यौन उत्पीड़न की शिकार बालिकाओं के प्रति न्यायालयों को अधिक संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण बनाने के उद्देश्य से और ऐसे मामलों में न्यायिक प्रतिक्रिया को सुदृढ़ करने के लिए भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (एनजेए) की ओर से सौंपे गए दिशानिर्देशों पर मुहर लगाते हुए इसे देश के सभी उच्च न्यायालयों, जिला अदालतों, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों और अभियोजन निदेशालयों को भेजने के आदेश दिए हैं। प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने आदेश दिया कि अभियोजन निदेशालय इन दिशानिर्देशों को बाकी सभी तक पहुंचाएंगे और एफआईआर दर्ज करने व आरोपपत्र दाखिल करने के दौरान पुलिस को जरूरी एहतियातों के बारे में जानकारी देंगे। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने समिति की रिपोर्ट को "बेहद उल्लेखनीय " बताते हुए कहा कि यह "पूरी टीम का असाधारण प्रयास" है।

बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल फरवरी में स्वत: संज्ञान लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को खारिज करते हुए राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को विस्तृत दिशानिर्देश तैयार करने को कहा था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पिछले साल मार्च में दिए गए फैसले में कहा था कि नाबालिग पीड़िता के वक्ष पकड़ने व सलवार का नाड़ा खोलने को बलात्कार का “प्रयास” नहीं माना जा सकता और यह सिर्फ बलात्कार की “तैयारी” थी।

बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए 250 से भी अधिक नागरिक समाज संगठनों के नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) ने हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ तत्काल पीड़िता की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण और आपराधिक दंड विधान के स्थापित सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ करार देते हुए खारिज कर दिया। साथ ही, शीर्ष अदालत ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत दोनों आरोपियों के खिलाफ पहले से लगे बलात्कार के प्रयास के आरोप को भी बहाल कर दिया।

साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी, भोपाल को निर्देश दिया कि वह यौन शोषण के पीड़ितों से संबंधित मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों व न्यायिक प्रक्रियाओं में संवेदनशीलता विकसित करने के उद्देश्य से एक समग्र व व्यापक दिशानिर्देश तय करने के लिए एक समिति गठित करे और तीन महीने में अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपे।

यह देखते हुए कि यौन हिंसा पीड़ितों में ज्यादातर बच्चे और कम उम्र की युवतियां शामिल हैं,  अकादमी के निदेशक न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अनिरूद्ध बोस की अध्यक्षता में गठित समिति ने पीड़ितों के बयान दर्ज करते समय बच्चों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैये, सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति व मुकदमे के समयबद्ध निपटारे, बच्चों के प्रति संवेदनशील भाषा के प्रयोग व मुकदमे से पहले पीड़ितों की काउंसलिंग के भी निर्देश दिए हैं। इसके अलावा कहा गया है कि पीड़ित का कभी भी आरोपी से आमना-सामना नहीं कराया जाएगा।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका ने कहा, “इस तरह के दिशानिर्देशों की अर्से से आवश्यकता महसूस की जा रही थी और इलाहाबाद हाई कोर्ट की असंवेदनशील टिप्पणियों के बाद ये अपरिहार्य हो गए थे। अब इन दिशानिर्देशों पर सख्ती से अमल की जरूरत है ताकि यौन शोषण व हिंसा का सामना कर रही महिलाओं व बच्चों के लिए गरिमा के साथ न्याय सुनिश्चित किया जा सके।”

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जितेंद्र परमार
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