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देश की चिकित्सा व्यवस्था ही बीमार है…

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने 5 जुलाई को कोविड-19 के मामलों के लिए 1,000 बिस्तरों वाली एक चिकित्सा इकाई शुरू की। कहा गया कि इसे रिकॉर्ड 11 दिन में तैयार किया गया है। उसी दिन दिल्ली सरकार ने 10,000 बिस्तरों वाले चिकित्सा केंद्र का उद्घाटन किया। हमें बताया गया कि यह दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा चिकित्सा सेवा केंद्र है। इसमें दो राय नहीं कि कांग्रेस नेता सरदार पटेल जिन्हें संघ परिवार ने अपना नायक बनाया है, वह इस बात से बेहद प्रसन्न होते कि दोनों अस्पताल उनके नाम पर हैं।
इतना ही नहीं हमने भारतीय भूमि पर अतिक्रमण कर रहे चीन को भी दिखा दिया है कि हम हर काम जो वह करता है, उससे बेहतर कर सकते हैं। मिसाल के तौर पर सप्ताह भर में अस्पताल तैयार करना।

बहरहाल, अपनी पीठ थपथपाने के अलावा दिल्ली में बनी इन दो बड़ी चिकित्सा इकाइयों से जुड़ी अन्य बातों पर विचार करना आवश्यक है। पहली बात: प्रतिक्रिया देने में देरी। यह निर्णय लेने में इतनी देर क्यों की गई? दिल्ली अप्रैल से ही कोविड-19 महामारी का हॉटस्पॉट बना हुआ है। यही कारण है कि पड़ोसी राज्यों से लगने वाली उसकी सीमाएं जून तक कमोबेश बंद रहीं। तब तक अस्पतालों में बिस्तरों की कमी जाहिर हो चुकी थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने एक विचित्र आदेश दिया था कि दिल्ली के निवासियों के अलावा अन्य लोगों का सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं होगा। हालांकि इसे बाद में वापस ले लिया गया। इन दोनों केंद्रों को लेकर मचे हो हल्ले से इतर महामारी से सर्वाधिक प्रभावित राज्य महाराष्ट्र ने बांद्रा-कुर्ला, महालक्ष्मी रेसकोर्स, गोरेगांव और मुलुंड में बड़े चिकित्सा केंद्र शुरू कर दिए थे।

संकट का पूर्वानुमान लगाने के मामले में हमारे सरकारी प्रतिष्ठानों की कोई खास प्रतिष्ठा नहीं है। यदि ऐसा होता तो सेना की मदद से ऐसी सुविधाएं देश के दूरदराज इलाकों में भी स्थापित की जा सकती थीं। ये वे जगहें हैं जहां जरूरत के समय समुचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती।

यहां एक बड़ा मसला उठता है। अल्पावधि में बेहतरीन परिसंपत्ति निर्माण के इस मॉडल को देश भर में स्वास्थ्य नीति के मानक परिचालन प्रक्रिया के रूप में क्यों नहीं अपनाया जाता? सच तो यही है कि विपरीत परिस्थितियों में अस्पताल बनाने और उन्हें चलाने की सेना की क्षमता का इस्तेमाल कोविड-19 के आक्रमण से बहुत पहले शुरू कर देना चाहिए था।

कोविड-19 ने मृत्यु के मामले में तपेदिक के सिवाय सभी संक्रामक बीमारियों को पीछे छोड़ दिया है। परंतु इस महामारी से पहले भी भारत में चिकित्सा की स्थिति ऐसी थी जिसे किसी भी विकसित देश में संकट ही माना जाता। करीब 30 लाख भारतीय तपेदिक के शिकार हैं और देश की 40 फीसदी आबादी में छिपी हुई टीबी है। इसके अलावा श्वसन से जुड़ी तमाम बीमारियां हैं मसलन निमोनिया, रहस्यमयी फ्लू जिसका इलाज नहीं हो पाता, पुराने संचारी रोग मसलन मलेरिया, दिल की बीमारी और मधुमेह आदि भी हर वर्ष बड़ी तादाद में भारतीयों को प्रभावित करते हैं। अगर देश में बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था होती तो इनमें से कई बीमारियों और उनसे होने वाली मौतों को टाला जा सकता था। देश की प्रति 1,000 आबादी पर अस्पताल के बिस्तरों के आंकड़े ग्रामीण इलाकों में बेहद खराब हैं। इस विषय पर दशकों से टीका टिप्पणी हो रही है लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

वर्ष 2017 की स्वास्थ्य नीति के मुताबिक प्रति 1,000 आबादी पर कम से कम दो बिस्तर होने चाहिए, हालांकि यह भी विश्व स्वास्थ्य संगठन के तीन बिस्तरों के मानक से कम है। बहरहाल, इसके मुताबिक भी अगले दो दशक में 20 लाख बिस्तर वाले अस्पताल तैयार करने होंगे। जबकि सरकारों ने सन 1960 के दशक से ही स्वास्थ्य व्यय कम रखा है। यह जीडीपी एक फीसदी से जरा सा अधिक है। इसका सबसे अधिक नुकसान गरीबों को ही उठाना पड़ता है। आयुष्मान भारत चिकित्सा बीमा योजना ने निस्संदेह चिकित्सा सुविधा का विस्तार किया है लेकिन कोविड-19 महामारी ने यह दिखा दिया है कि बेहतरीन बीमा योजना भी चिकित्सा क्षेत्र के बुनियादी ढांचे या चिकित्सकों, नर्सों तथा बुनियादी उपकरणों का विकल्प नहीं हो सकती। यह संदेश शायद अब तक सरकार नहीं समझ सकी है। विशेषज्ञों के अनुसार कोविड-19 हमें दूसरे दौर के सुधार का अवसर देता है। परंतु अब तक सुधार के नाम पर ऋण को स्थगित करने और ब्याज दरों में कमी जैसे कदम ही देखने को मिले हैं।

सड़कों और राजमार्गों के निर्माण के जरिए रोजगार उत्पन्न करने के नाम पर भारी व्यय की योजना बनाई जा रही है। अगर उतना ही धन वंचित इलाकों में प्राथमिक, द्वितीयक या तृतीयक चिकित्सा सुविधाएं तैयार करने में लगाया जाए तो भी उतने ही रोजगार पैदा होंगे। महामारी ने ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में चिकित्सा सुविधा विकसित करने का भी अच्छा अवसर दिया है। हम जानते हैं कि अधिकांश चिकित्साकर्मी दूरदराज इलाकों में जाकर काम नहीं करना चाहते। इसमें भी राह निकाली जा सकती है जैसे केरल का बेयरफुट डॉक्टर नेटवर्क। परंतु सरकार को हल तलाशने के लिए सुदूर दक्षिण में जाने की जरूरत नहीं। हर बारह वर्ष में आयोजित होने वाले कुंभ मेले में भी चुनौतीपूर्ण हालात में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं देने का दृश्य नजर आता है। गत वर्ष प्रयागराज अद्र्धकुंभ में 100 बिस्तरों वाले एक अस्पताल में रोजाना 50,000 लोगों का इलाज कुंभ अवधि तक किया गया। इस अस्पताल में पैथ लैब, अल्ट्रासाउंड, एक्सरे और आईसीयू आदि सभी थे और आसपास के लोगों ने भी इसका लाभ लिया।

कुंभ प्रशासन ऐसी नागरिक सुविधाएं मुहैया कराईं जो आम भारतीय सामान्य दिनों में केवल सपनों में ही देख सकता है। इसे हार्वर्ड के अध्ययन में शामिल किया गया है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर क्यों इसे अपवाद के बजाय नागरिक प्रशासन और चिकित्सा ढांचे का मानक नहीं बनाया जाता। दूसरे शब्दों में देश की संचालन संस्थाओं की क्षमता अल्पावधि के उपायों में क्यों खपाई जाती है।

साभार- https://hindi.business-standard.com/ से

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