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उस मंत्री के शिकंजे से ऐसे बची महिला पत्रकार

कभी लगता है कि पत्रकारिता में तमाम फैसले लेने का आधार गुण-दोष न हो कर हालात और उसे प्रभावित करने वाले फैक्टर होते हैं। अक्सर एक ही व्यक्ति कभी कोई फैसला लेते समय सैद्धांतिक दृढ़ता प्रदर्शित करता हैं तो किसी और मामले में वह दबाव में आ जाता हैं। मेंने एक ही व्यक्ति को दो अलग-अलग मामलों में अलग रुख अपनाते हुए देखा। कभी वह बहुत शक्तिशाली व्यक्ति के भी दबाव में नहीं आते हैं तो कभी लोग बहुत छोटे व्यक्ति के दबाव में भी आ जाते हैं।

फैसले लेने के तरीके में आने वाले इस बदलाव को मैं आज तक नहीं समझ पायी हूं। एक सरकार में एक बहुत शक्तिशाली मंत्री थे। वे उस समय गृह मंत्रालय संभाल रहे थे। एक दिन बड़ा बम विस्फोट हुआ। हमारे चैनल के एक रिपोर्टर को इस बारे में बयान लेने के लिए भेजा गया। वह मंत्री से मिलने के उनके घर पहुंचीं। उसने उनके निजी स्टाफ से कहा कि वह उनसे मिलना चाहती है। उस समय बड़ी संख्या में दूसरे चैनलों के रिपोर्टर भी मंत्री का इंतजार कर रहे थे।

उसे आश्चर्य हुआ कि जब स्टाफ के एक कर्मचारी ने उससे कहा कि आइए और अपने साथ ले जाकर उसे ड्रांइग रुम में बैठा दिया। खुद को मिलने वाले इस वीआइपी बरताव से वह खुद भी बहुत गौरवान्वित महसूस कर रही थी। कुछ देर बाद किसी के कदमों की आवाज़ आती सुनाई पड़ी। वह उस समय अकेली थी। अचानक उसने महसूस किया कि कोई उसके सोफे के पीछे खड़ा हो गया और फिर किसी ने उसके गले में अपनी बाहें डाल दीं। यह सब उसके लिए एकदम अप्रत्याशित था जिसकी कि उसने कल्पना भी नहीं की थी।

अनायास ही उसके मुंह से हल्की सी चीख निकल गई। वह चौक कर, उठकर खड़ी हो गई। अब दोनों आमने सामने थे। उसने देखा कि उसके गले में बांहे डालने वाला कोई और नहीं बल्कि वह मंत्री था जिससे कि वह मिलने के लिए आयी थी। उसे देखकर वह भौंचक्की रह गई। वह समझ नहीं पायी कि उसे क्या करना चाहिए। जब मंत्री ने उसका चेहरा देखा तो वह गुस्से में चिल्लाने लगा। इस तरह की हरकत करने के बाद भी शर्मिंदा होने या सारी कहने की जगह उस पर बरसते हुए बोला कि तुम अंदर कैसे आ गई? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे ड्राइंग रुम में घुसने की?

एक तो वह इस घटना से वैसे ही घबरा गई थी और मंत्री के इस व्यवहार ने उसे और भी परेशान कर दिया। वह रोती हुई बाहर भागी। जब वह घर से बाहर निकली तो उसकी हालत देखकर वहां मौजूद बाकी पत्रकारों को भी लगा कि कुछ गड़बड़ हो गया है। उन्होंने इस बारे में पूछना भी चाहा पर वह रोती हुई अपनी गाड़ी में बैठकर वहां से चली आयी। उस समय हमारे संपादक लंदन में थे। उसने दफ्तर आते ही सबसे पहला काम यह किया कि इस पूरी घटना को सोशल मीडिया पर लिख डाला। फिर क्या था हंगामा खंडा हो गया। यह बात आग की तरह फैल गई। कुछ ही देर में उस मंत्री को इसका पता चल गया और उसने सीधे संपादक से संपर्क किया। संपादक ने उससे बात की और समझाते हुए कहा कि वह उनके आने का इंतजार करें और उसने जो कुछ लिखा है उसे तुरंत सोशल मीडिया से हटा ले। इस घटना की चर्चा भी किसी और से न करें। उसने मुझसे बात की और मैंने उससे कहा कि वे सही कह रहे हैं। तुम्हें इस पूरे प्रकरण को सार्वजनिक करने की जगह पहले संपादक को बताना चाहिए था। इसके बड़े दूरगामी परिणाम निकल सकते हैं।

वे मेरी बात मान गई और उसने वह घटना सोशल मीडिया से हटा ली। बाद में पता चला कि उस मंत्री ने जान बूझ कर हरकत नहीं की। उसकी कोई पत्रकार मित्र थी जिससे उसके अंतरंग संबंध रहे होंगे। उस दिन उसने उस पत्रकार को मिलने का समय दे रखा था। जब मेरी मित्र ने उसके स्टाफ से कहा कि वह मंत्री से मिलने आयी है तो उन लोगों को यह भ्रम हो गया कि वह वही महिला थी जिसे मंत्री ने सीधे ड्रांइग रुम में भेजने के निर्देश दिए हुए थे। उन्होंने उसे वहां भेज दिया और मंत्री को सूचित कर दिया। वह उसी धोखे में आकर आत्मीयता प्रदर्शित करते हुए उससे मिला और उसका आलिंगन करना चाहा पर वहां तो कोई और था। बाद में जब संपादक स्वदेश लौटा तो उसने उसे समझाया और मुझसे भी कहा कि तुम अपनी दोस्त को समझाओ की आवेश में आकर ऐसे कदम उठाना ठीक नहीं है।

उसने मुझे बताया कि पहले तो मंत्री ने मुझसे कहा कि अपनी रिपोर्टर को समझा दो कि सोशल मीडिया पर बकवास लिखना बंद कर दे। उसे इतनी भी तहजीब नहीं है कि मंत्री से मिलने आने के पहले उससे मुलाकात का समय लिया जाता है। संपादक ने मुझसे कहा कि मैंने बहुत मुश्किल से इस रिपोर्टर की नौकरी बचायी है। मंत्री मेरे ऊपर उसे नौकरी से हटा देने के लिए बहुत दबाव डाल रहा था। तब मुझे लगा कि यह संपादक कितना आर्दशों व सिद्धांतों पर चलने वाला है जो कि अपने अधीनस्थ लोगों को बचाने के लिए किसी भी तरह के दबाव में नहीं आता है।

मेरी यह धारणा कुछ समय बाद एक खबर के चलते बदल गई। प्रवर्तन निदेशालय में मेरे संपर्क चाहते थे कि मैं एक व्यवसायिक घराने द्वारा मनी लांडरिंग व ठगी के मामले की खबर दूं। यह घराना राजनीतिक पहुंच वाला था व प्रवर्तन निदेशालय तक को आंखें दिखा रहा था। उन्होंने मुझे सारे दस्तावेज सौंप दिए और यह अनुरोध किया कि मैं इनके आधार पर खबर तैयार करुं पर मूल दस्तावेजों को चैनल पर न दिखाउं।

मैंने संपादक को वे दस्तावेज सौंप दिए और इस निर्देश से भी अवगत करवा दिया। पर वह कहां मानने वाला था। उसने उनसे पूरा वाक्य उद्धृत करना शुरु कर दिया। जब यह खबर चली तो मेरे सोर्स ने मुझे फोन करके कहा कि ऐसा क्यों कर रहे हो? हमने मना किया था। मैंने संपादक से बात की तो वह बोला कुछ नहीं होता। खबर चलने दो। अगर इतना ही डर रहे थे तो यह दस्तावेज क्यों दिए?

उधर दूसरी ओर उस कंपनी के लोगों ने भी संपादक से संपर्क साधना शुरु कर दिया। उन्होंने ईमेल भी भेजा जिसमें दावा किया गया था कि इस खबर में कोई सच्चाई नहीं है। संपादक ने उनसे कहा कि हमारे पास पूरे दस्तावेज है। मेरे पास मेरे सोर्स का भी फोन आ रहा था कि प्लीज खबर रुकवा दो पूरा मामला उल्टा पड़ रहा है। मेरी हालत फुटबाल सरीखी हो गई थी। न तो संपादक ही मेरी सुन रहा था और न ही मेरा सोर्स कुछ सुनने को तैयार था। उसने अपने नौ बजे के प्राइम टाइम शो में वह दस्तावेज दिखला दिए। उसकी दलील थी कि उस कंपनी के लोग चैनल पर मानहानि का दावा ठोकने की धमकी दे रहे थे इसलिए ऐसा करना जरुरी हो गया था। इधर दस्तावेज दिखाए गए कि उधर से मेरे सोर्स ने मुझे से फोन कर कहा कि तुमने मेरी नौकरी लेने का पूरा इंतजाम कर लिया है। मैंने भी झल्ला कर कहा कि मैं कुछ नहीं कर सकती हूं। अगर इतना ही डर था तो मुझे दस्तावेज क्यों दिए थे। मैंने उससे सीधे संपादक से बात करने को कहा। बाद में अचानक पूरी खबर व दस्तावेज 10 बजे के बुलेटिन से गायब हो गए। उनका कहीं जिक्र तक नहीं था। जब अगले दिन मैंने अपने ब्यूरो चीफ से इसकी वजह पूछी तो उन्होंने रहस्यमयी मुस्कान के साथ जवाब दिया कि तुम तो जानती ही हो कि तरह-तरह की डील होती हैं कौन कैसे डील करता है, इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है।

(लेखिका युवा खोजी पत्रकार हैं जो कि देश के सबसे बड़े चैनल से जुड़ी है)

(साभार: नया इंडिया)

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