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गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब में संगीत का जादूः तृप्त होकर भी अतृप्त रह गए रसिक श्रोता

गोरंगाँव स्पोर्ट्स क्लब का नाम आते ही खेलकूद व सामाजिक गतिविधियों के कई रंग सामने आ जाते हैं, लेकिन इस क्लब में दीवाली के अवसर पर शास्त्रीय संगीत की सुरलहरियाँ श्रोताओं को मदमस्त कर देगी इसकी कल्पना भी किसी को नहीं थी।

11 हजार से ज्यादा सदस्यों वाले इस क्लब में जब दीवाली की प्रातः शास्त्रीय संगीत से हुई तो उपस्थित श्रोताओं को अंदाजा भी नहीं था कि सुरों का जादू उनके सिर पर चढ़कर बोलने लगेगा। मराठी परंपरा में तठत के रूप में शास्त्रीय गायन किया जाता है इसी परंपरा को जीवंत बनाए रखने के लिए क्लब ने ये आयोजन किया था। इस आयोजन की खूबसूरती यह थी कि श्रोतागण पारंपरिक वेशभूषा में आए थे और पूरा माहौल भारतीय संस्कृति की झलक दिखा रहा था। नववारी साड़ी में आई श्रीमती गायकवाड़ और श्रीमती पवार ने आतिथियों का परंपरागत रूप से टीका लगाकर स्वागत किया तो डॉ. कविता सावंत ने कार्यक्रम के आरंभ में दिवालसी पहाट के इस आयोजन के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किस तरह कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस का वध किया था और हम नरक चतुर्दशी के रूप मेंइस दिवस को मनाते हैं। उन्र्होने बताया कि हमारे हर वार-त्यौहार और परंपराओं में गहरे अर्थ छुपे हुए हैं और ऐसे आयोजनों के माध्यम से हम इन परंपराओं व त्यौहारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचा सकते हैं।

कार्यक्रम का प्रारंभ गायिका नैनीषा मुलावकर द्वारा प्रस्तुत राग अहीर भैरव से हुआ और प्रभु रामचन्द्रजी का गीत श्रोताओं के लिए एक अद्भुत आनंद वृष्टि की तरह था। प. जसराज द्वारा गाया गया राम काम ह्रदय में धरिये जैसी सिध्दहस्त गायिका से सुनना किसी रोमांच से कम नहीं था। शास्त्रीय संगीत को आम श्रोताओं तक पहुँचाना इतना आसान नहीं होता, लेकिन नैनीषाजी ने स्वरों के आरोह अवरोह व कोकिलकंठी मिठास से सुरों का जो प्रवाह बनाया उसका सीधा असर श्रोताओं के चेहरे पर दिखाई दे रहा था। इसके बाद राग देश में कृष्ण की बाल लीला से तो गायिका ने मानों श्रोताओं को सीधे बृज की कुंज गलियों में नटखट कृष्ण के साथ खड़ा कर दिया। म्हारो प्रणाम बाँके बिहारी श्रोताओं के लिए एक अध्यात्मिक अनुभव था। निनाद मुलावकर की बाँसुरी के सुरों की तान ने गोकुल की गलियों का अहसास करा दिया।

गायिका नैनीषाजी और बाँसुरी वादक निनाद जी की इस अप्रतिम जोड़ी के लिए ये प्रस्तुति एक विशेष आनंद का विषय थी, क्योंकि जिस हाल में ये प्रस्तुुति दे रहे थे उसी हाल में तीन वर्ष पूर्व इनके विवाह का स्वागत समारोह संपन्न हुआ था और देश के जाने माने संगीतकार, गायक और कलाकार इस युगल जोडी को अपना आशीर्वाद देने के लिए आए थे।


जय जय पांडुरंग और अबीर गुलाल …सखा पांडुरंग मराठी शास्त्रीय परंपरा की एक रोमांचक प्रस्तुति रही। सिध्दहस्त कोकिलकंठी गायिका नैनी जी के गायन की रसधारा को पखावज पर गणेश सावंत, तबले पर जोधपुर से आए राघवानी बेस गिटार पर मनीष कुलकर्णी, की बोर्ड पर विशाल धुमालजी और संतूर पर सबसे युवा कलाकार कोल्हापुर से आए सोहम जगताप ने जो संगत दी उससे ऐसा लगा मानों सुरों की सरिता किसी इठलाती नदी की तरह गरजती हुई समुद्र रूपी श्रोताओं के ह्रदय में समाहित हो रही हो। कलाकारों की सिध्द कला को श्रोताओं के कानों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने का श्रेय जाता है . साउंड इंजीनियर श्री संजय राणे को , जिन्होंने अपने जादू से पखावज, तबला, गिटार संतूर से लेकर गायन के स्वरों को श्रोताओं के कानों तक किसी रसीले मिश्रण की तरह पहुँचाया।

कार्यक्रम का समापन माझे पंढरी की प्रस्तुति के साथ परंपरागत राग भैरवी से हुआ और इतना सब कुछ सुनकर भी श्रोता तृप्त रहकर भी अतृप्त रह गए।

कार्यक्रम के मध्य में तबला, पखावज, बाँसुरी, संतूर , आक्टोपैड पर कलाकारों ने एकल प्रस्तुति ने श्रोताओं को रोमांचित कर दिया।

यही इन कलाकारों की और हमारे शास्त्रीय संगीत की उपलब्धि है।

इस कार्यक्रम के सूत्रधार थे क्लब की सांस्कृतिक समिति के प्रमुख डॉ. एमजी अग्रवाल और उनके सहयोगी डॉ. विनय पाँडुरंगी। कार्यक्रम का सरस संचालन करते हुए डॉ. पाण्डुरंगी ने मंच पर बैठे कलाकारों और श्रोताओं के बीच बेहतरीन तादात्म्य स्थापित किया। कलाकारों को बीच-बीच में विश्राम देते हुए क्लब के वरिष्ठ पदाधिकारियों का परिचय और सम्मान करते हुए उनका अहोभाव भी व्यक्त किया।

क्लब के अध्यक्ष श्री विनय जैन कार्यक्रम की शुरुआत करने के लिए आए थे मगर संगीत रस में ऐसे डूबे कि पूरे समय उपस्थित रहे। क्लब के अन्य प्रमुख लोगों में डॉ. श्याम अग्रवाल, प्रमोद तावड़े, श्री आरडी बोहरा, श्री श्यामसुंदर लढ्ढा, श्री पवन बैरागरा की उपस्थिति इस बात का प्रमाण थी कि संस्कृति संवर्धन के लिए क्लब का शीर्ष नेतृत्व कितना समर्पित डॉ. श्याम अग्रवाल ने ऐसे आयोजनों की उपयोगिता बताते हुए कहा कि हम इस तरह के कार्यक्रमों से ही हमारी आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति और अपनी विरासत से जोड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि आज हम दीवाली की शुभकामनाएँ बी हैप्पी दीवाली कहकर देते हैं, ये बहुत ही दुर्भाग्य की बात है।

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