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हिन्दी के प्रसिध्द लेखक डॉ. महीप सिंह नहीं रहे

मशहूर साहित्यकार डॉ. महीप सिंह का निधन हो गया है वो 85 साल के थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के एक गांव में साल 1930 में हुआ था। डॉ. महीप सिंह के पिता उनके जन्म के कुछ साल पहले ही पाकिस्तान से आकर यहां बस गए थे। उनके परिवार में पत्नी , दो बेटे और एक बेटी है। चार दशक से भी अधिक समय में डॉ महीप सिंह ने लगभग 125 कहानियाँ लिखीं।काला बाप गौरा बाप,पानी और पुल,सहमे हुए,लय, धूप की उँगलियों के निशान, दिशांतर और कितने सैलाब जैसी कहानियाँ मील के पत्थर हैं।उनके उपन्यास यह भी नहीं और अभी शेष है काफी चर्चित रहे।वे संचेतना के संपादक भी रहे। उन्होंने हिन्दी के साथ-साथ पंजाबी और अंग्रेजी भाषा में भी लिखा।

डॉ. सिंह की प्रारंभिक शिक्षा कानपुर में हुई। उन्होंने कानपुर के डीएवी कॉलेज से पोस्ट ग्रेजुएशन फिर आगरा विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा मुंबई से हासिल की।
उनका आरएसएस से भी नाता रहा। काफी समय तक वो शाखा से जुड़े रहे। उन्होंने दिल्ली के साथ-साथ विदेशों में अध्यापन का काम भी किया। डॉ. सिंह को शिक्षा मंत्रालय, हिन्दी संस्थान, हिन्दी व पंजाबी अकादमी, भाषा विभाग (पंजाब) सहित कई संस्थाओं से सम्मानित किया था। इसके साथ ही उन्होंने कई देशों की साहित्यिक यात्राएं भी कीं। साल 2009 में उन्हें भारत भारती सम्मान भी प्रदान किया गया था।

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