने किस प्रकार मजहब की आड़ में राजनीति की उसका इतिहास खून से लथपथ है। वहां एक पंथ दूसरे के विरुद्ध और एक मजहबी नेता दूसरे के साथ टकरा रहा है। इतिहास में अब तक जो घटित हुआ है वह फिर से घट रहा है। यहां तीनों मजहबों में गुत्थमगुत्था है।
 
सभ्यता के लिए जन्मे यहां के तीनों मजहब आज राजनीति कर हिंसा के प्रेरणास्रोत बन गए हैं। जिन हौसियों के विरुद्ध सऊदी अरब और खाड़ी के देश एक साथ हैं, यही हौसी सऊदियों और उनके साथियों के अभिन्न मित्र थे। जब कर्नल नासिर ने अरब देशों को संगठित करने का संकल्प किया तो यमन पर उस समय इमाम बदर का राज था। नासिर के तीन दुश्मन-सऊदी, जॉर्डन और ईरान का समर्थन था। तत्कालीन यमन की सरकार को अब्दुल्ला अल सलासल को नासिर एवं रूस का समर्थन प्राप्त था। इस गृहयुद्ध में सऊदी, जॉर्डन और ईरान के शाह की हुकूमत की ओर से हौसी सत्ताधीशों को हथियार और धन के बदले नासिर ने लोकतंत्र की हिमायत में 70 हजार मिस्र के सैनिक उतार दिये। बदर ने भागकर सऊदी में शरण ली। 1965 में सऊदी और उनके समर्थकों ने ईरान के शाह का साथ छोड़ने में ही अपना भला समझा और 1968 में इस्रायल के हाथों करारी हार हो जाने के पश्चात वे चारों कोने चित हो गए। इसके फलस्वरूप उनकी सैनिक टुकडि़यां यमन, मिस्र तथा वियतनाम से वापस बुला लीं। लेकिन इसका एक परिणाम यह आया कि उत्तरी यमन पर रिपब्लिकन की सरकार कायम हो गई।
 
इस प्रकार हौसी जो हजारों साल से राज कर रहे थे उनका युग समाप्त हो गया। इधर दक्षिण यमन में अब तक ब्रिटिश सरकार थी लेकिन 1967 में ब्रिटेन ने इस भाग को स्वतंत्र कर अपनी सत्ता समाप्त कर दी। इस प्रकार अदन बंदरगाह सहित कुछ तटवर्ती क्षेत्रों के साथ एक नया देश कायम हो गया। जो दक्षिण यमन के नाम से जाना जाने लगा। वहां मार्क्सवादी सरकार बन गई। लेकिन 1990 में दक्षिण और उत्तरी यमन फिर एक हो गए। जिसके राष्ट्रपति अब्दुल्लाह सालेह मनोनीत किये गए। सऊदी और यमनी टकराव बहुत पुराना है। लेकिन बीच-बीच में उनमें एकता भी स्थापित होती रही। आसर और नजरान का यमनी क्षेत्र सऊदियों ने अपने राज में शामिल कर लिया। इसके बदले में सऊदियों ने यमनियों को अपने यहां आने-जाने और व्यापार करने की आज्ञा प्रदान कर दी। यमन एक बंजर देश होने के कारण यमनियों को सऊदी में काम धंधा मिलने लगा। इस प्रकार यह क्षेत्र सऊदियों पर निर्भर हो गया। लेकिन उनका कबीलाई चरित्र आज भी ज्यों का त्यों है। वे सऊदियों को घुसपैठिया कह कर यहां से निकालने के लिए आतुर हैं।
 
ईरान में जब तक राजाशाही रही सऊदियों को हौसियों से कोई बड़ी और कड़वी शिकायत नहीं रही। लेकिन ईरान में क्रांति होने के बाद सऊदियों को यह शंका होने लगी कि ईरानी इन हौसियों को सऊदी के विरुद्ध उपयोग कर सकते हैं। लेकिन इस बीच हौसियों को ऐसा लगने लगा कि सऊदी उन्हें अपनी मजहबी कट्टरता में ढालने का प्रयास कर रहे हैं। सऊदी में जो सुन्नी कट्टरवाद है उसकी छाया उन पर पड़ती हुई दिखलाई दी। इस कारण सऊदी ने उत्तरी और दक्षिणी यमन के एक हो जाने को भी बर्दाश्त कर लिया। 1990 में संयुक्त यमन ने कुवैत पर अधिकार जमाने वाले सद्दाम का विरोध और राष्ट्रसंघ के सदस्य होने के उपरांत भी अमरीका की संयुक्त सैनिक कार्यवाही करने के पक्ष में वोट देने से इनकार कर दिया तो यमन के लिए बड़ा भारी संकट पैदा हो गया। एक ओर तो ईरान ने इसे आर्थिक सहायता देना बंद कर दिया और सऊदी अरब ने यमनियों को इसकी सजा देने के लिए रातोंरात साढ़े सात लाख यमनियों को कूच करने का आदेश दे दिया। इस प्रकार एक सप्ताह में ही यमन की आबादी पांच प्रतिशत बढ़ गई।
 
 
जब 1994 में यमन ने विलय से अलग होने के लिए सशस्त्र कार्यवाही का रास्ता चुना तो दक्षिणी यमन के विद्रोहियों की सभी प्रकार से सहायता की गई। इसी बीच वहां खनिज तेल निकल आया तो वे संकट को झेल गए। सऊदी की सहायता के बिना भी उन्हें स्वयं के आत्मनिर्भर हो जाने का विश्वास पैदा हो गया। लेकिन इस तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता कि खनिज तेल उन्हीं स्थानों पर मिला जो सऊदी की सीमा से लगे हुए थे। इसी समय दोनों देशों के बीच 1934 के समझौते की समाप्ति की अवधि आ गई। लेकिन तेल के वरदान से उत्साहित होकर दोनों देशों ने अपने समझौते की सीमाओं को एक हजार किलोमीटर तक आगे बढ़ा दिया। बड़ी कठिनाई से सन 2000 में जेद्दाह समझौते के तहत दोनों देश अपनी सीमाएं निर्धारित करने में सफल हो गए। लेकिन अभी तो सरहद का झगड़ा मिटा ही था कि अमरीका में 11/9 की घटना घट गई।
 
अलकायदा के शस्त्रधारियों को यमन के पहाड़ों में छिपने का स्थान मिल गया। इस पर यमन की सालेह सरकार और सऊदी अरब को बातचीत के लिए तैयार हो जाना पड़ा। नतीजा यह हुआ कि यहां ड्रोन से हमले होने लगे। शोकांतिका की सीमाएं तो उस समय टूट गईं जब यमन के जैदियों और सरकार के बीच ठन गई। सऊदी के प्रयासों से 2010 में इन दोनों के बीच समझौता हुआ। लेकिन यमन का दुर्भाग्य यहां भी उसके साथ बना रहा। इस बीच अरब वसंत की ध्वनि चारों ओर से सुनाई देने लगी इसलिए अली अब्दुल्ला सालेह की सरकार के विरुद्ध जनता उठ खड़ी हुई। इन्हें यमन छोड़ कर सऊदी में शरण लेनी पड़ी।
 
साभार-साप्ताहिक पाञ्चजन्य से

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