कल्पना कीजिए, एक ऐसा व्यक्ति जो गणित पढ़ाता है और जिसका सपना जीवनभर एक शिक्षक बने रहने का है। उसे अचानक एक ऐसी नौकरी दे दी जाती है, जिसके बारे में उसने ठीक से सुना तक नहीं था। वह नौकरी थी एक विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी संभालने की। दिलचस्प बात यह थी कि जिस व्यक्ति को यह जिम्मेदारी सौंपी गई, उसे उस समय ‘Library Classification’ यानी पुस्तकों को व्यवस्थित करने की वैज्ञानिक पद्धति का भी कोई विशेष ज्ञान नहीं था। लेकिन इतिहास ने शायद उसके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। यही व्यक्ति आगे चलकर भारत में Library Science का सबसे बड़ा नाम बना और दुनिया उसे S.R. Ranganathan के रूप में जानने लगी। यह उस जुनून की कहानी है, जिसने किताबों को अलमारियों से निकालकर ज्ञान को समाज के हर व्यक्ति तक पहुंचाने का सपना देखा।
4 जनवरी 1924 का वह फैसला, जिसने पूरी जिंदगी बदल दी
श्रीरंगम रामामृत रंगनाथन, जिन्हें आम तौर पर S.R. Ranganathan के नाम से जाना जाता है, का जन्म 12 अगस्त 1892 को तमिलनाडु के सियाली, वर्तमान सीरकाज़ी क्षेत्र में हुआ था। हालांकि उनकी जन्मतिथि को लेकर उनके अपने लेखन में 9 अगस्त का उल्लेख भी मिलता है। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उनका झुकाव गणित की ओर हुआ। उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से गणित में स्नातक और परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद अध्यापन को उन्होंने अपना पेशा बनाया। मंगलुरु, कोयंबटूर और मद्रास जैसे स्थानों पर गणित पढ़ाते हुए उनका जीवन एक सामान्य अकादमिक करियर की दिशा में आगे बढ़ रहा था। फिर आया 4 जनवरी 1924 का दिन। मद्रास विश्वविद्यालय ने उन्हें अपना पहला University Librarian बनने का प्रस्ताव दिया। यह पद उनके लिए किसी सपने की मंजिल नहीं था। बल्कि वह एक ऐसा मोड़ था, जिसे उन्होंने शुरुआत में लगभग अनिच्छा से स्वीकार किया।
नई जिम्मेदारी संभालने के बाद रंगनाथन को जल्द ही महसूस हुआ कि लाइब्रेरी का काम उनकी कल्पना से बिल्कुल अलग है। लंबे समय तक पुस्तकों और रिकॉर्ड के बीच अकेले बैठना उन्हें उबाऊ लगने लगा। आखिरकार उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से अपनी पुरानी गणित की नौकरी वापस देने का अनुरोध तक कर दिया। लेकिन यहीं से कहानी ने एक असाधारण मोड़ लिया। प्रशासन ने एक समझौता किया। रंगनाथन को आधुनिक Library Science का अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड भेजा गया। अगर लौटने के बाद भी उन्हें यह क्षेत्र पसंद नहीं आता, तो उन्हें गणित पढ़ाने की पुरानी जिम्मेदारी वापस मिल सकती थी। शायद किसी को उस समय अंदाजा नहीं था कि यह यात्रा एक ऐसे विद्वान को जन्म देने वाली है, जिसका नाम आने वाली पीढ़ियों की लाइब्रेरी से जुड़ जाएगा।
इंग्लैंड में मिली एक समस्या, जिसने उन्हें नई दुनिया दिखाई-
रंगनाथन University College London पहुंचे। उस समय ब्रिटेन में Library Science की उच्च शिक्षा के लिए यह प्रमुख संस्थानों में से एक था। वहां उन्हें पुस्तक वर्गीकरण की मौजूदा प्रणालियों का अध्ययन करने का अवसर मिला। गणितीय सोच ने उन्हें इस विषय को दूसरों से अलग नजरिए से देखने में मदद की। जहां कई लोग वर्गीकरण को निर्धारित नियमों के अनुसार याद करने की प्रक्रिया मानते थे, वहीं रंगनाथन उसमें एक तार्किक समस्या देखने लगे। उनके सामने सवाल था कि आखिर किसी पुस्तक को केवल एक विषय के आधार पर क्यों रखा जाए, जबकि उसमें कई अलग-अलग विचार और विषय हो सकते हैं? यही सवाल आगे चलकर उनके सबसे महत्वपूर्ण आविष्कारों में से एक का आधार बना।
एक किताब, लेकिन उसे रखने की जगह कितनी?
मान लीजिए किसी पुस्तक का विषय है भारत में युद्ध का इतिहास। उसे ‘युद्ध’ के अंतर्गत रखा जा सकता है। लेकिन उसे ‘भारत’ के अंतर्गत भी रखा जा सकता है। फिर उसे इतिहास, राजनीति, समाज या सैन्य अध्ययन से भी जोड़ा जा सकता है। तो आखिर सही वर्गीकरण कौन सा होगा? रंगनाथन ने महसूस किया कि किसी पुस्तक को समझने के लिए उसके विषय के अलग-अलग पहलुओं को पहचानना जरूरी है। यही सोच आगे चलकर उनकी प्रसिद्ध Colon Classification प्रणाली में विकसित हुई। यह विचार उस समय बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि पुस्तकालयों में उपलब्ध जानकारी को खोजने और व्यवस्थित करने के साधन आज की तरह डिजिटल नहीं थे। रंगनाथन ने ज्ञान को छोटे-छोटे पहलुओं में विभाजित करके उसे अधिक तार्किक तरीके से व्यवस्थित करने का रास्ता खोजा।
खिलौने के एक सेट से आया वर्गीकरण का असाधारण विचार:
रंगनाथन की कहानी का सबसे रोचक हिस्सा यह भी है कि उनकी वर्गीकरण प्रणाली की प्रेरणा एक Meccano सेट से जुड़ी बताई जाती है। यह बच्चों के लिए बनाया गया ऐसा निर्माणात्मक खिलौना था, जिसके अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर अनेक संरचनाएं बनाई जा सकती थीं। रंगनाथन ने इसी विचार को ज्ञान के संगठन से जोड़कर देखा। अगर अलग-अलग हिस्सों को जोड़कर अनगिनत संरचनाएं बनाई जा सकती हैं, तो विषयों के अलग-अलग पहलुओं को भी जोड़कर किसी पुस्तक की विशिष्ट पहचान बनाई जा सकती है। इसी चिंतन से Colon Classification का विकास हुआ। भारत लौटते समय उन्होंने जहाज की लाइब्रेरी को भी व्यवस्थित करने का प्रयोग किया। एक गणितज्ञ अब धीरे-धीरे ज्ञान की दुनिया का वास्तुकार बन चुका था।
1931 में लिखे गए पांच नियम, जिन्होंने लाइब्रेरी की सोच बदल दी।
मद्रास विश्वविद्यालय में लगभग दो दशकों तक काम करते हुए रंगनाथन ने केवल किताबों को व्यवस्थित नहीं किया। उन्होंने यह सवाल उठाया कि आखिर लाइब्रेरी का असली उद्देश्य क्या होना चाहिए? इसी चिंतन से 1931 में उनकी प्रसिद्ध पुस्तक The Five Laws of Library Science सामने आई। उनके पांच नियम थे कि पुस्तकें उपयोग के लिए होती हैं, हर पाठक को उसकी पुस्तक मिले, हर पुस्तक को उसका पाठक मिले, पाठक का समय बचाया जाए और लाइब्रेरी एक जीवंत संस्था है जो लगातार विकसित होती रहती है। ये नियम साधारण लग सकते हैं, लेकिन उस दौर में इनका अर्थ बहुत क्रांतिकारी था। रंगनाथन के लिए लाइब्रेरी केवल किताबों की इमारत नहीं थी। वह समाज में ज्ञान के स्वतंत्र प्रवाह का माध्यम थी।
उनके लिए लाइब्रेरी सिर्फ अमीर और पढ़े-लिखे लोगों की जगह नहीं थी।
रंगनाथन का सपना इससे भी बड़ा था। वह चाहते थे कि सार्वजनिक पुस्तकालय हर व्यक्ति के लिए उपलब्ध हों। महिलाओं, गरीबों और समाज के उन वर्गों तक भी किताबें पहुंचें, जिन्हें शिक्षा और ज्ञान के अवसर कम मिले थे। उन्होंने भारत में मुफ्त सार्वजनिक पुस्तकालयों के विस्तार के लिए लगातार आवाज उठाई। वह मानते थे कि यदि किसी देश को वास्तव में शिक्षित और जागरूक बनाना है, तो केवल विद्यालय और विश्वविद्यालय पर्याप्त नहीं हैं। ज्ञान को समाज के हर हिस्से तक पहुंचाने के लिए मजबूत पुस्तकालय व्यवस्था भी जरूरी है। इसी विचार ने उन्हें एक साधारण विश्वविद्यालय कर्मचारी से आगे बढ़ाकर Library Science के एक विचारक में बदल दिया।
काम के प्रति जुनून ऐसा था कि छुट्टी भी पीछे छूट गईः
रंगनाथन की कार्यशैली भी उतनी ही असाधारण थी। उनके बारे में कहा जाता है कि वह प्रतिदिन लगभग 13 घंटे तक काम करते थे और सप्ताह के सातों दिन अपने कार्य में लगे रहते थे। उनका विवाह नवंबर 1928 में सरदा रंगनाथन से हुआ। विवाह के अगले दिन ही वह दोबारा अपने काम में लौट गए। यह प्रसंग उनके स्वभाव को समझने के लिए काफी है। उनके लिए काम केवल नौकरी नहीं था। वह एक मिशन बन चुका था। इसी समर्पण के कारण मद्रास विश्वविद्यालय में उनके लंबे कार्यकाल के दौरान पुस्तकालय प्रशासन, वर्गीकरण और सार्वजनिक पुस्तकालयों को लेकर अनेक महत्वपूर्ण प्रयोग किए गए।
मद्रास से बनारस और फिर दिल्ली तक फैलता गया उनका प्रभावः
लगभग दो दशक मद्रास विश्वविद्यालय में बिताने के बाद 1945 में रंगनाथन Banaras Hindu University पहुंचे। वहां उन्होंने पुस्तकालय और उसके संग्रह को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने विश्वविद्यालय के लगभग एक लाख से अधिक संग्रहों को स्वयं वर्गीकृत करने का काम किया। इसके बाद उनका संबंध दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़ा, जहां उन्होंने Library Science के उच्च शिक्षा कार्यक्रमों के विकास में योगदान दिया। भारत में Library Science को एक गंभीर अकादमिक विषय के रूप में स्थापित करने में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। वह Indian Library Association के अध्यक्ष भी रहे और देश में पुस्तकालयों के व्यापक विकास की योजनाओं पर काम करते रहे।
रंगनाथन की यात्रा हमेशा आसान नहीं रही। Library Science के क्षेत्र में उनके विचारों और उनकी Colon Classification प्रणाली को लेकर बहस भी हुई। दिल्ली Public Library द्वारा Dewey Decimal Classification को अपनाए जाने के बाद उनके और संस्थान के बीच मतभेद सामने आए। लेकिन यही किसी महान विचारक की पहचान होती है। उनका प्रभाव केवल इस बात से नहीं मापा गया कि कितनी संस्थाओं ने उनकी प्रणाली अपनाई। उनकी असली विरासत यह थी कि उन्होंने लोगों को पुस्तकालय के बारे में सोचने का एक नया तरीका दिया। उन्होंने पूछा कि व्यवस्था केवल पुस्तकों के लिए होनी चाहिए या पाठक के लिए भी?
1955 के आसपास रंगनाथन कुछ समय के लिए ज्यूरिख गए। वहां उनके संपर्क यूरोपीय पुस्तकालय जगत से बढ़े। इसके बावजूद भारत से उनका जुड़ाव कम नहीं हुआ। उन्होंने अपनी पत्नी के सम्मान में मद्रास विश्वविद्यालय में प्रोफेसरशिप स्थापित करने के लिए योगदान दिया। बाद में वह भारत लौटे और बेंगलुरु में बस गए। 1962 में उन्होंने Indian Statistical Institute में Documentation Research and Training Centre की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अगले वर्षों में उन्होंने Documentation और Information Science के विकास को भी आगे बढ़ाया। 1965 में भारत सरकार ने उन्हें National Research Professor की उपाधि से सम्मानित किया।
रंगनाथन की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही थी कि उन्होंने Library Science को केवल किताबों की सूची बनाने वाला विषय नहीं रहने दिया। उन्होंने Documentation और Information Science के विकास की नींव मजबूत की। उनके विचार आज के डिजिटल युग में भी प्रासंगिक दिखाई देते हैं। आज हम इंटरनेट पर किसी जानकारी को कुछ सेकंड में खोज लेते हैं। लेकिन जानकारी को सही तरीके से वर्गीकृत करना, व्यवस्थित करना और उपयोगकर्ता तक पहुंचाना आज भी उतनी ही बड़ी चुनौती है। जिस समस्या पर रंगनाथन ने लगभग एक सदी पहले विचार किया था, वही समस्या आज डिजिटल डेटाबेस, सर्च इंजन और Information Architecture के रूप में हमारे सामने मौजूद है।
यह कहानी इसलिए असाधारण है क्योंकि रंगनाथन ने कभी Library Science को अपना लक्ष्य बनाकर शुरुआत नहीं की थी। वह गणित के शिक्षक थे। उन्हें एक ऐसी नौकरी दी गई, जिसमें उनकी शुरुआत अनिच्छा से हुई। फिर उन्हें विदेश भेजा गया। वहां उन्होंने अपनी जिज्ञासा को समस्या में बदला। समस्या को शोध में बदला। शोध को सिद्धांत में बदला। और सिद्धांत को एक ऐसी प्रणाली में बदल दिया, जिसने भारत में पुस्तकालय विज्ञान को नई दिशा दी। यही कारण है कि उन्हें भारत में Library Science, Documentation और Information Science के विकास का प्रमुख अग्रदूत माना जाता है।
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में रंगनाथन का स्वास्थ्य कमजोर रहने लगा। 27 सितंबर 1972 को ब्रोंकाइटिस से जुड़ी जटिलताओं के कारण उनका निधन हुआ। लेकिन उनकी कहानी वहीं समाप्त नहीं हुई। उनके जन्मदिवस को भारत में National Librarians' Day के रूप में मनाया जाता है। उनकी पुस्तकों, सिद्धांतों और वर्गीकरण प्रणाली पर आज भी अध्ययन किया जाता है। उनकी आत्मकथा A Librarian Looks Back उनके जीवन और विचारों की महत्वपूर्ण झलक देती है। 1992 में उनकी जन्मशती के अवसर पर उनके योगदान पर कई पुस्तकें और शोध प्रकाशित हुए।
आखिर उनकी सबसे बड़ी विरासत क्या थी?
शायद उनकी सबसे बड़ी विरासत कोई एक किताब, कोई एक वर्गीकरण प्रणाली या कोई एक पद नहीं था। उनकी सबसे बड़ी विरासत एक विचार था। वह विचार कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह सही व्यक्ति तक सही समय पर पहुंच सके। उन्होंने पुस्तकालय को शांत कमरों और धूल भरी अलमारियों से निकालकर समाज की प्रगति से जोड़ा। उन्होंने बताया कि किताबें केवल संग्रह करने की वस्तुएं नहीं हैं। वे तभी जीवित रहती हैं, जब उन्हें पढ़ा जाता है, खोजा जाता है और लोगों के जीवन को बदलने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
एक गणितज्ञ, जिसे अचानक लाइब्रेरियन बना दिया गया था, आखिरकार भारत में Library Science का सबसे बड़ा नाम बन गया। यही इतिहास का सबसे दिलचस्प मोड़ है। कभी जिस व्यक्ति ने ‘Library Classification’ शब्द तक नहीं सुना था, उसी ने दुनिया को ज्ञान को व्यवस्थित करने का एक नया नजरिया दिया। S.R. Ranganathan की कहानी हमें याद दिलाती है कि जिंदगी में कभी-कभी वह रास्ता सबसे महत्वपूर्ण साबित होता है, जिसे हम शुरुआत में अपना रास्ता मानते ही नहीं।
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