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रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज: अभिनय का नवचैतन्य सृजन

कलिंग! कलिंग! कलिंग! ऐसी गर्जना करते हुए नाटक ‘सम्राट अशोक’ में ‘अशोक’ के किरदार को धारण कर मंजुल भारद्वाज मंच पर प्रवेश करते हैं तो सम्राट अशोक की सत्ता और अहंकार की हुंकार गूंज उठती है।

इस प्रयोग के पूर्वाभ्यास को मैंने अपनी आँखों से देखा, पहले दिन से लेकर अब तक की प्रक्रिया में इस चरित्र का बढ़ता हुआ ग्राफ, गहराई, गरिमा और अभिनय के कई मापदंडों को तोड़कर नए आयामों को सृजित होते हुए देखा. मैंने अपने जीवन में मराठी और हिंदी रंगभूमि पर विविध नाटकों को जिया और देखा भी है। सम्राट अशोक का यह किरदार मुझे अब तक के नाटकों में देखे गए विभिन्न अभिनेताओं के पात्रों से बहुत आगे ले जाता है। सम्राट अशोक के चरित्र को देखते हुए, मंजुल सर की तीक्ष्ण नज़र, स्पंदित होते स्पंदन, शरीर, हाथ और पैरों की शार्प मुद्राएँ मेरे भीतर की अभिनेत्री को अचंभित करते है।

12 अगस्त, 2021 को थिएटर ऑफ रेलेवन्स नाट्य सिद्धांत को 29 वर्ष पूरे हुए। अपने तत्वों पर अडिग रहकर विश्व को सुंदर और मानवीय बनाने को प्रतिबद्ध यह 29 वर्ष। इस शुभ अवसर पर धनंजय कुमार द्वारा लिखित और मंजुल भारद्वाज द्वारा निर्देशित तथा अभिनीत नाटक ‘सम्राट अशोक’ की प्रस्तुति का हम थिएटर ऑफ रेलेवंस के रंगकर्मियों ने मंचन किया।

अध्यात्म अध्य आत्म यानी आत्म अध्ययन .. मनुष्य, मनुष्य बनकर कैसे जिये यह दर्शानेवाला अध्ययन। पूर्वाभ्यास के दौरान नाटक ‘सम्राट अशोक’ और अध्यात्म के बीच सीधा संबंध जोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई। स्व का अध्ययन करनेवाला व्यक्ति हमेशा अध्यात्म के शिखर पर होता है। हमारे इतिहास में इसके कई उदाहरण हैं। थिएटर ऑफ रेलेवन्स का हर नाटक एक नयी संकल्पना लेकर आता है। तत्व और ध्येय उसके आधार स्तम्भ होते हैं. उस तत्व को कलाकार बड़े विश्वास और प्रतिबद्धता के साथ दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। और विशेषकर हर तत्व को व्यक्ति के तौर पर अपने जीवन में उतारने की शुरुआत करता है। सम्राट अशोक यह नाटक समग्र व्यक्तित्व, स्टेट्समेनशिप के विचार को लेकर आता है । स्व- अध्ययन से आत्मपरिवर्तन की शुरुआत होती है।
स्व-अध्ययन में व्यक्ति खुद को, परिवार को, समाज को, देश को, विश्व को और ब्रम्हांड को भी अपने अंदर समेट लेता है । हर प्रश्न को स्वयं ही परत दर परत खोलता है।
इस स्तर पर व्यक्ति खुद को प्रकृति के साथ एकरूप करता है। प्रकृति पांच तत्वों से बनी एक अद्भुत और सरस-सुगढ़ संरचना है। मनुष्य इस प्रकृति की सबसे सुंदर रचना है । पंचतत्व से बनी प्रकृति का अपने अंदर स्थान देने के लिए पंचतत्वों से ही सृजित मनुष्य अपने पंच इन्द्रियों के माध्यम से आवाहन करता है।

नाटक में सम्राट अशोक का चरित्र केवल इन पांच इंद्रियों को ही नहीं, बल्कि हमारी अमूर्त छठी इंद्रिय, जिसे हम आत्मा, एहसास, मन इन शब्दों से पहचानते हैं, उसे जागृत कर दुनिया के सामने एक अद्भुत यात्रा के तौर पर प्रस्तुत करती है।
जब भी मैं इस पंचतत्व के माध्यम से सम्राट अशोक के चरित्र को देखती हूं, तो उनके चरित्र की यात्रा प्रकृति द्वारा बनाई गई नीतियों के साथ मेरे सामने प्रकट होती है। जैसे प्रकृति सर्वव्यापी, परिवर्तनकारी और सृजनशील है, सम्राट अशोक अपने आप से संघर्ष करते हुए पंचमहाभूतों के तत्वों को अपने अंदर उतारता है।
कलिंग युद्ध के कारण लगे घावों का एहसास उसके अहंकार को नष्ट कर उसके मन में मानवीय संवेदना को जगाता है।
अपने अहं को छोड़ स्वयं ज्योति से प्रकाशित होकर पूरे ब्रह्मांड को देखता है। अहिंसा की पक्की मिट्टी पर खड़े होकर और जल के समान पवित्र और सर्वव्यापी आकाश का रूप धारण करके, सम्राट अशोक युगों की यात्रा कर हमारे सामने अशोक स्तंभ के रूप में हमारी, हमारे देश की पहचान के रूप में सामने है.

धनंजय कुमार द्वारा लिखे गए इस नाटक के शब्द रंगमंच की मिट्टी में समा जाते हैं और वहीं से मंजुल भारद्वाज के अभिनय से अंकुरित होकर अंतरिक्ष में उड़ान भरते हैं।

इस नाटक का प्रथम मंचन युसूफ मेहर अली सेंटर, तारा, पनवेल में हुआ।

हमारे देश के निर्माण की प्रक्रिया में, असंख्य क्रांतिकारियों ने अपने जीवन की आहुति दी, यूसुफ मेहर अली, जिन्होंने हमें ‘भारत छोड़ो’ का नारा दिया था, हमने उन तमाम क्रान्तिकारियों को उनकी ही भूमि पर पुष्पांजलि के रूप में ‘सम्राट अशोक’ नाटक की प्रथम प्रस्तुति को समर्पित किया। इस संकट काल में भी सरकार के सभी नियमों का पालन करते हुए 45 से 50 दर्शक “सम्राट अशोक” के साकार होने के साक्षी बने। अपने विकारों पर विवेक की जीत के एहसास को जिया।

वर्तमान के संदर्भ और उसके साथ समन्वय को खोजते हुए मैंने इस नाटक की प्रस्तुति का अनुभव किया। संविधान के मौलिक तत्वों की जड़ें सम्राट अशोक की शासन – प्रशासन नीति में मिलती हैं। 12 अगस्त 2021 की प्रस्तुति मेरे लिए अविस्मरणीय रही। मंजुल भारद्वाज का अभिनय मुझे सम्राट अशोक के काल में लेकर गया। उन्होंने अशोक के आत्मसंघर्ष को बड़े प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। पूर्वाभ्यास की शुरुआत में मंच पर मंजुल सर के साथ खड़े होने में मुझमें कंपकपी छाई थी। लेकिन जैसे ही उन्होंने थिएटर ऑफ रेलेवन्स का ध्येय , नाटक का ध्येय और कलाकारों के व्यक्तिगत ध्येय का सम्मिलन हुआ, मुझे मंजुल सर एक सह-कलाकार की तरह महसूस होने लगे। अध्यात्म, पंचतत्व, पंच इन्द्रियों की अनुभूति की दृष्टि से सम्राट अशोक नाटक को जीते हुए मेरे चरित्र की चेतना से मेरे भीतर के कलाकार की ऊंचाई बढ़ी और एक कलाकार के रूप में मेरे अंदर एक दृढ़ विश्वास का निर्माण हुआ। इस नाटक के प्रस्तुति ने मुझे एक कलाकार के रूप में जबरदस्त ताकत दी। एक कलाकार के रूप में स्वामित्व दिया।

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत का सूत्रपात रंग चिंतक मंजुल भारद्वाज ने 12 अगस्त,1992 को किया था. 2021 में थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत के 29 वर्ष पूरे हो रहे हैं

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत अपने रंग आन्दोलन से विगत 29 वर्षों से देश और दुनिया में पूरी कलात्मक प्रतिबद्धता से इस सचेतन कलात्मक कर्म का निर्वहन कर रहा है.

परिवर्तन को उत्प्रेरीत करते हुए विगत 29 वर्षों से ” थिएटर ऑफ रेलेवन्स” नाट्य सिद्धांतने निरंतर सरकारी, गैर सरकारी, कॉर्पोरेट फंडिंग या अन्य किसी देश – विदेशी अनुदान के बगैर अपनी प्रासंगिकता और अपने मूल्य एवं कलात्मक संवाद तरंगों से मानवता की हुंकार बने जनमंच को जागतिक रूप देता आ रहा है. सरकार के 300 से 1000 करोड के अनुमानित संस्कृति संवर्धन बजट के विरुद्ध प्रेक्षक सहभागिता एवं सहयोग से खड़ा है यह रंग आंदोलन- मुंबई से मणिपुर तक !

“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” विगत 29 वर्षों से निरंतर जीवन को नाटक से जोड़कर साम्प्रदायिकता पर ‘दूर से किसी ने आवाज़ दी’, बाल मजदूरी पर ‘मेरा बचपन’, घरेलु हिंसा पर ‘द्वंद्व’, अपने अस्तित्व को खोजती हुई आधी आबादी की आवाज़ ‘मैं औरत हूँ, ‘लिंग चयन’ के विषय पर ‘लाडली’, जैविक और भौगोलिक विविधता पर “बी-७”, मानवता और प्रकृति के नैसर्गिक संसाधनो के निजीकरण के खिलाफ “ड्राप बाय ड्राप :वाटर”, मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने के लिए “गर्भ”, किसानो की आत्महत्या और खेती के विनाश पर ‘किसानो का संघर्ष’, कलाकारों को कठपुतली बनाने वाले इस आर्थिक तंत्र से कलाकारों की मुक्ति के लिए “अनहद नाद-अन हर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स”, शोषण और दमनकारी पितृसत्ता के खिलाफ़ न्याय, समता और समानता की हुंकार “न्याय के भंवर में भंवरी”, समाज में राजनैतिक चेतना जगाने के लिए ‘राजगति’ और समता का यलगार ‘लोक-शास्त्र सावित्री’ नाटक के माध्यम से फासीवादी ताकतों से जूझ रहा है!

कला हमेशा परिवर्तन को उत्प्रेरित करती है. क्योंकि कला मनुष्य को मनुष्य बनाती है. जब भी विकार मनुष्य की आत्महीनता में पैठने लगती है, उसके अंदर समाहित कला भाव उसे चेताता है, सतर्क करता है !

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(अश्विनी नांदेडकर विगत 10 वर्षों से “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य सिद्धांत की प्रयोगकर्ता हैं .अश्विनी नांदेडकर ने थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” के विभिन्न नाटकों में अभिनय कर रहीं हैं । उन्होंने ने देश – विदेश में थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” का प्रतिनिधित्व किया है।)

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