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समय के साथ कदमताल न कर पाने से बिगड़ा याहू का हाल

वेराइजन याहू के इंटरनेट परिचालन और उसकी अचल संपत्ति को 4.8 अरब डॉलर में खरीदने के लिए तैयार हो गई। इस लेनदेन के बाद याहू के पास केवल अलीबाबा में किया गया निवेश ही रह जाएगा। वर्ष 2005 में उसने चीन की ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने के लिए एक अरब डॉलर की राशि खर्च की थी। वर्ष 2014 में अलीबाबा सूचीबद्ध हुई और याहू ने अपने शेयरों का बड़ा हिस्सा बेच दिया। फिर भी उसके पास 15 फीसदी शेयर मौजूद हैं। उनकी कीमत फिलहाल 31 अरब डॉलर के आसपास है। इसके अलावा कंपनी ने याहू जापान और कुछ पेटेंटों में निवेश कर रखा है जिसकी कुल राशि 10 अरब डॉलर के करीब हो सकती है।

वेराइजन ने जो राशि चुकाने की हामी भरी है वह 2000 के दशक में याहू के उच्चतम मूल्यांकन यानी 125 अरब डॉलर की तुलना में कुछ भी नहीं है। वर्ष 2008 में माइक्रोसॉफ्ट ने याहू को 45 अरब डॉलर में खरीदने की एकतरफा पेशकश दी थी। वह याहू का प्रबंधन और राशि चाहता था, इसलिए याहू ने पेशकश ठुकरा दी। कंपनी के निवेशक काफी नाराज हुए। तब से अब तक इंटरनेट क्षेत्र की यह दिग्गज कंपनी लगातार गिरावट की ओर बढ़ती गई। यह गंवाए गए अवसरों और बदलते वक्त के साथ कदमताल न कर पाने की दास्तान है।

अगर 1990 के दौर की बात करें तो उस वक्त याहू एक वेब पोर्टल था जहां खबरें छपती थीं, जिस पर ई-मेल की सुविधा थी और उसके जरिये चैट की जा सकती थी। एक पूरी पीढ़ी के लिए याहू इंटरनेट का पहला अनुभव लेकर आई। शुरुआत के लिए तो वह ठीक था लेकिन लोगों ने और ज्यादा की मांग शुरू कर दी। याहू के पास देने के लिए नया कुछ खास नहीं था। समय बीतता गया और अन्य कंपनियों ने याहू को पीछे छोडऩा शुरू कर दिया। वर्ष 2000 के दशक में डॉटकॉम का बुलबुला फूटने के बाद कंपनी के लिए अपने कारोबारी मॉडल में बदलाव लाना आवश्यक हो गया। निवेशकों को पता चल चुका था कि इंटरनेट जगत बदल रहा है और याहू उसके साथ कदमताल नहीं कर पा रही।

याहू का जलवा खत्म करने में गूगल की अहम भूमिका रही। एक वक्त था जब गूगल अपने सर्च इंजन को दमदार बनाने के लिए याहू की मदद लेती थी। लेकिन बहुत जल्दी उसने याहू को पीछे छोड़ दिया और वह दुनिया का सबसे बड़ा ब्रांड बन गई। एक बार अपना सर्च इंजन स्थापित करने के बाद गूगल ने जी-मेल सेवा शुरू की जो याहू मेल को टक्कर देने लगी। जल्दी ही जी-मेल भी बाजार पर छा गई। जब तक याहू गूगल की चुनौती को लेकर सजग हुई तब तक काफी देर हो चुकी थी।

यूट्यूब, जिसका बाद में गूगल ने अधिग्रहण कर लिया, उसने भी वीडियो बाजार में मौजूद संभावनाएं हमारे सामने उजागर कीं। विशेषज्ञ समाचार वेबसाइटों ने बेहतर फीड देनी शुरू की और इन सब बातों ने याहू की पहचान को ही संकट में डाल दिया। एक वक्त ऐसा आया कि लोगों को पता ही नहीं रह गया कि आखिर याहू है किसलिए? याहू थोड़ा-थोड़ा सब कुछ पेश कर रही थी। याहू ने कई मुख्य कार्याधिकारी बदले लेकिन कोई भी उसकी मूल समस्याओं को दूर नहीं कर सका। इससे कंपनी को लेकर लोगों की धारणा लगातार कमजोर होती गई। अन्य कंपनियों में मजबूत प्रबंधन था जो उनको उद्देश्यपूर्ण बनाए रखता था, वहीं याहू बिना कप्तान के चलने वाले जहाज की तरह नजर आने लगी। गूगल ने गूगल ग्लास और बिना चालक की कार जैसे भविष्य से जुड़े प्रयोग करने शुरू किए। इस बात ने उसे तकनीकी क्षेत्र की नवाचारी कंपनी होने की पहचान दी। वहीं याहू एक खास कालखंड में फंसी रही। प्रत्येक मुख्य कार्याधिकारी ने बदलाव की कोशिश की लेकिन कुछ खास नहीं हो सका।

याहू की सबसे बड़ी गलती यह थी कि उसने सोशल मीडिया पर दांव नहीं खेला। विज्ञापनदाता सोशल मीडिया को बहुत पसंद करते हैं क्योंकि वह लोगों के साथ जबरदस्त संपर्क कायम करता है। इसके बावजूद याहू ने इस पर ध्यान नहीं दिया। याहू के पास अपने सर्च और सोशल मीडिया क्षेत्र को विकसित करने का पर्याप्त अवसर था लेकिन उसने इन अवसरों को गंवा दिया। इनको कारोबारी जगत की सबसे बड़ी गलतियों के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए। वर्ष 2000 में याहू ने गूगल के प्रवर्तकों लैरी पेज और सर्जेई ब्रिन से एक अरब डॉलर में उसे खरीदने की बात की थी लेकिन सौदा नहीं हो सका। वर्ष 2004 में याहू ने मार्क जुकरबर्ग से एक अरब डॉलर में उनके सोशल मीडिया उद्यम फेसबुक को खरीदने की चर्चा की थी लेकिन इस बार भी चर्चा विफल रही। ये दोनों निवेश अगर सफल होते तो याहू अपने प्रतिद्वंद्वियों से मीलों आगे होती।

याहू की दास्तान काफी हद तक भारतीय कारोबारी परिवारों की तरह है जो समय के साथ बदलने में नाकाम रहे और गुमनामी में खो गए। दोनों ही मामलों में आश्वस्ति का भाव नाकामी की वजह रहा। अहम सवाल यह है कि दूरसंचार कंपनी वेराइजन याहू को खरीदकर क्या करेगी? माना यही जा रहा है कि कंपनी द हफिंगटन पोस्ट, टेक क्रंच और इनगैजेट आदि की तरह याहू की सामग्री को भी अपने उपभोक्ताओं को देगी। इनमें से शेष का अधिग्रहण कंपनी ने गत वर्ष एओएल के साथ सौदे में किया था। परंतु वेराइजन को याहू में और अधिक सुधारों पर भी विचार करना होगा। अन्यथा वह कोई खास असर छोडऩे में नाकाम रहेगी। दुर्भाग्यवश इंटरनेट जगत में माफी की कोई गुंजाइश नहीं। अतीत की कोई अहमियत नहीं है। उपभोक्ता बोरियत का भाव आते ही वेबसाइट बंद कर देता है। इसमें पलक झपकने जितना वक्त भी नहीं लगता।

साभार- http://hindi.business-standard.com/से

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