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न्याय के मकड़जाल में उलझा गरीब आदमी

एक तरफ तो न्याय कहता है कि सौ अपराधी छूट जाएं लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए, लेकिन हकीकत में पुलिस, न्यायपालिका, समाज एक व्यक्ति को निर्दोष साबित होने तक दोषी ही मानते हैं। एससी-एसटी एक्ट मामले में तो 98 फीसदी मामलों में आरोपी निर्दोष साबित हो न्यायालय से बरी होते हैं। वर्षों लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अधिकतर लोग निर्दोष साबित होते हैं लेकिन वर्षों तक बिना किसी अपराध के जेल में बंद रहने वाले इन लोगों को क्या उनका वक्त लौटाया जा सकता है?

अपनी सेवानिवृत्ति पर भारत के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा कि आम जनता विशेषकर गरीब व उपेक्षित वर्ग के लिए भारतीय न्यायपालिका अभी भी काफी दूर है, जरुरत के समय लाखों लोग न्यायपालिका से संपर्क करने में झिझकते हैं और न्याय मिलने के प्रति आशंकित हैं। न्यायिक प्रणाली, प्रक्रिया, नियम मूलतः ब्रिटिश दौर के होने के कारण, भारतीयों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। ब्रिटिश गुलामी के काल में पुलिस को बेतहाशा अधिकार दिए गए और न्यायपालिका पुलिस केंद्रित थी। स्वतंत्रता आंदोलनकारी, क्रांतिकारियों को सबक सिखाने, अंग्रेजपरस्त जमींदारों व साहुकारों के माध्यम से भारतीय मजदूर व आदिवासियों पर अंकुश लगाने वाला ब्रिटिश प्रशासन, न्याय शास्त्र व भारतीयों को तुच्छ व खुद को उच्च समझने की मानसिकता से ग्रसित दंड संहिता का उपयोग करता था। दुष्कर्म पीड़िता भारतीय महिला के साथ हुए अपराध के प्रति अंग्रेज न्यायाधीशों की मानसिकता कार्रवाई करने से कहीं अधिक, उसकी जाति व सामाजिक स्तर पर रहती थी, निम्न व गरीबों को अलग मानक पर रखा जाता था।

भारत की जेलों में, लगभग 3,72,000 कैदी परीक्षण-पूर्व विचाराधीन आरोपी हैं, जो मुकदमे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदी छोटे अपराधों के लिए मुकदमे की प्रतीक्षा में वर्षों से जेल में हैं, कई मामलों में तो वह उस कथित अपराध के लिए अधिकतम सजा तक को पार कर चुके हैं। ये गरीब, अनपढ़, उपेक्षित समुदायों से संबंधित हैं, न्यायालय द्वारा निर्धारित जमानत राशि दे नहीं पाते व कानूनी सहायता तक उनकी पहुंच नहीं होती है। विचाराधीन अधिकतर कैदी युवा होते हैं, जमानत न होने के कारण कई वर्ष जेल में बरबाद हो जाते हैं। अक्सर वह कमाने वाला एकमात्र सदस्य होता है, इस कारण उनके परिवार की भरण-पोषण स्थिति बिगड़ जाती है। परिवार उनके कानूनी खर्चों को वहन नहीं कर सकता है। विचाराधीन कैदियों को सजायाफ्ता कैदियों से अलग रखा जाना चाहिए, लेकिन अधिकांश जेलों में भीड़भाड़ है। जेल में रहने के कारण उन निर्दोष विचाराधीन आरोपियों को जेल में शातिर व कठोर अपराधियों के हाथों हिंसा का शिकार होना पड़ता है और वहां के माहौल में कई मासूम न्याय-व्यवस्था के प्रति कुंठित हो अपराधी मानसिकता के हो जाते हैं।

पुलिस कई बार लोगों को शक के आधार पर, तो कभी धमक दिखाने के लिए, बदले की भावना से या नेताओं के इशारे पर तो कभी मीडिया ट्रायल के चलते जेल भेज देती है। पांच अगस्त को नोएडा की एक सोसायटी में एक महिला से अभद्रता करने के मामले में पुलिस ने श्रीकांत त्यागी को तीन अन्य साथियों के साथ गिरफ्तार किया, अदालत ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया, श्रीकांत के विरुद्ध मुकद्दमा दर्ज करना तो ठीक है पर तीन साथियों को नामजद कर सकते थे, गिरफ्तार करने की जरुरत नहीं थी। निर्दोष होते हुए भी वर्षों तक सज़ा भुगतने वाले लोग व उनके परिवार को आतंकवादी व अपराधी होने का अपमान झेलना पड़ा, समाज उनके परिवार को भी अपमानित व बहिष्कृत करता है। पुलिस और अभियोजन पक्ष द्वारा अक्सर जांच और परीक्षण प्रक्रिया में देरी होती है, वकीलों का खर्च उठाने में लोग असमर्थ होते हैं तथा न्यायाधीशों की कमी के कारण मुकद्दमे में वर्षों लग जाते हैं। सरकारी एजेंसियां गिरफ्तार करने में तो आगे रहती हैं परंतु दोष सिद्ध करने का प्रतिशत लगातार गिरता जा रहा है।

‘देरी से मिला न्याय, न्याय से वंचित करना है’ का वाक्य भारतीय न्यायपालिका प्रणाली के व्यवहार में नजर आता है। इसकी कुछ बानगी देखिए, किसी प्रवक्ता के विवादित बयान पर 10 जून 2022 को सहारनपुर में हुए बवाल में गिरफ्तार आठ आरोपियों को निर्दोष मान कोर्ट ने बरी कर दिया, 25 दिन वह जेल में रहे, पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जमकर पीटा और दंगाई बता प्रचारित किया। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने वर्ष 2013 में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत पांच लोगों को लश्कर-ए-तैयबा के साथ संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार किया, नौ मई 2022 को, नौ वर्ष जेल में रहने के बाद, पांचों आरोपियों को दिल्ली की कोर्ट ने बरी कर दिया, कहा कि मामला बिना किसी विश्वसनीय सबूत के था। उत्तराखंड पुलिस ने 22 दिसंबर 2007 को पत्रकार प्रशांत राही को देशद्रोह, युद्ध छेड़ने और आतंकवादी होने के आरोप में गिरफ्तार किया, 14 वर्ष बाद सात जनवरी 2022 को उन्हें अदालत ने बरी कर दिया।

27 दिसंबर 2001 में अखिल भारतीय अल्पसंख्यक शिक्षा बोर्ड द्वारा सूरत में शिक्षा पर सेमिनार आयोजित किया, रात 11 बजे गुजरात पुलिस आयोजन स्थल पर पहुंची और सेमिनार में शामिल होने के लिए आए 127 लोगों, जिसमें सभी मुसलमान थे, को आतंकवाद विरोधी कानून गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर लिया। उन पर प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का सदस्य होने का आरोप लगाया, 19 वर्ष तक आतंकवादी का ठप्पा झेलने के उपरांत सात मार्च 2021 को सूरत कोर्ट ने सभी आरोपियों को निर्दोष मान बरी कर दिया, मुकद्दमे के दौरान पांच निर्दोष आरोपियों की मौत हो गई। एक बच्चे की हत्या के मामले में आगरा की एक दंपत्ति को बेगुनाह होते हुए भी पांच वर्ष तक जेल में रहना पड़ा, वर्ष 2021 में अदालत ने उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया।

वर्ष 2016 में असम की 59 वर्षीय मधुबाला मंडल को बांग्लादेशी बता पुलिस ने गिरफ्तार कर डिटेंशन सेंटर भेज दिया। मधुबाला परिवार की अकेली कमाने वाली थी, मजदूरी करके अपनी 34 साल की मूक-बधिर बेटी व 12 वर्षीय नाती का भरण पोषण करती थी। एक सामाजिक कार्यकर्त्ता ने पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए, तब जून 2019 में कोर्ट ने उन्हें रिहा किया, बिना किसी कसूर के मधुबाला को तीन वर्ष कैद में रहना पड़ा। जनवरी 1994 में यूपी पुलिस ने 29 वर्षीय बीरबल भगत को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया, वह एक दिन के लिए भी जेल से बाहर नहीं आ पाए। परिवार व रिश्तेदारों ने उन्हें अपराधी मान त्याग दिया, 28 वर्ष बाद सूरत की अदालत ने उन्हें बरी कर दिया, अपने जीवन के 28 वर्ष उन्होंने उस अपराध के लिए जेल में बिताए जो उन्होंने कभी किया ही नहीं। वर्ष 1996 में, दिल्ली पुलिस ने कश्मीर मूल के 25 वर्षीय मोहम्मद अली भट् को गिरफ्तार किया, उन्हें लाजपत नगर विस्फोट मामले में और बाद में राजस्थान के समलेठी विस्फोट मामले में आरोपी बनाया। वर्ष 2020 में अदालत ले उन्हें निर्दोष पाया, उन्होंने दिल्ली और राजस्थान की जेलों में 23 वर्ष बिताए। वर्ष 1996 में लाजपत नगर विस्फोट मामले में ही कश्मीर मूल के 14 वर्षीय मोहम्मद मकबूल शाह को भी दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया, वर्ष 2010 में अदालत ले उन्हें निर्दोष पाया, उन्होंने 14 वर्ष जेल में बिताए।

एक तरफ तो न्याय कहता है कि सौ अपराधी छूट जाएं लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए, लेकिन हकीकत में पुलिस, न्यायपालिका, समाज एक व्यक्ति को निर्दोष साबित होने तक दोषी ही मानते हैं। एससी-एसटी एक्ट मामले में तो 98 फीसदी मामलों में आरोपी निर्दोष साबित हो न्यायालय से बरी होते हैं। वर्षों लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अधिकतर लोग निर्दोष साबित होते हैं लेकिन वर्षों तक बिना किसी अपराध के जेल में बंद रहने वाले इन लोगों को क्या उनका वक्त लौटाया जा सकता है? अकारण जेल में बिताए उन भयानक वर्षों की भरपाई कोई नहीं करता है। न तो मुआवजा दिया जाता है, न ही उन्हें गिरफ्तार करने व उनके विरुद्ध मुकद्दमा लिखने (कई मामले फर्जी होते हैं) वाले पुलिस जांच अधिकारी पर कार्रवाई की जाती है।

जमानत प्रणाली गरीबों के खिलाफ भेदभाव का कारण बनती है क्योंकि गरीब अपनी वित्तीय अक्षमता के कारण जमानत नहीं दे पाते जबकि धनी व्यक्ति जमानत देने का खर्च उठा सकते हैं। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी विभिन्न फैसलों में यह माना है कि मौजूदा जमानत प्रणाली गरीबों के प्रति भेदभावपूर्ण है, गरीब व्यक्ति को अत्यधिक जमानत राशि देने के लिए कहना उसे जमानत देने से इनकार करना ही है। वकीलों का खर्च उठाने में असमर्थ लोग मुफ्त कानूनी सहायता पाने के हकदार हैं लेकिन यह सुलभ नहीं है, सरकार द्वारा प्रदत मामूली धनराशि के लिए वकील ऐसे मामले लेने से बचते हैं। यदि कोई आरोपी किसी तरह से जमानत करा ले तो न्यायाधीश यह मानते हैं कि, यदि कोई आपकी जमानत राशि वहन कर सकता है, तो आपके पास वकील को नियुक्त करने के लिए भी संसाधन हैं। भारत सरकार को जमानत नीति आसान बनानी चाहिए, दोष सिद्धि के बिना सभी आरोपियों को निर्दोष मानना चाहिए। केवल गंभीर व बर्बर मामलों को छोड़ अन्य को निजी मुचलके पर थाने से ही जमानत देनी चाहिए।

11 जुलाई 2022 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश संजय किशन कौल और एम एम सुंदरेश की पीठ ने जमानत सुलभ कराने के निमित्त निर्देश जारी किए हैं। कहा गया कि, धारा 41 और 41ए के तहत बिना वारंट के गिरफ्तारी पर आरोपी जमानत का हकदार होगा। उच्च न्यायालयों को उन विचाराधीन कैदियों का पता लगाने की कवायद शुरु करने का निर्देश दिया जाता है जो जमानत की शर्तों का पालन करने में सक्षम नहीं हैं, ऐसा करने के बाद रिहाई को सुगम बनाने वाली धारा 440 के आलोक में कार्रवाई करनी होगी। धारा 88, 170, 204 और 209 के तहत आवेदन पर विचार करते समय जमानत आवेदन पर जोर देने की जरुरत नहीं है, जमानत आवेदनों को दो सप्ताह की अवधि के भीतर निपटाया जाना चाहिए। भारत सरकार जमानत अधिनियम की प्रकृति में एक अलग अधिनियम पर विचार करे ताकि जमानत की राशि को सुव्यवस्थित किया जा सके। राज्य और केंद्र सरकारों को परीक्षण-पूर्व विचाराधीन आरोपियों के लिए ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ की तर्ज पर विशेष न्यायालयों का गठन करना चाहिए, इन न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों के पदों की रिक्तियों को शीघ्र भरना होगा।

कानून में विभेद की बानगी देखिए, जहां निर्भया के साथ दुष्कर्म करने वाले चार अपराधियों को फांसी दी गई वहीं पांच माह की गर्भवती बिलकिस, उसकी मां और तीन अन्य महिलाओं के साथ बलात्कार करने, बिलकिस की तीन वर्षीय बेटी समेत आठ लोगों के कातिल 11 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई लेकिन गुजरात सरकार ने सभी 11 दोषियों को भारत की आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर स्वतंत्रता दिवस के दिन 15 अगस्त 2022 को न केवल रिहा कर दिया गया, बल्कि बलात्कारियों को तिलक लगा, माला पहना, मिठाई खिलाकर स्वागत किया जाता है। (लेखक शहरी मामलों के जानकार, सामाजिक कार्यकर्ता व राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

साभार – नया इंडिया से

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