वह मैच उस आधुनिक प्रश्न का उत्तर भी था कि क्या महानायक अभी भी इतिहास लिखते हैं, या अब संस्थाएँ, संरचनाएँ और सामूहिकता ही अंतिम निर्णायक शक्ति हैं?
फुटबॉल में कभी पेले, माराडोना, ज़िदान, रोनाल्डो और मेसी ( मैं मैस्सी नहीं लिख रहा after today’s mess) जैसे व्यक्तित्वों का युग था। इक्कीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध धीरे-धीरे उस युग से आगे बढ़ रहा है जहाँ "सिस्टम" व्यक्ति से बड़ा होता जा रहा है।समाजशास्त्री मैक्स वेबर ने करिश्माई सत्ता और संस्थागत सत्ता के बीच जो भेद किया था, वही इस फ़ाइनल में दिखाई दिया। अर्जेंटीना अभी भी करिश्मे की अंतिम ज्योति—मेसी—के साथ मैदान में उतरा था, जबकि स्पेन पूरी तरह संस्थागत फुटबॉल का प्रतिनिधि था।अंततः संस्था ने करिश्मे को पराजित किया।
पूरी दुनिया इस फ़ाइनल को मेसी की अंतिम महागाथा के रूप में देख रही थी। मानो इतिहास पहले ही अपना निष्कर्ष लिख चुका हो और अब मैदान केवल उसकी औपचारिक पुष्टि करने वाला हो। किंतु इतिहास का स्वभाव मनुष्य की कल्पनाओं के अनुसार चलना नहीं है। जर्मन दार्शनिक हेगेल ने इतिहास को "समय की चतुराई" (Cunning of Time) कहा था। उनका आशय था कि इतिहास अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्यों का उपयोग करता है, पर उन्हें कभी यह नहीं बताता कि वे वास्तव में किस भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। मेसी की जगह इतिहास ने एक अन्य कथा चुनी—वह जिसमें अर्जेंटीना का सबसे स्मरणीय पात्र वह खिलाड़ी बन गया जो गोल करने नहीं, गोल रोकने के लिए मैदान में उतरा था। और उसी के एक बार इस बचाव कार्य में सफल न होने ने मैच का फैसला कर दिया।
किसने सोचा था कि जब अंतिम और सबसे निर्णायक परीक्षण का क्षण आएगा तो अर्जेंटीना का हीरो मेसी नहीं, मार्तिनेज होगा। जो गोल खायेगा, वही असाधारण प्रदर्शन का जादूगर सिद्ध होगा। कभी-कभी सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी भी हारने वाली टीम में होता है। यदि वह नहीं होता तो अर्जेंटीना की वही हालत होनी थी जो तीसरे स्थान के लिए खेलते इंग्लैंड ने फ्रांस की करके रख दी। सिर्फ एक फर्क के साथ। अर्जेंटीना तब भी फ्रांस की तरह चार गोल भी नहीं किया होता।
मार्तिनेज ने आज जितने गोल होने से बचाए, वे स्पेनी गोलकीपर के पूरे टूर्नामेंट में बचाए गोलों से भी लगभग दुगुने थे। मार्तिनेज के बारे में सोचते हुए मुझे अल्बेयर कामू का स्मरण हो आया। कामू केवल दार्शनिक नहीं थे; वे स्वयं गोलकीपर रहे थे। उन्होंने एक बार कहा था कि नैतिकता के बारे में जो कुछ भी उन्होंने सीखा, उसका बहुत-सा ज्ञान फुटबॉल से मिला। इस कथन की वास्तविक गहराई गोलकीपर के अनुभव में निहित है। मैदान का प्रत्येक खिलाड़ी गलती कर सकता है; उसकी भूल को कोई साथी सुधार सकता है। किंतु गोलकीपर की भूल प्रायः अंतिम होती है। उसके पीछे केवल जाल होता है। यही कारण है कि गोलकीपर खेल का सबसे अकेला मनुष्य होता है। वह निरंतर उपस्थित रहता है, पर तब तक अदृश्य रहता है जब तक कोई संकट उत्पन्न न हो। उसका जीवन अस्तित्ववादी दर्शन का जीवंत रूप है—संपूर्ण उत्तरदायित्व, न्यूनतम प्रशंसा और एक क्षण की भूल का अनंत दंड।
महान खिलाड़ियों की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं होती कि वे हार जाते हैं।त्रासदी तब होती है जब खेल स्वयं उनके इर्द-गिर्द घूमना बंद कर देता है। इस फ़ाइनल में मेसी को स्पेन ने लगभग सम्पूर्ण रूप से निष्प्रभावी कर दिया। अर्जेंटीना नियमित समय में एक भी शॉट दर्ज नहीं कर सका। यह केवल सामरिक सफलता नहीं थी। यह आधुनिक फुटबॉल की घोषणा थी कि अब सामूहिक प्रोसेसिंग किसी भी व्यक्तिगत प्रतिभा को सीमित कर सकती है। इतिहास अक्सर उन्हीं लोगों के माध्यम से लिखा जाता है जिनकी सबसे कम अपेक्षा होती है। 106वें मिनट में फेरान टोरेस का गोल केवल एक गोल नहीं था। वह इस सत्य का प्रतीक था कि इतिहास किसी एक महापुरुष की निजी सम्पत्ति नहीं।
अर्जेंटीना ने सदैव महान व्यक्तिगत प्रतिभाएँ उत्पन्न कीं।स्पेन ने उत्कृष्ट फुटबॉल पारिस्थितिकी (ecosystem) विकसित की।
अर्थशास्त्र में इसे "Institutional Capital" कहा जाता है। स्पेन ने पिछले तीन दशकों में फुटबॉल को केवल खेल नहीं माना। उसने उसे शिक्षा, विज्ञान, शरीर-विज्ञान, आँकड़ा-विश्लेषण, मनोविज्ञान और स्थानीय समुदायों के साथ जोड़ा। स्पेन के छोटे-छोटे नगरों में स्थित क्लब केवल प्रतियोगिताएँ नहीं खेलते; वे बच्चों के व्यक्तित्व, निर्णय क्षमता, सामूहिक अनुशासन और तकनीकी कौशल का निर्माण करते हैं। इसीलिए जब कोई युवा खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम तक पहुँचता है, तब वह केवल व्यक्तिगत प्रतिभा लेकर नहीं आता; वह उस समूची संस्थागत संस्कृति का प्रतिनिधि बनकर आता है जिसने उसे बचपन से गढ़ा है।
अर्जेंटीना की कहानी भिन्न है। उसका फुटबॉल विपन्नता के बीच खिली प्रतिभा का इतिहास रहा है। वहाँ की गलियों, श्रमिक बस्तियों और साधारण परिवारों से निकले खिलाड़ियों ने विश्व फुटबॉल को अनेक महान कलाकार दिए हैं। यह संयोग नहीं कि माराडोना और मेसी दोनों अपेक्षाकृत साधारण सामाजिक पृष्ठभूमि से उभरे। अर्जेंटीना की फुटबॉल संस्कृति व्यक्ति की रचनात्मकता, सहज कौशल और परिस्थितियों से संघर्ष करने की क्षमता पर अधिक आधारित रही है। यही कारण है कि अर्जेंटीना के खेल में एक प्रकार की स्वाभाविकता और कलात्मकता दिखाई देती है, जबकि स्पेन के खेल में संरचना, लय और सामूहिक संतुलन अधिक स्पष्ट होता है। दोनों ही उत्कृष्ट हैं, पर उनकी उत्कृष्टता का स्रोत अलग-अलग है।
लियो टॉलस्टॉय ने War and Peace में महान व्यक्तियों के सिद्धान्त का तीखा विरोध करते हुए लिखा था कि इतिहास केवल किसी एक व्यक्ति की इच्छाशक्ति का परिणाम नहीं होता; वह असंख्य छोटे-छोटे निर्णयों, संयोगों और परिस्थितियों का समुच्चय होता है। यदि इस विचार को विश्वकप फ़ाइनल पर लागू किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि फुटबॉल भी उसी प्रकार का ऐतिहासिक क्षेत्र है जहाँ किसी एक प्रतिभा की महानता पर्याप्त नहीं होती। जोसेफ़ कैम्पबेल ने नायक की यात्रा (Hero's Journey) का जो सिद्धान्त दिया, उसमें अंतिम चरण केवल विजय नहीं है; अंतिम चरण है—अनुभव का हस्तांतरण। प्रत्येक महान नायक अंततः अपने युग को अगली पीढ़ी के हाथों सौंपता है। यदि इस दृष्टि से देखा जाए, तो मेसी की अंतिम विश्वकप यात्रा हार की कथा नहीं, बल्कि उत्तराधिकार की कथा है। यह विरसा यमाल ने सँभाला या किसी और ने?
आज का दिन एक औसत दर्शक-प्रशंसक के दिल और दिमाग के द्वंद्व का दिन था। दिल कह रहा था अर्जेंटीना जीते। दिमाग कह रहा था स्पेन जीतेगा।
और दिमाग की विजय दिल पर लेने जैसी हो गई है।
(लेखक मध्य प्रदेश के सेवा निवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)