भारत और पाकिस्तान के विभाजन के साथ हमारी कई सांस्कृतिक परंपराएँ हमसे बिछुड़ सी गई और हमारी आज की पीढ़ी संस्कृति की अपनी धारा से वंचित रह गई। बाल्टिस्तान किसी समय भारत का ही हिस्सा था और वहाँ के गीत और संगीत में, लोकगायन में प्रकृति, संस्कृति और लोकजीवन की धारा बहा करती थी। बाल्टी संगीत को नया जीवन और नई पहचान दी है शिरीन फातिमा बाल्टी ने। इनका परिवार भले ही मुस्लिम है लेकिन हिंदू परंपराओं और अध्यात्म में इनकी गहरी आस्था है। शिरीन के माता-पिता ने इस लोक संगीत को जीवंत करने के लिए शिरीन को प्रेरणा ही नहीं दी बल्कि पुराने और लुप्त हो चुके गीतों के माध्यम से इस संगीत को पुनर्जीवित भी किया।
बाल्टी गीतों की मौखिक परंपरा अब शिरीन फातिमा बाल्टी के वीडियो के माध्यम से नई अभिव्यक्ति और पहचान पा रही है।
शिरीन फातिमा बाल्टी जो टुरटुक (लद्दाख) की निवासी हैं और वे अपने समुदाय की पहली प्रमुख महिला बाल्टी गायिका मानी जाती हैं।
उनका समुदाय, जो कभी पाकिस्तान का हिस्सा था और जिसकी विरासत तिब्बती संस्कृति से जुड़ी है, आज लद्दाख के पाँच गाँवों में रहता है। भारत की ओर रहने वाले लोग लद्दाखी और हिंदी भी बोलते हैं। गिलगित-बाल्टिस्तान के बाल्टी भाषी समुदाय के साथ मिलकर यही लोग शिरीन के मुख्य श्रोता हैं।
शिरीन के गीत, जो ज्यादातर बाल्टी और लद्दाखी भाषा में होते हैं, सोशल मीडिया के माध्यम से गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों तक पहुँचते हैं। उनके गायन में एक गहरी पुरानी यादों (nostalgia) की भावना होती है।
उनकी आवाज़ ने भारत और पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू कश्मीर (PoJK) के बाल्टी भाषी लोगों को एक ऐसी पहचान दी है, जिसकी वे तलाश कर रहे थे, लेकिन इतनी कोमल और प्रभावशाली रूप में मिलने की उम्मीद नहीं थी।
उनके गीत “सरहद पार” के लोगों से संवाद करते हैं और सुनने वालों के मन में जुड़ाव (belonging) की गहरी भावनाएँ जगाते हैं। उनका माध्यम बाल्टी भाषा है, जिसे वे गर्व से “असली जुबान” कहती हैं।
शिरीन कहती हैं, “सीमा के उस पार के लोग मुझे ‘सरहद पार से सुरिली आवाज़’ कहते हैं। वे मुझे एक ऐसी गायिका के रूप में जानते हैं जो बाल्टी संस्कृति को संरक्षित कर रही है।” उन्हें जम्मू-कश्मीर राज्य द्वारा सम्मानित भी किया गया है।
वे दिल्ली के स्टूडियो और जम्मू व लद्दाख के कार्यक्रम स्थलों के बीच अपने गायन को जारी रखती हैं। मंच पर गाना उन्हें पसंद है, लेकिन वे लाइव प्रस्तुति में सबसे अधिक सहज महसूस करती हैं।
उनके गीत क्षेत्र, प्रकृति, संस्कृति, खेतों और फलों—जैसे सेब, खुबानी और अंगूर—पर आधारित होते हैं। ये गीत पुराने समय और परंपराओं को दर्शाते हैं, जो उन्हें उनके पिता से और उनके पिता को उनके पूर्वजों से मौखिक रूप से मिले हैं।
उनके प्रसिद्ध गीतों में “Grifshat Sula Beik” और “Tsertragi Jusay Jusay” लोगों के दिल जीत रहे हैं।
वे कहती हैं, “ये गीत हमें सांस्कृतिक रूप से जोड़ते हैं—जैसे पुरानी यादें और प्रकृति से प्रेम।” वे अपने गीत YouTube और सोशल मीडिया पर साझा करती हैं।
PoJK के श्रोता उनके गीतों को अपने दैनिक जीवन में अपनाते हैं और इसका प्रमाण वे सोशल मीडिया पर उनके साथ साझा करते हैं।
लोग उनके प्रति आभार अलग-अलग तरीकों से व्यक्त करते हैं। एक प्रशंसक ने बाल्टिस्तान की खूबसूरत वादियों का वीडियो बनाया, जिसमें उनकी आवाज़ बैकग्राउंड में चल रही थी।
एक अन्य प्रशंसक ने उनके लिए बाल्टी में गीत लिखा। PoJK की महिलाएँ उन्हें अक्सर “बहन” कहकर संबोधित करती हैं।
उनके वीडियो में शिरीन लद्दाख के सुंदर प्राकृतिक दृश्यों के बीच मुस्कुराते हुए, लिप-सिंक करते हुए नजर आती हैं।
कई अन्य भारतीय गायकों की तरह, शिरीन भी टीवी प्रतियोगिताओं में जाना चाहती थीं, लेकिन आर्थिक स्थिति के कारण वे ऐसा नहीं कर सकीं। वे कहती हैं, “मैं खुद ही अपने गायन पर काम कर रही हूँ।”

उनकी संगीत यात्रा का श्रेय उनके पिता अहमद शाह बाल्टी को जाता है, जो उनके गीतकार भी हैं।
उनके पिता कहते हैं, “हम विभिन्न संस्कृतियों का मिश्रण हैं, और जो लोग उनके गीत पसंद करते हैं, वे भी विविध संस्कृतियों से जुड़े हैं।” उन्हें अपनी बेटी के समर्थन के लिए समाज से आलोचना भी झेलनी पड़ी।
करीब 10 साल पहले वे अपने बच्चों की शिक्षा के लिए उत्तराखंड के देहरादून चले गए, क्योंकि उस समय लड़कियों की शिक्षा को महत्व नहीं दिया जाता था। शिरीन और उनके पिता ने देहरादून में एक हॉस्टल चलाया ताकि परिवार का खर्च और शिक्षा चल सके। फिर वे वापस लद्दाख लौट आए।
आज वे नए गीत लिख रहे हैं और गा रहे हैं।
उनके पिता कहते हैं, “बाल्टी लोक संगीत धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। मुझे 100 से ज्यादा गीत याद हैं, जिन्हें मैं लिखकर सुरक्षित करने की कोशिश कर रहा हूँ।”
वे बताते हैं कि बाल्टी संस्कृति और कश्मीरी संस्कृति में अंतर है, हालांकि लद्दाखी और बाल्टी संस्कृति में कुछ समानताएँ भी हैं।
उनके अनुसार, 1971 की घटना के बाद उनका परिवार भारत का हिस्सा बन गया।
वे कहते हैं, “हम 1971 में आज़ाद हुए। हमारी आबादी लगभग 9,000 है, जबकि बाल्टी भाषी लोग 13-14 लाख हैं, जिनमें अधिकतर PoJK में रहते हैं। शिरीन के 60,000 फेसबुक फॉलोअर्स में से लगभग 40,000 पाकिस्तान से हैं।”
शिरीन के पिता स्थानीय मेलों और महफिलों में भाग लेते हैं और उनके साथ मंच पर गाते हैं। वे कहते हैं कि अब लोगों का नजरिया बदल रहा है, खासकर लड़कियों की शिक्षा के प्रति।
आज शिरीन बाल्टी संस्कृति को बचाने के लिए काम कर रही हैं। साथ ही, वे अपने गाँव में भारतीय जनता पार्टी के महिला विंग की सदस्य के रूप में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही हैं।
इसी के साथ, उनका एक नया गीत खुबानी (apricot) पर आधारित होगा, जो श्योक नदी के किनारे गूंजेगा।

शिरीन बाल्टी भारत में भले ही जाना-पहचाना नाम नहीं हैं। वास्तव में, यहाँ के बहुत कम युवा उनके दूरस्थ उत्तर लद्दाख के गाँव बोगडांग का नाम सही से लिख भी पाएंगे। लेकिन इस गायिका और उनके परिवार का भारत की एकता और सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने में योगदान कई बड़े कलाकारों से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
30 वर्षीय शिरीन ने बाल्टी भाषा में 50 से अधिक गीत गाए हैं—यह एक स्थानीय भाषा है जो केवल लद्दाख के पाँच गाँवों और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर Gilgit-Baltistan क्षेत्र में बोली जाती है। उनके सोशल मीडिया (YouTube, Twitter और Facebook) पर कुल मिलाकर 70,000 से अधिक फॉलोअर्स हैं, जहाँ वे अपने गीत और बाल्टिस्तानी संस्कृति से जुड़े वीडियो साझा करती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि भारतीय नागरिक होने के बावजूद, उनके लगभग 90% प्रशंसक गिलगित-बाल्टिस्तान से हैं।
हालाँकि, उनकी सफलता आसान नहीं रही। उन्हें अपने गाँव के रूढ़िवादी लोगों का विरोध झेलना पड़ा, जो मुस्लिम लड़कियों के गाने के खिलाफ थे। उनके पिता के भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ने के कारण सामाजिक बहिष्कार हुआ, और बाद में उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा क्योंकि वे गिलगित-बाल्टिस्तान के भारत में एकीकरण की वकालत करती हैं।
शिरीन याद करती हैं, “यह सब 2001 में शुरू हुआ, जब मेरे पिता अहमद शाह बाल्टी ने भाजपा के टिकट पर स्थानीय चुनाव लड़ने का फैसला किया। वे चुनाव नहीं जीते, लेकिन गाँव वालों ने हमें ‘अलग’ मानना शुरू कर दिया। स्थिति तब और बिगड़ गई जब मैंने एक स्कूल कार्यक्रम में कव्वाली गाई और मेरी बहन ने नृत्य किया। इसके बाद से हमें समाज से अलग कर दिया गया।”
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि परिवार के पुरुषों को स्थानीय मस्जिद में जाने की अनुमति नहीं थी और उन्हें राशन भी देने से मना कर दिया गया। उनके पिता बताते हैं, “सबसे कठिन समय तब आया जब मैंने एक गाँव की लड़की को A+ रक्त दान किया, लेकिन उसके परिवार पर मुझसे खून लेने के लिए 10,000 रुपये का जुर्माना लगा दिया गया।”
2006 में, परिवार ने नई शुरुआत के लिए देहरादून का रुख किया। वहाँ शिरीन ने अपने नए स्कूल में मंच पर गाना गाया। उनके पिता ने उनकी आवाज़ में गाया हुआ प्रसिद्ध हिंदी गीत अँखियों के झरोखे से रिकॉर्ड करके फेसबुक पर साझा किया।
शिरीन बताती हैं, “अचानक मुझे LoC के उस पार (गिलगित-बाल्टिस्तान) से लोगों की तारीफ मिलने लगी। वहाँ के प्रसिद्ध गीतकार मंज़ूर हुसैन बलघारी और एहसान अली दानिश ने मुझे अपनी कविताएँ भेजनी शुरू कर दीं। जब मैंने इन गीतों को रिकॉर्ड करके YouTube पर डाला, तो वे पाकिस्तान के उस क्षेत्र में वायरल हो गए।”
उनके पिता ने भी बाल्टी लोक संगीत के प्रति अपने प्रेम के कारण उनके लिए गीत लिखना शुरू किया। वे कहते हैं, “हमारी संस्कृति बहुत समृद्ध है। हम पहाड़ों में रहने वाले घुमंतू लोग हैं, जिनकी जीवनशैली अनोखी है। हम रंग-बिरंगे कपड़े पहनते हैं, खास टोपी (इरागी) और पंख के साथ। हमारा भोजन कुट्टू और खुबानी (एप्रिकॉट) से बने व्यंजनों पर आधारित होता है। लेकिन ये परंपराएँ धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं—मैं इन्हीं विषयों पर लिखता हूँ।”
शिरीन को “अगली सलमा आगा के रूप में पहचान मिलने लगी। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए, जम्मू-कश्मीर सरकार ने 2019 में उन्हें “State Award for Performing Arts” से सम्मानित किया।
वे कहती हैं, “कभी-कभी मुझे लगता है कि देहरादून जाना हमारे लिए अच्छा था। वहाँ हमें अच्छी शिक्षा मिली। उस समय हमारे गाँव बोगदांग में इंटरनेट भी नहीं था। आज मेरी छोटी बहन वकील (LLB) बन चुकी है—वह पूरे गाँव की पहली लड़की है जिसने यह डिग्री हासिल की है।”
अपने भविष्य के सपनों के बारे में शिरीन उत्साह से कहती हैं, “मैं टीवी चैनलों के रिएलिटी शो में भागलेना चाहती हूँ। जीत-हार मायने नहीं रखती, मैं बस उस मंच पर गाना चाहती हूँ। मैंने और मेरे पिता ने कई बार गूगल पर ऑडिशन की जानकारी खोजी है, लेकिन अभी भी पूरी तरह समझ नहीं पाए। अगर कोई मार्गदर्शन करे, तो मैं बहुत आभारी रहूँगी।”
शिरीन का यूट्यूब लिंक https://www.youtube.com/@SherineBaltiTV





