नई दिल्ली। श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में वर्ष 2026 में संस्कृत सप्ताह के अंतर्गत दिनांक 27/8/26 को दर्शन शास्त्रपीठ के तत्त्वावधान में “संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता” विषय पर एक विशिष्ट व्याख्यान आयोजित किया गया।
इस विशिष्ट व्याख्यान के मुख्य वक्ता जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में स प्रो. रामनाथ झा ने सभा में उपस्थित अध्यक्ष एवं विद्वज्जनों को संबोधित किया। अपने व्याख्यान में वर्तमान जीवन तथा आधुनिक जीवनशैली में संस्कृत भाषा के महत्व, वैज्ञानिक क्षेत्र में संस्कृत भाषा के योगदान तथा दैनिक कार्य-प्रणाली में संस्कृत भाषा की उपयोगिता आदि विषयों का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया । उन्होंने कहा कि – “ संस्कृत को देवभाषा कहा जाता है, न केवल इसलिए कि यह देवताओं की भाषा है, बल्कि इसलिए भी कि यह "देने" (दान) में विश्वास करती है, अन्य भाषाओं और विचारों को संपोषित करती है। यह भारतीय भाषाओं और विश्व की भाषाओं को शब्द और विचार प्रदान करती है।
संस्कृत भारत को बनाती है और भारतीय विचार को स्थापित करती है। अन्य भाषाओं की समृद्धि संस्कृत के कारण हुई है। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार, सत्य की दो अभिव्यक्तियाँ हैं: नाम (भाषा) और रूप (सत्ता)। व्याकरण शब्द तत्त्व पर केंद्रित है, जबकि निरुक्त अर्थ तत्त्व पर केंद्रित है। शब्द और अर्थ का नित्य संबंध है, जो सृष्टि के मूल में है। तंत्रशास्त्र में वर्णों का महत्व है, जहाँ षट चक्रों में स्थित मातृका शक्ति संस्कृत के वर्णों से संबंधित है। प्रत्येक वर्ण एक शक्ति का प्रतिनिधि है, और उसका उच्चारण सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित करता है। संस्कृत वर्णों का उच्चारण मस्तिष्क के दोनों गोलार्धों का एक साथ विकास करता है, जिससे संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण होता है। संस्कृत भाषा ने समाज का निर्माण किया है और जीवनशैली को आकार दिया है।
भारतीय चिंतन में स्त्री और पुरुष को दाल के दाने के समान एक-दूसरे के पूरक के रूप में देखा जाता है, जबकि पश्चिमी अवधारणा में स्त्री को पुरुष की पसली से निकला हुआ माना जाता है। "हस्बैंड" शब्द जर्मन शब्द "हस" (खूंटे में बांधना) से आया है, जो पत्नी को बांधकर रखने का अर्थ देता है, जबकि भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी को देव-देवी के रूप में देखा जाता है। संस्कृत भाषा दुनिया के अनेक देशों में फैली हुई है, और मंगोलियाई तथा जापानी जैसी भाषाएँ संस्कृत से प्रभावित हैं। मंत्र चिकित्सा और गायत्री मंत्र पर शोध से पता चला है कि संस्कृत मंत्रों का उच्चारण
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को ठीक करता है। सामवेद, संगीत का वेद, हृदय को स्पर्श करता है और मन को प्रसन्न करता है।"
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. अनेकान्त कुमार जैन, अध्यक्ष, दर्शन शास्त्रपीठ, ने की । उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डालते हुए मार्गदर्शन प्रदान किया । उन्होंने कहा कि संस्कृत के व्याकरणिक रूपों और वर्णों का उच्चारण (जैसे रामौ, रामाभ्याम्, रामयोः) शरीर और यौगिक क्रियाओं (मूल बंध, उड्डियान बंध, जालंधर बंध) से गहराई से जुड़ा हुआ है।
अनुस्वार का उच्चारण 'भ्रामरी प्राणायाम' से और विसर्ग का उच्चारण 'कपालभाति' जैसी क्रियाओं से मेल खाता है । इस पर प्रयोगात्मक अनुसन्धान आवश्यक है । संस्कृत भाषा को केवल पारंपरिक विश्वास या महिमामंडन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसका आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धतियों (ध्वनि विज्ञान, शरीर विज्ञान, मनोविज्ञान, एआई/कंप्यूटर) के साथ अंतर्विषयक (Interdisciplinary) अध्ययन होना चाहिए।अनुसंधान का उद्देश्य केवल परंपरा को सिद्ध करना नहीं, बल्कि सत्य की खोज करना है।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं शोधछात्रा रिद्धि जैन द्वारा सरस्वती वंदना से किया गया । डॉ परमेश जी ने स्वागत भाषण के माध्यम से सभी का वाचिक स्वागत किया । मुख्य वक्ता का विस्तृत परिचय प्रो. महानन्द झा जी ने दिया ।
कार्यक्रम की समन्वयिका के रूप में प्रो. सुजाता त्रिपाठी, अध्यक्ष, छात्र कल्याण पीठ थीं। कार्यक्रम का कुशल संचालन सहायक आचार्य डॉ. पुष्कर पराग देव पुजारी (अद्वैत वेदान्त विभाग) द्वारा किया गया।
कार्यक्रम के अंतिम चरण में विश्वविद्यालय के सांख्य-योग विभाग के शोध-छात्र श्री ललित द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया। कार्यक्रम का समापन “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” मंत्र के साथ हुआ।
कार्यक्रम में सम्माननीय विशिष्ट अतिथियों, विश्वविद्यालय के आचार्यों, विद्वानों, शोध-छात्रों, छात्रों तथा संस्कृत-अनुरागियों की उपस्थिति रही।
डॉ विनय गोपाल त्रिपाठी
सहायक आचार्य, सांख्य-योग विभाग
SLBSNSU, नई दिल्ली





