डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडेय : राजनीति का वह संत, जिसने अंत तक रिश्तों और ज़मीन से नाता नहीं छोड़ा

मध्यप्रदेश की राजनीति में कुछ नाम केवल पदों से नहीं, बल्कि अपने व्यक्तित्व और जनविश्वास से इतिहास बनाते हैं। ऐसा ही एक नाम था "डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडेय" । मंदसौर संसदीय क्षेत्र से आठ बार सांसद, भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, और वह नेता जिन्होंने 1962 में जावरा विधानसभा चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. कैलाश नाथ काटजू जैसे दिग्गज को पराजित कर प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।

आज उनकी पुण्यतिथि पर केवल उनके राजनीतिक जीवन को याद करना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें समझना है तो उनके अंतिम दिनों को पढ़ना और महसूस करना होगा , क्योंकि वहीं एक जननेता का सबसे मानवीय चेहरा दिखता है।

“बहुत अच्छा लगा, आप मिलने आईं…”

साल 2016। उम्र लगभग 87 वर्ष। शरीर अब पहले जैसा साथ नहीं दे रहा था, लेकिन मन अब भी कार्यकर्ता का था। राजनीति उनके लिए सत्ता नहीं, सेवा थी। 2009 में सक्रिय राजनीति से दूरी के बाद भी वे पार्टी और समाज के लिए चिंतित रहते।

परिवार के लोग महसूस करने लगे थे कि बाबूजी के भीतर कहीं न कहीं जीवन के अंतिम पड़ाव का एहसास गहराने लगा है। दिसंबर 2015 में पोती के विवाह के बाद स्वास्थ्य लगातार कमजोर रहने लगा।

इसी बीच मई 2016 में उज्जैन के विश्वप्रसिद्ध सिंहस्थ मेले में स्नान का कार्यक्रम बना। स्वास्थ्य ठीक नहीं था, फिर भी आस्था उन्हें खींच लाई। सिंहस्थ में स्नान के बाद वे इंदौर पहुंचे, जहां उनकी बेटी के घर ठहरे।

लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष सुमित्रा महाजन उनसे मिलने पहुंचीं। यह मुलाकात आज भी सुनने वालों की आंखें नम कर देती है।

बाबूजी ने स्नेह से कहा ..
“ताई, बहुत अच्छा लगा, आप मिलने आईं। आपको देखा तो मुझे संतोष हो गया… अब क्या मालूम मैं उठूँ इस घर से या नहीं…”

यह सुनते ही माहौल भारी हो गया। किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह वाक्य केवल एक भावुक क्षण नहीं, बल्कि आने वाले समय की एक गहरी आहट है।

सिंहस्थ में पावन स्नान… और फिर चिरनिद्रा

धर्म और अध्यात्म से उनका जुड़ाव बचपन से था। शायद इसलिए जीवन के अंतिम दिनों में भी उनकी सबसे बड़ी इच्छा थी , पुण्य अर्जित करना, आस्था से जुड़े रहना।

16 मई को वे उज्जैन गए। फिर 18 मई को दोबारा सिंहस्थ स्नान किया। परिजन बताते हैं कि जैसे उन्हें किसी अदृश्य तैयारी का एहसास हो रहा था।
इंदौर लौटने के बाद अचानक तबीयत बिगड़ी। रात में तेज बुखार आया। बेचैनी में उन्होंने कहा
“दरवाज़ा खोल दो, कोई मुझे लेने आ रहा है…”

परिवार घबरा गया। सुबह तक सब सामान्य दिखा। वे बैठकर बातें करते रहे, चाय पी। फिर सहज स्वर में बोले ..
“अब नींद आ रही है, जगाना मत…”
कौन जानता था कि यह नींद चिरनिद्रा बन जाएगी।
कुछ ही मिनटों बाद अचानक हिचकी आई और राजनीति का एक युग मौन हो गया। चेहरे पर न घबराहट थी, न संघर्ष ,
जैसे एक संत अपनी यात्रा पूरी कर शांति से विदा हुआ हो।

डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडेय उन नेताओं में थे, जिनकी राजनीति में संघर्ष था, लेकिन व्यवहार में विनम्रता। जावरा से डॉ. कैलाश नाथ काटजू को हराने वाला यह नेता जनसंघ और भाजपा की राजनीति का मजबूत स्तंभ बना, लेकिन व्यक्तिगत जीवन में उतना ही सरल रहा।

मंदसौर संसदीय क्षेत्र ने उन्हें आठ बार संसद भेजा, क्योंकि लोगों को उनमें नेता कम, अपना प्रतिनिधि अधिक दिखता था।
आज उनकी पुण्यतिथि पर जब राजनीति में शोर अधिक और संवेदनाएं कम दिखाई देती हैं, तब बाबूजी का वह वाक्य फिर कानों में गूंजता है ।

“अब क्या मालूम मैं उठूँ इस घर से या नहीं…”

और सचमुच, उस दिन वे उठे नहीं…
लेकिन स्मृतियों में आज भी वैसे ही जीवित हैं शांत, सहज, और जनसेवा के प्रति समर्पित।
राजनीति के संत डॉ लक्ष्मीनारायण पांडेय (बाबूजी) को पुण्यतिथि पर सादर नमन....

ये किस्सा पगडंडी प्रकाशन द्वारा डॉ पाण्डेय के जीवन पर आधारित पुस्तक "युगपुरुष बाबूजी" में दर्ज है।

साभार -https://www.facebook.com/share/p/17Z2MrU1jz/ से

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