आप यहाँ है :

एक पत्र ने बदल दी थी गिरीश कर्नाड की सोच

हिंदी व कर्नाटक फिल्म जगत को को कई बेहतरीन फिल्में देने वाले फेमस साहित्कार और बॉलीवुड अभिनेता गिरीश कर्नाड का आज निधन हो गया। गिरीश की मौत उनके बेंगलुरु स्थित घर पर 10 जून को सुबह 6.30 बजे हुई है। गिरीश की उम्र 81 वर्ष थी। उनका जन्म 19 मई, 1938 को महाराष्ट्र के माथेरान में हुआ था। उनको बचपन से ही नाटकों में रुचि थी। स्कूल के समय से ही थियेटर में काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने 1970 में कन्नड़ फिल्म संस्कार से बतौर स्क्रिप्ट अपने करियर की शुरूआत की थी।

गिरीश कर्नाड के निधन पर मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कर्नाटक में तीन दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा की. इस दौरान एकदिवसीय सार्वजनिक छुट्टी का ऐलान भी किया गया.

वे एक अभिनेता होने के साथ-साथ लेखक, और निर्देशक भी थें। गिरीश कर्नाड पिछले कई दिनों से बीमार थे. पीएम नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर शोक जताया है. गिरीश कार्नाड का जन्म 19 मई 1938 को महाराष्ट्र के माथेरान में हुआ था. उन्हें भारत के जाने-माने समकालीन लेखक, अभिनेता, फिल्म निर्देशक और नाटककार के तौर पर भी जाना जाता था. गिरीश कर्नाड के निधन से बॉलीवुड में शोक का माहौल है. गिरीश कर्नाड की हिंदी के साथ-साथ कन्नड़ और अंग्रेजी भाषा पर भी अच्छी खासी पकड़ थी.

गिरीश कर्नाड अपने लेखन शैली को लेकर प्रसिध्द थे, उन्हें इस बात के लिए भी जाना जाता है कि उन्होंने ऐतिहासिक पात्रों को आज के संदर्भ में देखा और उससे समाज को रूबरू कराया। उन्होंने कई ऐसे नाटक लिखे हैं जो इसके सबूत बनें है, इसमें उनके तुगलक, ययाति व अन्य नाटक शामिल है। कर्नाड ने ऐसे कई नाटक और कहानी लिखी है गिरीश कर्नाड को वैसे कई सारे पुरस्कारों से नवाजा गया है। उन्हें 1994 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार, 1974 में पद्म श्री, 1992 में पद्म भूषण, 1972 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1992 में कन्नड़ साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार और 1998 में उन्हें कालिदास सम्मान से सम्‍मानित किया गया है।

गिरीश कर्नाड ने 1970 में कन्नड़ फ़िल्म ‘संस्कार’ से अपना फ़िल्मी सफ़र शुरू किया. उनकी पहली फ़िल्म को ही कन्नड़ सिनेमा के लिए राष्ट्रपति का गोल्डन लोटस पुरस्कार मिला.

हिंदी में उन्होंने ‘निशांत’ (1975), ‘मंथन’ (1976) और ‘पुकार’ (2000) जैसी फ़िल्में कीं. नागेश कुकुनूर की फ़िल्मों ‘इक़बाल’ (2005), ‘डोर’ (2006), ‘8×10 तस्वीर’ (2009) और ‘आशाएं’ (2010) में भी उन्होंने काम किया. इसके अलावा सलमान ख़ान के साथ वो ‘एक था टाइगर’ (2012) और ‘टाइगर ज़िंदा है’ (2017) में भी दिखाई दिए थे।

आर के नारायण की किताब पर आधारित टीवी सीरियल मालगुड़ी डेज़ में उन्होंने स्वामी के पिता की भूमिका निभाई जिसे दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया था और यह आज भी उतनी ही मशहूर है.

1990 की शुरुआत में विज्ञान पर आधारित एक टीवी कार्यक्रम टर्निंग पॉइंट में उन्होंने होस्ट की भूमिका निभाई जो तब का बेहद लोकप्रिय साइंस कार्यक्रम था. उनकी आखिरी फिल्म कन्नड़ भाषा में बनी अपना देश थी, जो 26 अगस्त को रिलीज हुई. बॉलीवुड की उनकी आखिरी फ़िल्म ‘टाइगर ज़िंदा है’ (2017) में डॉ. शेनॉय का किरदार निभाया था.

उनकी मशहूर कन्नड़ फ़िल्मों में से तब्बालियू मगाने, ओंदानोंदु कलादाली, चेलुवी, कादु और कन्नुड़ु हेगादिती रही हैं.

एक बार अपने लिखने की शैली में लेकर गिरीश कर्नाड ने अपने एक लेख में बताया था, ”जब मैं 17 साल का था, तब मैंने आइरिस लेखक ‘सीन ओ कैसी’ की स्केच बनाकर उन्हें भेजा, तो उसके बदले उन्होंने मुझे एक पत्र भेजा। पत्र में उन्होंने लिखा था कि मैं यह सब करके अपना वक्त जाया न करूं, बल्कि कुछ ऐसा करूं, जिससे एक दिन लोग मेरा ऑटोग्राफ मांगे। उन्होंने अपने लेख में बताया कि इस खत के बाद ‘मैंने पत्र पढ़कर ऐसा करना बंद कर दिया।

गिरीश कर्नाटक आर्ट कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड जाकर आगे की पढ़ाई पूरी की और फिर भारत लौट आए। चेन्नई में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस में सात साल तक काम किया। इस दौरान जब काम में मन नहीं लगा तो नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वे थियेटर के लिए समर्पित होकर काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में प्रोफेसर के रूप में काम किया। जब वहां जमा नहीं तो दोबारा फिर भारत का रुख किया। इस बार उन्होंने भारत में रुकने का मन बना लिया था और वो पूरी तरह साहित्य और फिल्‍मों से जुड़ गए। इस दौरान उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं में कई फिल्में बनाई।

गिरीश कर्नाड ने प्रमुख भारतीय निदेशको – इब्राहीम अलकाजी, प्रसन्ना, अरविन्द गौड़ और बी.वी. कारंत ने इनका अलग- अलग तरीके से प्रभावी व यादगार निर्देशन किया था. एक कोंकणी भाषी परिवार में जन्में कार्नाड ने 1958 में धारवाड़ स्थित कर्नाटक विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि ली थी. इसके पश्चात वे एक रोड्स स्कॉलर के रूप में इंग्लैंड चले गए जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड के लिंकॉन तथा मॅगडेलन महाविद्यालयों से दर्शनशास्त्र, राजनीतिशास्त्र तथा अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की थी. वे शिकागो विश्वविद्यालय के फुलब्राइट महाविद्यालय में विज़िटिंग प्रोफेसर भी रह चुके हैं.

गिरीश कार्नाडकी प्रसिद्धि एक नाटककार के रूप में ज्यादा है. गिरीश कार्नाड ने वंशवृक्ष नामक कन्नड़ फिल्म से निर्देशन की दुनिया में कदम रखा था. इसके बाद इन्होंने कई कन्नड़ तथा हिन्दी फिल्मों का निर्देशन तथा अभिनय भी किया.

image_pdfimage_print


सम्बंधित लेख
 

Back to Top