भारत वैश्विक स्तर की प्राचीन सभ्यताओं में प्रधान सभ्यता है। प्राचीन भारतीय सभ्यता में गणित ,तर्कशास्त्र , रेखागणित ,दर्शनशास्त्र एवं चिकित्सा शास्त्र की मूलभूत जड़े प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणाली से जुड़ा है। कौटिल्य, जिनको ' भारत का मैकियावेली' कहा जाता है,उनके शिक्षाओं का संकलन शास्त्रीय ज्ञान के अंतर्गत आता है। भारत को “परम वैभव संपन्न राष्ट्र होने के लिए प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणाली, प्राचीन सांस्कृतिक विरासत एवं शास्त्रीय ज्ञान को अपने राजनीतिक चिंतन, राजनयिक चिंतन, कूटनीतिक चिंतन एवं रणनीतिक चिंतन” में योजित करना होगा एवं इन आयामों पर शोध एवं नवाचार को बढ़ावा देकर “ वैश्विक शक्ति संरचना एवं वैश्विक राजनीति” में सकारात्मक पहल करना चाहिए । भारत प्राचीन काल में “ परम वैभव राष्ट्र के साथ सामरिक स्तर पर आत्मनिर्भर राष्ट्र” रहा है।
प्राचीन भारत में रणनीतिक चिंतन का आशय “ भारत के शासन एवं राजनीति, भारत की राजनीतिक व्यवस्था ,भारतीय सभ्यता, राजनीतिक चिंतन, रक्षा विज्ञान, कूटनीति एवं रणनीतिक चिंतन के राजनीतिक एवं रणनीतिक अवदान से है।” यह संप्रत्यय प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा एवं आधुनिक भारतीय ज्ञान परंपरा में उल्लिखित है। भारत के राजनीतिक संस्कृति एवं प्रशासकीय संस्कृति की जड़े बहुत गहराई से जुड़ी है। इन सभी विधाओं का सविस्तार भारतीय चिंतक एवं बहुआयामी प्रतिभा के धनी एवं प्राचीन भारत में केंद्रीकृत एवं मजबूत शासकीय संरचना के चिंतन को धरातल पर उतारने वाले महान भारतीय चिंतक कौटिल्य के द्वारा लिखी गई पुस्तक ' अर्थशास्त्र' में मिलता है,जो चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में लिखा गया था ।यह महान ग्रंथ कूटनीति, राजनीति, प्रशासन, राजकीय आभार बोध एवं गुप्तचर व्यवस्था पर मौलिक ग्रंथ मानी जाती है। इस ग्रंथ में तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था के निर्देशन के साथ भविष्य की समस्याओं के पथ- प्रदर्शन में महनीय भूमिका रही है। यह ग्रंथ शक्ति संतुलन की शासकीय संरचना, राष्ट्रीय हित की प्राथमिकता एवं यथार्थवादी चिंतन के व्यावहारिक धरातल का पथ- प्रदर्शन का कार्य कर रही है।
रामायण एवं महाभारत महाकाव्य हैं एवं इनमें तत्कालीन समाज की “जीवंत रूपरेखा “ का प्रस्फुटन है। इसमें सामाजिक स्थिति, राजनीतिक व्यवस्था के वर्गीकरण, राजपद के प्रति ईश्वरीय भावना एवं प्रबल आस्था, नैतिक दृष्टिकोण, राजधर्म की उपादेयता ,राजा एवं प्रजा के मध्य संतुलित संबंध, प्रजा के दु:ख को राजा का दु:ख ,राजा का प्रजा के प्रति ' पुत्रवत' सोच ,राजा के दैनिक दिनचर्या, राजा के शक्तियों पर नियंत्रण एवं राजकीय कर्मचारियों की व्यवस्था का उल्लेख हैं । इन महाकाव्यों में युद्ध ,गठबंधन धर्म ,अनुनय - विनय ,कूटनीति ,राजनीति ,राष्ट्र के प्रति निष्ठा ,अधर्म ,युद्ध संबंधी नियमों की अवहेलना ,लक्ष्य की प्राप्ति हेतु दिव्यास्त्र ,ब्रह्मास्त्र एवं पशुपति जैसे शस्त्रों की प्राप्ति हेतु तपमार्ग ,सत्य- असत्य के द्वंदधर्म, धर्म की अवधारणा एवं युद्ध में छल कपट के बारे में शिक्षाएं आदि का उल्लेख है । इन ग्रंथो ने उदारवाद, आदर्शवाद ,व्यक्तिवाद एवं आदर्शवाद के विवेकी मिश्रण को प्रस्फुट किया है । इन ग्रंथो का निचोड़ है कि “धर्म अर्थात उचित मार्ग से काम करना सर्वोत्तम है।”
भारत ने वैदेशिक स्तर के राष्ट्र- राज्यों के साथ-साथ सहयोगात्मक रुख करके एवं सामरिक दृष्टिकोणों को अपने “विचारधारा” में समायोजित कर अनुकूलित करके “प्रासंगिक” किया हैं ,जिससे अपने ' राष्ट्रीय हितों को पूर्ति कर सके' । भारत वैश्विक स्तर की सर्वाधिक प्राचीन संस्कृति, वैश्विक स्तर पर उदीयमान अर्थव्यवस्था, सामरिक स्तर में आत्मनिर्भर राष्ट्र ,राज्य एवं आधुनिक राष्ट्र - राज्यों में संतुलित शक्ति संरचना की दृष्टि से उपादेयता बनाए रखा है। भारत “विश्व गुरु “ की संकल्पना को ग्राहय करने के लिए देश की राजनीतिक संस्कृति एवं सामरिक संस्कृति को उन्नयन कर रहा है। वैश्विक शक्ति संरचना में सशक्त एवं उभरते शक्ति संरचना के लिए “आत्मनिर्भरता की अति आवश्यकता “ है। भारत की रणनीतिक संस्कृति बहुआयामी अवधारणाओं से योजित है, जो पश्चिमी राजनीतिक संस्कृति से अलग ,राजनीति एवं राष्ट्र - राज्य की अवधारणा से एकदम भिन्न है। रणनीतिक संस्कृति को साझा विश्वासों, मौलिक धारणाओं एवं राष्ट्र - राज्य के व्यवहारों के स्वरूपों के समूह में समझा जा सकता है।
भारत मौलिक स्तर पर एक ' समृद्ध स्वदेशी राजनीतिक संस्कृति' रखता है जो कौटिल्य के प्रमुख पुस्तक ' अर्थशास्त्र' के प्राचीन ग्रंथो में उल्लिखित है। भारत के राजनीतिक चिंतन में रामायण ,महाभारत, प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा एवं आधुनिक ज्ञान परंपरा के मौलिक “ निहितार्थ अंशों” का व्यापक प्रभाव है। महाभारत जो पाण्डवों एवं कौरवों के मध्य युद्ध पर आधारित एक पौराणिक महाकाव्य है जो “ धर्म परायण ,विवेकी एवं प्रजा हितैषी” राजा के राजकीय दायित्व पर गहन चिंतन को “रेखांकित” कर रहा है, जिसमें सामरिक, युद्ध, शासकीय नीति, लोक नीति एवं लोक कल्याण के विषय योजित है। विविध संस्कृतियों में बृहद स्तर पर प्रसारित ये ग्रंथ हैं राजाओं को रणनीति, कूटनीति, गठबंधन धर्म ,गुप्तचर व्यवस्था, नैतिक जिम्मेदारी, राजपद का उचित वर्णन एवं सत्ता के क्रियान्वयन, हस्तांतरण एवं लोकतांत्रिक वैद्यता के मार्गदर्शन का कार्य करती हैं। कौटिल्य का ' अर्थशास्त्र' भारत की रणनीतिक चिंतन का आधारशिला बना रहा, “ जो राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक क्षेत्र एवं सैन्य रणनीति पर एक बृहद एवं सुव्यवस्थित ग्रंथ है।” इन महाकाव्यों , ग्रंथो एवं लिखित पुस्तकों ने प्राचीन भारतीय चिंतन एवं तत्कालीन राजनीतिक चिंतन को नूतन आयाम दिए ,जिसमें “ शासन ,प्रशासन, शासकीय चरित्र ,विधि, वित्त, व्यापार, कृषि, उद्योग ,रक्षा ,कूटनीति गुप्तचर व्यवस्था ,लोक कल्याण एवं लोकतांत्रिक तत्व समाहित हैं “। कौटिल्य ,जिनको ' भारत के मैक्यावेलि ' के नाम से जाना जाता है। इनके ' अर्थशास्त्र' मैक्यावली के ' द प्रिंस' की भांति “ राजतंत्र ,प्रशासन, व्यावहारिक शासन, युद्ध एवं शांति की व्यवहारिक पक्षों की गहराई से विवेचना करता है।”
हाल के वर्षों में भारत के नीति - निर्माताओं, शासकीय प्राधिकृत व्यक्तित्वों ,निर्णय लेने वाले अभिकरणों एवं राजनीतिक समूहों द्वारा राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर को वैश्विक मंचों पर भारत की ' रणनीतिक प्राथमिकताओं ' को उद्देशित करने एवं उन्नयन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत के नेतृत्व द्वारा “गुटनिरपेक्षता की नीति” के प्रति अटूट प्रतिबद्धता, नस्लीय भेदभाव का विरोध, रणनीतिक स्वायत्तता की प्राथमिकता, नाभिकीय हथियार का पहला प्रयोग नहीं एवं शांति उद्देश्यों के लिए भारत परमाणु हथियारों का परीक्षण के सभी प्रत्यय लोकतांत्रिक, संयमित एवं नैतिक जिम्मेदारी का दायित्व है। सामयिक परिप्रेक्ष्य में भारत का रणनीतिक चिंतन सुरक्षात्मक दृष्टिकोण (डिफेंसीव विजन )की और उन्मुख हो रहा है। वैश्विक स्तर पर बदलते वैश्विक परिदृश्य , गुटिकरण की राजनीति, संयुक्त राष्ट्र का युद्ध रोकने में असफलता एवं बड़ी शक्तियों का आक्रामक दृष्टिकोण भारत के रणनीतिक चिंतन में आमूल- चूल परिवर्तन कर रहा है रहा है।
सामरिक क्षेत्र में “अभिनव” प्रयोग भारत की ऐतिहासिक विरासत को सामायिक आवश्यकताओं से जोड़ना है। इसके लिए भारत की सामरिक सामग्रियों, रणनीतिक सोच एवं राज्य व्यवस्था को नवाचार एवं नूतन आवश्यकताओं से योजित किया जा रहा है। नूतन नवाचार “ उद्भव” भारत की सांस्कृतिक विरासत में निहित बौद्धिक मूल्य एवं आदर्शों को संरचनात्मक ढंग से सुरक्षा, संरक्षा ,संघर्ष एवं खुफिया आवश्यकताओं को पूर्ति करने का प्रयास है। यह भारत की राजनीतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित करने का माध्यम है। भारत समकालीन में अपने सामर्थ्य ,क्षमता संस्कार एवं संकल्प के बल पर “विश्व गुरु” बनने की ओर अग्रसर हो रहा है। “ भारत के सामरिक एवं रणनीतिक चिंतन का सम्समान संपूर्ण विश्व में नए सिरे से स्थापित हो रहा है।”
भारत का रणनीतिक चिंतन प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा एवं आधुनिक यथार्थवाद का मौलिक समन्वय है। सामयिक परिप्रेक्ष्य में भारत को अपने आदर्शों एवं मूल्यों पर प्रबल विश्वास करके “व्यावहारिक धरातल” पर क्रियान्वित करना चाहिए । भारतीय राजनीतिक चिंतन का उद्देश्य ' लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को व्यावहारिक धरातल पर क्रियान्वित करना है।' भारतीय ज्ञान प्रणाली “ धर्मसम्मत शक्ति” का प्रयोग करता है। 20वीं सदी “अमेरिकी सदी “ कहीं जाती थी, ठीक उसी प्रकार 21वीं सदी “भारत की सदी “ कही जाएगी। वैश्विक क्षेत्र में भारत का ' मृदुल शक्ति' के साथ ' स्मार्ट रणनीतिक चिंतन' का देश कहा जाता है। हमारे राजनीतिक चिंतन का उद्देश्य “ आत्मनिर्भर, सहयोगी एवं उद्देश्य मूल्य होना चाहिए”। वैश्विक समस्याओं का निदान ' भारतीय चिंतन ' में है। भारत का ज्ञान परंपरा “ मानव कल्याण, राष्ट्र सर्वोपरि,वैश्विक नेतृत्व के उद्देश्य” को उन्नयन कर रहा है।





