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संपत्ति शत्रु की तो मालिक कौन?

भाजपा के सत्ता में आने के बाद शत्रु संपत्ति कानून का मामला फिर गरमाने लगा है। आरोप है कि पिछली यूपीए सरकार ने अपने करीबी राजा महमूदाबाद को फायदा उठाने के लिए ही इस कानून में संशोधन किया था। ऐसे में यह सवाल पैदा होता है कि राजा महमूदाबाद कौन है?

वे अवध के सबसे बड़े ताल्लुकदारों में गिने जाते हैं। कहा जाता है कि इस वंश के पूर्वज काजी नसरुल्ला थे, जो कि बगदाद से भारत आए थे।

वे मुहम्मद बिन तुगलक के एक सिपाहसलार थे, जिसने उन्हें अवध में जागीर अदा की थी। इनके पूर्वज ने हेमू के साथ हुए युद्ध में अकबर की सहायता की थी और पुरस्कार स्वरुप इन्हें नवाब की पदवी प्रदान की गई थी। नवाब बिजाद खान ने महमूदाबाद रियासत की स्थापना की थी। महमूदाबाद के वर्तमान कथित राजा यह दावा करते हैं कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उनके पूर्वजों ने बेगम हजरत महल के साथ मिलकर अंग्रेजों से युद्ध लड़ा था। मगर यह दावा इसलिए सच प्रतीत नहीं होता क्योंकि अंग्रेजों ने विजय प्राप्ति के बाद महमूदाबाद की जागीर जब्त करने के बजाय उन्हें और जागीरें प्रदान की थीं। इसके अतिरिक्त उन्हें लखनऊ में कैसर बाग में स्थित नवाब वाजिद अली शाह का महल तोहफे में दिया जो कि आज महमूदाबाद हाउस के नाम से विख्यात है। इससे साफ है कि 1857 में महमूदाबाद के राज परिवार ने अंग्रेजों की सहायता की थी। वर्तमान कथित राजा के दादा मोहम्मद अली खान मुस्लिम विश्वविद्यालय के पहले उपकुलपति थे। उन्होंने मुस्लिम लीग के तीन अधिवेशनों की अध्यक्षता भी की थी।

उनके बेटे आमिर अहमद खान पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के विश्वस्त सहयोगियों में थे। वे कई वर्षों तक मुस्लिम लीग के कोषाध्यक्ष भी रहे। पाकिस्तान बनाने के आंदोलन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही है। 1957 में वे पाकिस्तान चले गए मगर वहां के शासकों से उनकी नहीं बनी। इसलिए वे लंदन चले गए। वहीं 1973 में उनकी मृत्यु हुई। 1965 में भारत सरकार ने शत्रु संपत्ति अधिनियम के तहत उनकी संपत्ति अपने नियंत्रण में ले ली थी। राजा की दो पत्नियां भी थीं।

राजा साहब खुद तो पाकिस्तान चले गए मगर अपनी एक बेगम कनीज आब्दी एवं एक पुत्र मोहम्मद आमिर मोहम्मद खान को भारत में ही छोड़ गए। यही वर्तमान राजा हैं। इन्होंने एक हिंदू महिला विजया से निकाह किया। राजा साहब काफी तेज व्यक्तियों में माने जाते हैं। 15 साल तक वे चुप रहे इसके बाद उन्होंने कांग्रेस के साथ अपने संबंधों को बढ़ाया और नेहरु परिवार के साथ अपनी नजदीकियों को भुनाया। 1980 में उन्होंने अपनी संपत्ति की वापसी के लिए प्रयास तेज किए। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी के व्यक्तिगत प्रभाव के कारण केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यह पेशकश की कि उन्हे भारत सरकार कस्टोडियन द्वारा ली गई संपत्ति में से एक चौथाई भाग वापस करने के लिए तैयार है, मगर उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।

1981 में राजा साहब ने संपत्ति की वापसी के लिए लखनऊ की एक अदालत में मुकदमा दायर किया था। जिसे वे जीत गए। हाईकोर्ट में वे केस हार गए। इसके बाद उन्होंने उच्चतम न्यायालय में अपील की। उनके वकील वर्तमान केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद और अभिषेक मनु सिंघवी थे। अदालत में कुछ किराएदारों ने भी हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी।

इनकी ओर से अरुण जेटली और राम जेठमलानी भी पेश हुए। वर्तमान राजा के एक सौतेले चाचा ने भी हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी। उसकी ओर से वकील पी. चिदंबरम थे। कहा जाता है कि इस वादी ने जो दस्तावेज पेश किए थे वे फर्जी थे। इसलिए उसने बाद में अपनी याचिका वापस ले ली
2005 में उच्चतम न्यायालय ने राजा आमिर मोहम्मद के पक्ष में अपना निर्णय दिया। इस निर्णय के कारण सरकार को वह संपत्ति राजा को वापस लौटानी पड़ी जो कि शत्रु अधिनियम कानून के तहत कस्टोडियन ने अपने नियंत्रण में ली थी।

इस फैसले का लाभ उठाने के लिए अनेक लोगों ने शत्रु अधिनियम के तहत कस्टोडियन द्वारा ली गई संपत्ति की वापसी के लिए अदालत की शरण लेनी शुरु कर दी। इस पर दो जुलाई 2010 को राष्ट्रपति ने एक अध्यादेश जारी किया जिसमें यह प्रावधान किया गया था कि यदि शत्रु संपत्ति कानून के तहत कस्टोडियन अपने नियंत्रण में लेता है तो उसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। बाद में संसद में अक्टूबर में प्रस्तुत विधयेक नंबर 2 में यह संशोधन किया गया कि शत्रु संपत्ति अधिनियम के बारे में 2 जुलाई 2010 से पूर्व अदालतों ने जो फैसले दिए हैं उन पर यह कानून लागू नहीं होगा। साफ है कि यह संशोधन सिर्फ राजा मजमूदाबाद को लाभ पहुंचाने के लिए किया गया।

राजा महमूदाबाद की राजनीति में ऊपर तक पहुंच है। महमूदाबाद का शासक परिवार इस क्षेत्र का राजनीतिक रुप से सबसे प्रभावी परिवार है जिसका नेहरु परिवार और कांग्रेस से गहरा संबंध रहा है। राजा सुलेमान मियां उर्फ मोहम्मद आमिर खान यह दावा करते हैं कि उनके दादा का पंडित मोतीलाल से गहरा संबंध था और वे उनके द्वारा स्थापित स्वराज्य पार्टी में शामिल भी हुए थे। राजा के पिता मोहम्मद आमिर अहमद खान बाद में कांग्रेस द्वारा मुसलमानों की उपेक्षा किए जाने के कारण मुस्लिम लीग में शामिल हो गए। वे जिन्ना के प्रमुख सहयोगी थे। 1916 में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच जो लखनऊ समझौता हुआ था वह उनके महमूदाबाद हाउस में हुआ था।

राजा दो बार कांग्रेस के टिकट पर उत्तरप्रदेश के विधायक चुने गए थे। पहली बार उन्होंने 1985 में स्वर्गीय राजीव गांधी के निर्देश पर चुनाव लड़ा था। सुप्रीम कोर्ट में राजा ने जो याचिका दायर की थी उसमें यह दावा किया था कि 1981 में केंद्रीय सरकार ने उन्हें पूर्वजों की छोड़ी हुई संपत्ति में से 25 प्रतिशत भाग देने की पेशकश की थी। यह उस संपत्ति का भाग है जो कि उनके स्वर्गीय पिता के पाकिस्तान चले जाने के बाद भारत सरकार ने शत्रु संपत्ति अधिनियम के मतहत अपने नियंत्रण में ली थी। राजा ने इसके खिलाफ बम्बई हाईकोर्ट में 2001 में अपील की थी। सवाल यह पैदा होता है कि राजा साहब 15 वर्ष से भी अधिक समय तक चुप क्यों रहे? उन्होंने अपने पूर्वजों की संपत्ति, जो कस्टोडियन के पास थी, की वापसी के लिए तब अदालत की शरण क्यों नहीं ली?

-(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। विनम्र उनका लेखन नाम है।)

साभार- http://www.nayaindia.com/ से 

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