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नई प्रस्तावित राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर सुझाव/आपत्ति

माननीय प्रकाश जावडेकर जी,
मानव संसाधन विकास मंत्रालय,
पता: 301, सी-विंग, शास्त्री भवन,
नयी दिल्ली-110-001
ई-मेल : [email protected]/

ई-मेल: नई प्रस्तावित राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर आमंत्रित सुझाव/आपत्ति भेजने के लिए:
[email protected]

आदरणीय महानुभाव,

वर्तमान शिक्षा नीति के प्रस्ताव ख़तरनाक और आपत्ति जनक है: वर्तमान शिक्षा नीति का प्रस्ताव ब्रिटिश सरकार को भेंट कर देना संगत होगा.टी एस आर सुब्रहमण्यम सहित पाँच सदस्यों के द्वारा की गई तैयार नई शिक्षा नीति लार्ड मैकॉले के मानस-पुत्रों , अँग्रेजी परस्त-ग़ुलाम मानसिकता से ग्रस्त, अंध समर्थकों के वर्ग के द्वारा, वर्ग के हित में तैयार की गयी है इसका संबंध स्वाधीन भारत, जो कभी सोने की चीड़िया
था, उसके महान गौरव को लौटाने का अंश मात्र भी नहीं है। इसका मूलभूत आधार भारतीय भाषाओं, संस्कृति और वैभव के विरोध पर पर आधारित है। वैभव और राष्ट्र के हित में कदापि भी नहीं है।

यह ग़रीब और अमीर बालकों के बीच भेदभाव की दीवार को मज़बूत बनाने के उद्देश्य से तैयार की गई है। – इसमें भारतीय भाषाओं की उपयोगिता और महत्त्व को चालबाजी और षड़यंत्र पूर्वक नकारा गया है। -यह मात्र अक्षर- ज्ञान की मूर्ति-पूजा सिखाने वाली है। भारतीय जीवन-पद्दति का मूल आधार मुक्ति मार्ग से बहुत दूर है। -यह शिक्षा को शरीर के लिए आजीविका का साधन मानती है। यथार्थ में आजीविका तो चरित्र, नैतिकता, स्वावलंबन और आत्मबल पर आधारित होना चाहिए। – लॉर्ड मैकॉले भारत को मानसिक रूप से ग़ुलाम बनाए रखना चाहता था, उस लक्ष्य को पूरा करने में यह शिक्षा नीति अँग्रेजी भाषा और अँग्रेजों की
जीवन पद्धति से पूरा करने में सहायक होगी। प्रस्तावित शिक्षा नीति के प्रस्ताव में कक्षा पाँचवी तक के बालकों को भारतीय भाषाओं के द्वारा राज्यों की ओर से शिक्षा दिये जाने की का कहा गया है।
जब कि निजी विद्यालयों के बालकों को प्रारम्भ से ही विदेशी भाषा अँग्रेजी में पढ़ाया जाता रहेगा। भविष्य में राज्यों की भाषाओं में शिक्षित बालक अँग्रेजी के कारण प्रतियोगिता में पिछड़ जावेंगे। यह भेद-भाव वाली परंपरा स्वाधीनता के बाद से जारी है। -इस शिक्षा नीति में पूरे देश के बालकों को पड़ोस के विद्यालयों में पढ़नें की नीति का उल्लेख नहीं किया गया है। -शिक्षा नीति का प्रस्ताव सिर्फ अँग्रेजी में
बनाया गया है इस पर भारतीय भाषाओं से जूड़े पिचानवें प्रतिशत भारतीय भाषाओं से जुड़े लोगों को सुझाव देने के अपने संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। राज भाषा हिंदी के संवैधानिक
नियमों का भी उल्लंघन किया गया है।

शक्षा की महत्ता राष्ट्र का जीवन सँवारने में आधारभूत है। स्वाधीन राष्ट्र के निर्माण में शिक्षा का स्थान सर्वोपरि होता है। शिक्षा की गुणवत्ता से राष्ट्र की उज्जवल छबि बनती है। -शिक्षा से राष्ट्र के विकास की दिशा निश्चित होती है। -शिक्षा के सँस्कार से भावी पीढ़ी का जीवन संवरता है। —————————————–

पूर्व में इन तीन प्रसिद्ध शिक्षाविदों ने शिक्षा नीति प्रस्तुत की है: १. सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन। २. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष डॉ. दौलतसिंह कोठारी। ३. प्रोफेसर राममूर्ति।
वर्तमान की प्रस्तावित शिक्षा नीति पूर्व केबिनेट सचिव टी एस आर सुब्रहमण्यम।

विडम्बना:
-उल्लेखनीय सवाल यह है कि तीन शिक्षा नीतियों को शिक्षा से जुड़े शिक्षाविदों ने तैयार किया था इनमें से किसी को भी लागू नहीं किया जा सका है। जब कि चौथी शिक्षा नीति को प्रशासकीय एक प्रशासकीय अधिकारी को तैयार करने का दायित्वसौंप दिया गया है, यह गम्भीरता से विचारणीय प्रश्न है। राष्ट्र की भावी पीढ़ी के जीवन के साथ खिलवाड़ किया गया है। अन्य चार सदस्यों के नामों
का उल्लेख जारी रिपोर्ट में ही नहीं किया गया है। देश को कैसे ज्ञात हो कि इसके सदस्य किस क्षेत्र से लिए गए थे ? प्रस्तावित शिक्षा नीति तैयार करने में मुख्य भूमिका प्रशासकीय अधिकारी को सौंपने
से स्पष्ट हो जाता है कि शिक्षा नीति बनाने वालों की मानसिकता और राष्ट्र के कितने हित में थी, प्रस्तुत शिक्षा नीति की रिपोर्ट में यह जानकारी नहीं है कि समिति को किन-किन बिंदुओं पर अपनी रिपोर्ट तैयार करना थी। प्रस्तुत शिक्षा नीति में राष्ट्र धर्म, राष्ट्र हित, संस्कृति, विरासत, राष्ट्रीय आवश्यकताओं, गुणवत्ता, नैतिकता, मानवीयता, दया, करूणा और जीवन का निर्माण करने वाली आधार विशेषताओं का
उल्लेख नहीं है। प्रस्तुत शिक्षा नीति की रिपोर्ट अँग्रेजी भाषा में बनाए जाने से से देश के सामान्य नागरिकों को जो भारतीय भाषाओं से जुड़े हैं, उन्हें जान बूझ कर अंधकार में रखा गया है।

-मानव संसाधन विभाग का नाम पुन: शिक्षा विभाग
-प्रस्तुत शिक्षा नीति मानव संसाधन विकास विभाग के लिए तैयार की गई है। भारतीय संस्कृति के अनुसार मनुष्य साधन नहीं साध्य है। वह कलपुर्ज़ा तंथा मशीन नहीं है। शिक्षा:राष्ट्र, समाज और परिवार
का वर्तमान तथा भावी के जीवन को संवारने के लिए होती है। वह नैतिकता, आदर्श, चरित्र, आत्म-शांति होती है। यह भारतीयता है। मानव को संसाधन वाले नाम को दफ़ना कर शिक्षा मंत्रालय नाम पुन: अपनाया
जाय प्रस्तुत शिक्षा नीति का आधार अँग्रेजों द्वारा अंग्रेजियत के हितों का पोषण करना है। यह राष्ट्रघाती, अमानवीय, अँग्रेजी भाषा को सदा के लिए लादने की ग़ुलाम मानसिकता पनपाने वाली है। इसमें आत्म
तत्व नहीं है। यह बेजान है। प्रस्तुत शिक्षा नीति में भारत राष्ट्र की प्रथम संवैधानिक राजभाषा के नियमों का पालन नहीं किया गया है। राजभाषा हिंदी को अपनाया जाने के लिए राजभाषा नियम हैं। उन नियमों
का पालन किया जाना था। रिपोर्ट मूल रूप से राजभाषा हिंदी में और राज्यों की भाषाओं में होना थी। अँग्रेजी विदेशी है। उससे मुक्ति चाहिए। उसने भारत की मानसिकता को पंगु और विकलांग बना रखा है। भारत की पिचानवें प्रतिशत आबादी अँग्रेजी नहीं जानती है। जिन लोगों के नाम पर प्रस्तुत रिपोर्ट बनाई गई है, उन्हें इस रिपोर्ट के केंद्र से बाहर रखा गया है।

‘ इण्डिया’ को लौटाओ ताकि ‘भारत’ का ज्ञान जीवंत हो जाय

-शिक्षा पूरे देश की आबादी के हित में गुणवत्ता युक्त होना चाहिए। -शिक्षा पूरे देश में सामान्य परिवारों के द्वारा शिक्षा खर्च वहन करने लायक हो। शिक्षा संस्थानों में एक रूपता हो। शिक्षा संस्थानों में अनुसंधान,
शोध प्रबंध आदि की सुविधाऐं विश्व स्तरीय हो। शिक्षा देने वालों को आर्थिक दृष्टि से सम्मान पूर्ण सुविधाऐं मिले। वे दुनिया का सतत् ज्ञान और खोज को विद्यार्थियों को दे सके, प्रावधान हो। जर्मनी की तरह शिक्षा
नि:शुल्क हो। शिक्षा पर सरकार सर्वाधिक खर्च अपने बजट का करें। मातृभाषा, राज्य भाषा और प्रथम संवैधानिक राजभाषा हिंदी पढ़ाने की नीति हो। अँग्रेजी के साथ दसवीं कक्षा से अन्य विकसित देशों
की भाषाऐं सीखने की एच्छिक नीति हो। -सिर्फ अँग्रेजी से नहीं, दुनिया की भाषाओं की शोध/खोज का ज्ञान सीधा मिल सकें उन्नत राष्ट्र अँग्रेजी से नहीं अपनी भाषाओं से विकसित हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ भी कहता है कि शिक्षा मातृभाषा में दी जाना चाहिए।

संपर्क

निर्मलकुमार पाटोदी,
विद्या -निलय, ४५, शांति निकेतन ,(बाॅम्बे हाॅस्पीटल के पीछे),
इन्दौर-४५२०१० मध्य प्रदेश
सम्पर्क :०७८६९९१७०७० । मेल: [email protected]

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