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लोकनाट्य शैली ढाईकड़ी को इतिहास के पन्नों से नई पीढ़ी तक लाने वाले योगेश ‘यथार्थ’

हाड़ोती क्षेत्र में विभिन्न लोक कलाएं यहां के जनमानस में रची बसी हैं। अनेक कलाएं आधुनिक मनोरंजन माध्यमों के बीच दम तोड़ रही हैं और जैसे तैसे अपना अस्तित्व बचाए हैं।ऐसी ही लोक कलाओं में एक है पाटुंदा की लोक नाट्य कला जिसे ” ढाई कड़ी ‘ कहा जाता है। बात 1980 के दशक की है जब मुझे अंचल के विख्यात कवि और लोक कला मर्मज्ञ स्व. प्रेम जी प्रेम ने ” पाटुंदा की ढाई कड़ी की रामलीला” के बारे में बताया था।

इस लोक नाट्य की यादें ताजा हो गई जब रविवार 20 नवंबर 2022 को कोटा के एक साहित्यिक समारोह में बारां जिले की अंता तहसील के गांव सरकन्या के निवासी साहित्यकार और अध्यापक योगेश ‘ यथार्थ ‘ से अचानक मुलाकात हो गई। हम एक -दूसरे से अपरिचित थे। बातों – बातों में पता चला कि उनके परिजन इस लोक नाट्य कला के पात्र रहे हैं और उन्होंने स्वयं मंच संचालन का भार संभालते हुए बचपन से ही इस लोक कला को जिया, देखा और समझा है। कहते है जब हम छोटे थे कई गांवों में अनेक ऐसे दल होते थे जो इसका प्रदर्शन कर लोगों का मनोरंजन करते थे। वर्तमान में यह लोक कला सिमट कर लुप्त होने के कगार पर है।

योगेश लोक नाट्य के बारे में बताते हैं हाडौती भाषा में गोपीचंद भरथरी, भक्त प्रहलाद, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ,राजा मोरध्वज, रुक्मणी मंगल, नरसी जी को मायरो, रामलीला और कृष्ण लीला रासलीला से जुड़े हुए अनेक लोक नाटक शामिल हैं। भक्ति के भाव और सत्य की महिमा से प्रभावित होकर लोक रंजन के लिए हमारे मनस्वी विद्वानों ने इस प्रकार के अनेकानेक लोक नाटकों का सृजन किया है। इन नाटकों का कथानक धार्मिक और पौराणिक ही था ।

ढाई कड़ी को भण्डारों में कोठों में ,खेतों में छुप करके रसिकों, संस्कृति प्रेमियों ने चुपके-चुपके इन लोक नाटकों को लिखा और लोक में पहुंचाया। इस वजह से इनकी लोक धुनें भी बदल गई और अधिकाधिक संवाद भी बदल गए। लेकिन इनका प्रचार और प्रसार नहीं रुका। इनका मंचन होता रहा। ये लोकनाटक जनमानस में लोकप्रिय बने रहे।

ढाई कड़ी काव्यगीत है, काव्यात्मक संवाद है ,काव्यात्मक लोक नाटक है। लोक नाटकों की अनूठी और अनुपम लोक विधा है। अपने पूर्वजों की अद्वितीय खोज व लोकभाषा की अनुपम विरासत है। इसके प्रस्तुतीकरण और संवादों के गाने का तरीका बहुत ही आनंददायी और मजेदार है। जैसे गीत में मुखड़ा होता है वैसे ही तान इस ढाई- कड़ी छंद का मुखड़ा है। दोहा और उतार इसके अंतरे हैं। अंतरे का मुख्य भाग ढोहा और आखिरी भाग उतार होता है। बिछात में बैठे हुए संगीत वादक और साथी गायक अभिनेता का संवाद गायन में साथ देते हैं। ढोहा का आखिरी भाग दोहराया जाता है और उतार के बाद पूरी तान दोहराई जाती है। इस अंतराल में कलाकार अभिनेता को अभिनय करने और आगे के संवाद को सुनने का मौका मिल जाता है। हारमोनियम, तबला और मझिरा प्रमुख वाद्य उपयोग में लाए जाते हैं।

उदाहरण स्वरूप- देवराज इन्द्र अर नारद मुनि को संवाद देखिए –
” इन्द्र -(तान) नारद मुनि कित सूं बिचरता आया।
प्रथी की काँईं खबर्या लाया।।
नारद(तान)नमो करुँ सुरकंदर का राई।
परगट गयो भूप अवधपुर माँईं।
इंद्र (ढोहा) उचरो ब्रह्म को नाँव नारद जी,
कित सूं बिचरता आया।
भाग म्हारा जे दरसण पाया।।
(उतार) -जा’र दूसरा लोक मं सजी,
काँई खबर्या लाया।।
इस प्रकार आगे बढ़ता हुए ढाई कड़ी का गायन आगे चलता है।

करवाड़ पीपल्दा से लेकर घाटोली तक ढाईकडी़ लोकनाटकों का मंचन होता रहा है। ढाईकडी़ राम लीला के प्रणेता श्री गोविंद राम जी भट्ट को “करसो खेत खलांण” के संस्थापक श्री जगदीश जी’ भारती’ द्वारा ‘श्री धन्नालाल मेघवाल कृषक साहित्य सम्मान’ प्रदान किया है। कविवर रूप जी ‘रूप’ ने बताया है कि उनके पिताजी और गांव के सह- कलाकार घाटोली गाँव में ढाई कड़ी विधा में राजा हरिश्चंद्र का नाटक मंचित किया करते थे। अर्थात संपूर्ण हाडोती परिक्षेत्र में ढाई कड़ी लोक छंद की विधा में अनेक लोक नाटक मंचित होते थे। वर्तमान में मांगरोल पाटुंदा,मडावरा और करवाड़, पीपल्दा और सरकन्या में इस विधा के सक्रिय मंच हैं। बीसों गांव के नाम तो मुझे पता है ,जहां पर ढाई कड़ी विधा में रामलीला होती थी। आकाशवाणी से कवि व्यंग्यकार श्री नेमीचंद जी मालव और श्री विश्वामित्र जी दाधीच के द्वारा गाए हुए रामलीला के कुछ लोकसंवाद प्रसारित होते थे तब लोग इनको बहुत ही ध्यान से सुनते थे।लोग इन संवादों की फरमाइश करते थे। एकत्र होकर के सुना करते थे।

ग्राम पाटुंदा की ढाई कड़ी की रामलीला की ख्याति तो राष्ट्रीय स्तर पर है, जिसका मंचन चित्रकूट, अयोध्या और कोटा दशहरे में किया जा चुका है। तत्कालीन समय में इन लोक नाटकों को राज दरबार का संरक्षण प्राप्त था। यही वजह है कि आज भी पाटोंदा ग्राम में रामलीला के नाम पर बावन बीघा खेत वसीयत रूप में है। जो इस राम लीला के खर्चे और अन्य संबधित खर्च के रूप में काम आता है। एक बार कोटा दरबार मांगरोल(रामगढ़) के लिए प्रस्थान कर रहे थे। तो उनका काफिला ग्राम सरकन्या में रुका और इस गांव में इन्होंने राजा हरिश्चंद्र और राजा मोरध्वज के ढाई कडी़ के नाटकों का मंचन देखा ,देख कर के वह इतने प्रभावित हुए कि यहां पर भी इसी प्रकार की वसीयत देने का प्रस्ताव गांव वालों के सामने रखा। लेकिन गांव वालों के सामने एक और दूसरी समस्या थी वह थी गांव के बीचो-बीच खाड़ी पर पुल बनवाने की । गांव वालों ने पुल बनवाने का प्रस्ताव राज दरबार के सामने रखा। राज दरबार ने सहर्ष इस खाड़ी पर पुलिया का निर्माण करवाया। जो आज भी वैसे की वैसी अवस्था में मौजूद है और इसी पुलिया पर से आज भी आवागमन सुगम है।
लोक संस्कृति के अनुरागी योगेश ने अपने गांव सरकन्या में “करसो खेत खलांण, ग्रामीण साहित्य एवं संस्कृति संवर्द्धन समिति ढोटी, शाखा” का गठन किया है। इसके माध्यम से लुप्त होती लोक कला के तथ्य संकलन में लगे हैं।

परिचय
योगेश शर्मा का जन्म 16 मार्च सन् 1974
ग्राम सरकन्या, जिला बारां में हुआ। आपने
एम.ए. (हिंदी और शिक्षा) शिक्षा- शास्त्री (बी.एड.) तक शिक्षा प्राप्त की।आप विद्याश्रम पब्लिक स्कूल कोटा में व्याख्याता है।
साहित्य – आप हाड़ोती के प्रसिद्ध कवि, नात्यकार और साहित्यकार हैं। आपने पठारी, दो बाल्टियाँ, ढाई-कड़ी, वाल्मीकि पुस्तकों का प्रकाशन कराया ही और आपका कविता संग्रह, बालनाटक संग्रह-रूपक रत्नाकर प्रकाशनाधीन है। आप विभिन्न साहितिक संथाओं से जुड़े हैं और कई सम्मेलनों में पत्र वाचन किया है।
पुरस्कार – आपको विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, कोटा द्वारा संभागीय स्तर पर नाट्यलेखन एवं निर्देशन में प्रथम पुरस्कार से तथा जोधपुर में राज्य स्तरीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।* अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास,नई दिल्ली द्वारा कहानी लेखन एवं नाट्य लेखन में राष्ट्र स्तरीय सम्मान से सम्मानित किया गया।.* कोटा सहोदय स्कूल कॉम्पलेक्स द्वारा श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान। * श्री कर्मयोगी सेवा संस्था द्वारा कवि के रूप में आपको ” शान – ए – राजस्थान” पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
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डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
कला,संस्कृति, पर्यटन लेखक
1-एफ -18, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, कुन्हाड़ी
कोटा -राजस्थान ( संपर्क ; 9928076040)

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