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झुग्गी झोपड़ी के ये बच्चे निकालते हैं अपना खुद का हिन्दी और अंग्रेजी अखबार

सड़कों पर अपने भविष्य की लड़ाई लड़ता देश का भविष्य आज कागजों पर अपना भविष्य उकेर रहा है। ये कहानी है एक ऐसे अखबार की, जिसने भटकते बचपन को एक नई राह दी है। दरअसल इस अखबार का नाम है ‘बालकनामा’ और इस अखबार में कहानियां ढूंढने और लिखने से लेकर अखबार छापने तक में ऐसे बच्चे लगें हैं, जिनकी उम्र 18 साल से कम है।

ये ऐसे बच्चें हैं जो दिल्ली के सड़कों और झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं। यह अखबार हिंदी के अलावा अंग्रेजी में भी छपता है और अंग्रेजी में इसका प्रकाशन साल 2015 में शुरू किया गया और इसके बाद इसे विदेशों में भी भेजा जाने लगा। यह एक टैबलॉयड साइज का अखबार है। इस अखबार के लिए काम करने वाले अधिकांश रिपोर्टरों ने इस अखबार से जुड़ने के बाद पढ़ना-लिखना शुरू किया है।

‘बालकनामा’ के संस्करण पहले हस्तलिखित थे, अब इसे अखबारी पद्धति के साथ निकालना शुरू किया गया। वैसे ये अखबार एक दशक से अधिक समय से प्रकाशित हो रहा है। आज इसकी प्रसार संख्या केवल दिल्ली में ही 5500 है। हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में भी इनका प्रसार बढ़ाया जा रहा है। महीने में एक बार छपने वाले इस अखबार की कीमत महज 2 रुपए रखी गई है। इनमें से अधिकतर अखबार पुलिस स्टेशनों और गैर सरकारी संगठनों को जाते हैं। यह अखबार बिना किसी फायदे वाले मॉडल पर चलता है। इसलिए सरकार द्वारा सहायता मिल पाने से अब ये बच्चे विज्ञापन के लिए भी कोशिश कर रहे हैं।

इस अखबार से जुड़े अधिकांश रिपोर्टर किसी न किसी गैर सरकारी संगठनों से जुड़े हैं। अखबार में संपादक रिपोर्टर जैसे महत्वपूर्ण पद भी हैं, जिनकी अपनी अनोखी योग्यता है। सबसे पहले तो आपकी उम्र 18 वर्ष या उससे अधिक नहीं होनी चाहिए। 18 साल की उम्र होते ही रिटायरमेंट। अखबार से जुड़े बाल पत्रकारों की औसत आयु लगभग 14 वर्ष है।

साउथ दिल्ली में अखबार का अपना दफ्तर है। यहां खबरों के मुद्दे पर चर्चा की जाती है। लीड-बॉटम, एंकर बच्चे इन शब्दों से बखूबी वाकिफ हैं और मिलकर उन्हें तय करते हैं।

इस अखबार की एडिटर चांदनी नामक लड़की है और उसकी उम्र महज 18 साल है। इस अखबार के लिए काम करने वाले रिपोर्टरों की संख्या 60 है और वे मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों से ताल्लुकात रखते हैं। ये सारे रिपोर्टर पूरे दिल-ओ-जान से लग कर इस अखबार को निकलवाने के लिए काम करते हैं और कई बार उनकी खबरों के फ्रंट पेज पर जगह न मिलने की वजह से मायूस भी हो जाते हैं। बालकमाना की हर माह की 25 को संपादकीय बैठक भी होती है।

साभार- samachar4media.com/ से

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