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विदुर नीति शठे शाठ्यं समाचरेत् ! नहीं जानते नरेंद्र मोदी , थप्पड़ खाने के लिए दूसरा गाल परोसना ज़रुर जानते हैं

लोगबाग कह रहे हैं कि क़ानून व्यवस्था के नाम पर पंजाब में अब राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए। भाजपा के चंपू लोग कुछ ज़्यादा ही उछल रहे हैं राष्ट्रपति शासन लगाने के नाम पर। लेकिन भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार किसी सूरत पंजाब में राष्ट्रपति शासन नहीं लगाएगी। याद कीजिए बीते बरस इस से भी बुरी स्थिति पश्चिम बंगाल में थी। पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा चरम पर थी। राज्यपाल तक ख़ून के आंसू रो रहे थे। ख़ुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह बयान दे रहे थे कि सी आर पी एफ ने न बचाया होता तो मेरी हत्या हो जाती। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा के काफिले पर हमला हुआ। प्रदेश अध्यक्ष कई बार पिटते-पिटते बचे। उन के लोग पिटते रहे। हत्याएं होती रहीं। मोदी सरकार से लोग पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की गुहार करते रहे पर मोदी को अपने पर गुमान बहुत था। लोकतंत्र पर अभिमान बहुत था। राष्ट्रपति शासन नहीं लगा। अगर राष्ट्रपति शासन लगा कर पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए होते तो परिणाम कुछ और हुए होते। पंजाब में भी राष्ट्रपति शासन लगा कर चुनाव होंगे तो नतीजे कुछ और होंगे।

लेकिन पश्चिम बंगाल से भाजपा बुरी तरह लात खा कर , हार कर , अपने हज़ारों कार्यकर्ताओं को मरवा कर , हत्या करवा कर पश्चिम बंगाल से लौटी। बड़े बेआबरु हो कर तेरे कूचे से हम निकले वाली बात हो गई। भाजपाई आज तक दौड़ा-दौड़ा कर मारे जा रहे हैं। मार के डर से पार्टी छोड़-छोड़ बड़े-बड़े नेता चले गए। इसी तरह पंजाब से भी भाजपा लात खा कर लौटेगी। पर राष्ट्रपति शासन नहीं लगने देगी। नहीं लगाएगी। ‘अपने सीएम को थैंक्स कहना, मैं जिंदा लौट रहा हूं। ‘ इसी एक वाक्य से वह काम चला लेंगे। राजनीति का कोई और तीर चला लेंगे। पोलिटिकल सर्जिकल या पोलिटिकल एयर स्ट्राइक कर लेंगे कांग्रेस पर। पर राष्ट्रपति शासन ? तौबा-तौबा !

आख़िर गुजरात से आते हैं नरेंद्र मोदी। गांधी के गुजरात से। गांधी के यहां कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी थप्पड़ के लिए परोस देने का चलन है। मोदी पाकिस्तान या चीन के लिए भले विदुर नीति अपनाते हुए शठे शाठ्यं समाचरेत् ! यानी जैसे को तैसा ! अपनाते हों पर देश में वह लोकतंत्र की ध्वजा उठा कर नोबल प्राइज की कतार में हैं। पश्चिम बंगाल हो , पंजाब हो , भाजपाई लात खाते रहेंगे। चुनाव में बाजा बजवाते रहेंगे पर राष्ट्रपति शासन ? तौबा-तौबा !

कांग्रेसी और कम्युनिस्ट उन्हें कहते रहें फासिस्ट , बताते रहें हिटलर , करते रहें नफ़रत पर यह दूसरा गाल परोसते रहेंगे। नरेंद्र मोदी अपनी सारी रणनीति , सारी विजय , सारे पराक्रम यहीं आ कर खो देते हैं। खोते रहेंगे। कांग्रेसी और कम्युनिस्ट यह बात अच्छी तरह जानते हैं। हिंसक लोगों से माफ़ी मांग कर , कृषि बिल वापस लेना नरेंद्र मोदी की बहुत बड़ी भूल है। यह हम मानते हैं। इस की क़ीमत अभी जाने कब तक वह चुकाते रहेंगे। डिप्लोमेसी और त्याग जैसे तत्व इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में भले काम आते हैं पर नेशनल पॉलिटिक्स में विदुर नीति शठे शाठ्यं समाचरेत् ! यानी जैसे को तैसा ! ही काम आती है। नरेंद्र मोदी को अभी यह सीखना शेष है।

बतौर प्रधान मंत्री ही नहीं , बतौर कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी इस बात को बहुत जल्दी सीख गई थीं। अकारण ही केरल में नंबूदरीपाद की चुनी हुई वामपंथी सरकार को बर्खास्त कर के वह भले अपने पति फ़िरोज़ गांधी को खो बैठी थीं पर विदुर नीति , शठे शाठ्यं समाचरेत् ! यानी जैसे को तैसा ! को कभी नहीं छोड़ा। सरकार पर सरकार बर्खास्त करने का ग़ज़ब रिकार्ड है इंदिरा गांधी का। अपने ही मुख्य मंत्रियों के पर भी अकसर कतरती रहती थीं। किसी भी मुख्य मंत्री को कभी उन का कार्यकाल नहीं पूरा करने दिया। ताश की गड्डी की तरह मुख्य मंत्रियों को फेटती रहती थीं। एक बार तो उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी को एक ही दिन में चार बार लखनऊ से दिल्ली बुलवा लिया। वह लखनऊ लौटते तब तक फिर दिल्ली से बुलावा आ जाता। नतीज़तन उन का एक नाम नई दिल्ली तिवारी भी पड़ गया था। नारायणदत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के चार बार मुख्य मंत्री रहे। इस का मतलब यह हरगिज न समझिए कि वह बीस बरस तक मुख्य मंत्री रहे। हर बार दो साल , तीन साल , एक साल।

दिलचस्प यह कि इंदिरा गांधी के पुत्र मिस्टर क्लीन कहे जाने वाले राजीव गांधी ने भी मां के इस अलोकतांत्रिक आदत को बदस्तूर जारी रखा। पर नरेंद्र मोदी जिन को कांग्रेसी और उन के खलासी कम्युनिस्ट लोग हिटलर , फासिस्ट आदि कहते हैं , अभी तक तो कोई एक सरकार नहीं बर्खास्त की है। लेकिन इंदिरा गांधी ने तो 356 का दुरुपयोग कर कोई 50 बार विपक्ष शासित राज्य सरकारों को बर्खास्त करने , राष्ट्रपति शासन लगाने का अद्भुत रिकार्ड बनाया है। पूरे देश को बंधक बना कर सिर्फ़ अपनी कुर्सी बचाने के लिए इमरजेंसी लगा दी। पर इंदिरा गांधी लोकतांत्रिक हैं।

लेकिन नरेंद्र मोदी फासिस्ट हैं , हिटलर हैं। लोकतंत्र में उन का यक़ीन नहीं है। हां , कांग्रेसियों का यक़ीन है। हिंसक और खूनी विचारधारा की राजनीति करने वाले स्टालिन , मार्क्स , माओ जैसे हिंसक राजनीति के पुरोधाओं के पुजारी कम्युनिस्टों का लोकतंत्र में बहुत यक़ीन है। देश की जनता द्वारा चुने हुए प्रधान मंत्री को वह प्रधान मंत्री नहीं मानते। देश की जनता से आजिज अरुंधती रॉय जैसी लेखिकाएं अब कह रही कि ऐसा क़ानून बना देना चाहिए कि कोई व्यक्ति एक बार ही प्रधान मंत्री बन सके। बार-बार नहीं। लेकिन लोकसभा में पारित 370 समेत कई क़ानून इन्हे मंज़ूर नहीं है। अद्भुत है हमारा भारत देश। राजीव गांधी का एक जुमला था , मेरा भारत देश महान ! अब अलग बात है बोफ़ोर्स की कालिख में मेरा भारत महान का ज़ज़्बा कांग्रेस भूल गई। ठीक वैसे है जैसे सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा लिखने वाल इक़बाल पाकिस्तान के संस्थापकों में शुमार हो गए।

साभार https://sarokarnama.blogspot.com/2022/01/blog-post_6.html से

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