ताजा सामाचार

आप यहाँ है :

युगदृष्टा डॉ. आंबेडकर – समरसता के शिल्पकार

समाज को समरसता के सूत्र में पिरोकर उसे संगठित और सशक्त बनाने वाले महानायकों में एक हैं डॉ. भीमराव आंबेडकर। भारत के संविधान को बनाने, गढ़ने वाले डॉ. आंबेडकर यानि वह विभूति जो आने वाले युग की झलक भांपकर देश को उसके अनुसार बढ़ने की प्रेरणा देती रही. ऐसे प्रखर राष्ट्रभक्त, युगदृष्टा के 130वें जयंती वर्ष पर उन्हें व उनके चिंतन को जिसमें भावनात्मक एकता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय भरा पड़ा है उसे स्मरण करने का आज दिन है. डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सिर्फ भारत के संविधान की रचना में ही प्रमुख भूमिका नहीं निभाई, बल्कि उन्होंने अपनी विद्वता की छाप समाज जीवन के हर क्षेत्र पर छोड़ी। वंचित और पिछड़े वर्गों को शेष समाज में सम्मानित स्थान दिलाने के लिए उनके द्वारा किया गया संघर्ष अविस्मरणीय है. समरसता के सूत्रधार के रूप में बाबासाहेब जन – जन के पूज्य है.

समाज में अधिकतर लोग डॉ आंबेडकर को केवल भारत के सविंधान निर्माता के रूप में जानते हैं , और कुछ लोग उन्हें एक दलित नेता के रूप में , परन्तु यह पूरा परिचय नहीं है , ये तो अंश मात्र है वास्तव में वे एक लोकप्रिय भारतीय विधिवेत्ता, राजनीतिज्ञ, चिंतक, विचारक, समाज सुधारक, अर्थशास्त्री, मानवविज्ञानिक, दर्शनशास्त्री, धार्मिक, प्रतिभाशाली एवं जुझारू लेखक और राष्ट्रभक्त थे। उन्होंने अछूतों (दलितों) के खिलाफ सामाजिक भेद भाव के विरुद्ध अभियान चलाया। श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री, भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार एवं भारत गणराज्य के निर्माताओं में से एक थे। डॉ आंबेडकर आधुनिक भारत के मनु कहे जा सकते हैं और आधुनिक भारत की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान था । डॉ आंबेडकर जी को ‘समानता का प्रतीक’ कहा जाता है। उदार, उदात्त, खुली सम्पदनशील, धार्मिक व् सामाजिक हिन्दू व्यवस्था में अस्पृश्यता, बाल-विवाह, विधवाओं पर लादे गए अमानवीय नियम, महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखना आदि दुष्ट प्रथाएं कैसे प्रवेश कर गई यह एक न बुझने वाली पहेली है।

मुस्लिम शासन और ब्रिटिश शासन के समय में अनेक कुरुतियाँ समाज में आई , लेकिन मध्ययुग में उदित भक्ति मार्ग के प्रसार से चारों तरफ से घिरे हिन्दू समाज को बड़ी सांत्वना मिली, राजनैतिक स्वाधीनता खोने के बाद भी धार्मिक स्वतंत्रता बनी रही। हिन्दू समाज के सभी वर्ग उसका एक हिस्सा है, जैसे सब अंग शरीर का हिस्सा होते हैं, यदि एक भाग को चोट लगती है तो पूरा शरीर दुखी होता है। डॉ अम्बेडकर की जयंती इस भूमंडलीकरण व सूचना क्रांति के युग में विश्व विभूति एवं ग्लोबल सिटिज़न के रूप में विश्व के विभिन्न देशों में मनाई जाती है। इस सूचना क्रांति के युग में दलित और बहुजन समाज अनेक वेबसाइट, मैगज़ीन आदि से डॉ आंबेडकर के व्यक्तित्व व् कृतित्व पर बहस चलाने लगे। डॉ साहब के वाङ्मय को डिजिटल रूप में अब बिना किसी मूल्य के प्राप्त किया जा सकता है। उनके अनेक भाषण यु-ट्यूब पर उपलब्ध हैं तथा दुनियाभर में कहीं भी सुगमता से उपलब्ध है। अब गैर दलित भी उनका जन्मदिवस पर कार्यकर्म करने लगे ये अच्छी बात है, उनके अनुयायी भी ये अपेक्षा करने लगे हैं कि समाज के दूसरे वर्ग भी अम्बेडकर जी को सम्मान दें। सामाजिक समरसता के लिए ये बहुत अच्छी बात है, वरना ऐशी स्थिति पैदा हो जाएगी कि जिस जाती में किसी महापुरुष का जन्म हुआ है, उसी जाती के लोग कार्यकर्म करेंगे। सम्पूर्ण भारतीय हिन्दू समाज समरस बने व राष्ट्र सुदृढ़ हो, यही डॉ आंबेडकर का लक्ष्य था।

जहाँ तक राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है तो डॉ साहब ने राष्ट्र की नींव में सभी सामाजिक समूहों के अधिकार को सुनिश्चित किया। उनका विशेष जोर भारतीय महिलाओं एवं पिछड़े वर्गों के अधिकारों पर था। वे कहते थे की हमें राजनितिक प्रजातंत्र के साथ – साथ आर्थिक और सामाजिक प्रजातंत्र को मजबूत करना होगा। उन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए सांस्कृतिक विरासत को भी महत्वपूर्ण बताया और सभी समूहों को अपने भूत के संघर्ष व वैमनस्य को भुलाने की सलाह दी। उन्होंने स्वयं को भी शिक्षित व तरक्की के लिए प्रेरित करने का कहा है। 1951 में कानून मंत्री रहते हुए उन्होंने त्यागपत्र दलित के सवाल पर नहीं, बल्कि महिला को सम्पत्ति में अधिकार के मुद्दे पर दिया था। सामाजिक न्याय की ताकतें जब अपने अधिकार की बात करती है तो वह भी शुद्ध राष्ट्रवाद है। इससे देश की एकता व अखंडता कहीं ज्यादा सुढृढ़ होती है। राष्ट्रवाद में हजारो वर्ष पुरानी जाती-व्यवस्था, छुआछूत, भेदभाव और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का कोई स्थान नहीं चाहिए। उनके जीवन का उद्देश्य इन सब विशिष्टों सहित एक लोकतान्त्रिक गणराज्य का निर्माण करना था। जनतंत्र और आरक्षण के कारण देश के लगभग सभी वर्गों की काम या ज्यादा भागीदारी शासन – प्रशासन में सुनिश्चित हुई। अब देश की आजादी सभी वर्गों का सरोकार है और ऐसे देश को कोई गुलाम बनाने की बात भी नहीं सोच सकता। उन्होंने भारत को सामाजिक राष्ट्रवाद दिया और सभी को इस भावना से जोड़ा भी है।

जातिवाद व साम्प्रदायिकता, राष्ट्रीय एकता में बड़े बाधक है, इसी प्रकार प्रांतीयता व भाषायी की भावना भी एक अवरोध है। आर्थिक असमानता विशेषकर निर्धनता और राष्ट्रीय संस्कृति के प्रति उदासीनता राष्ट्रीयता को कायम करने और देश के नागरिकों में राष्ट्र प्रेम जगाने, उनमे परस्पर एकता, सामाजिक समरसता, संगठन और सन्निकटा की भावना का विकास निरंतर बनाए रखने के लिए बहुत आवश्यक है। राष्ट्रीय एकता एक ऐसी भावना है जो सभी लोगो में मानसिक व व्यवहारिक स्थिति है जिसमे वे अपने विचार, विश्वास व मान्यताओं से जोड़ते है और राष्ट्र के प्रति निष्ठा रखते हुए राष्ट्र कल्याण व राष्ट्र की सुरक्षा के लिए कार्य करते हैं। राष्ट्रीयता और परस्पर भाईचारे की भावना सभी प्रकार की विभिन्नतों जैसे कि धार्मिक, वैयक्तित्व , स्थानीय , जातीय,भाषा सम्बंधों का विस्मरण एवं बहिष्कार करने में सहायक होती है।

पहले वे भी अन्य उदारवादी कांग्रेस नेताओं की तरह ये मानते थे कि ब्रिटिश शासन भारत के लिए लाभप्रद रहा। वे ब्रिटिश शासन को ऐसी शक्ति मानते थे जिससे भारत को पुरानी परम्पराओं और रूढ़िवादी सोच से बाहर निकलने में मदद मिलेगी। ब्रिटिश शासन ने भारत में एक केन्द्रीय सरकार प्रदान की और विभिन्न धर्मों के लोगों को एक सरकार का हिस्सा बनाया है। आंबेडकर के अनुसार राष्ट्रवाद एक राष्ट्र में रहने वालों की सक्रीय अनुभूति है, राष्ट्रवाद निश्चित भूमि होना और एक सांस्कृतिक मातृभूमि होना अनिवार्य है , जिस पर राष्ट्र का निर्माण को सके। उनके अनुसार राष्ट्रवाद एक राजनैतिक हित कम और सामाजिक हित अधिक था। उन्होंने कांग्रेस व ब्रिटिश शासन के विरोध की जगह उनके साथ सहयोग की कार्यशैली अपनाई , जिससे वे दलित – वंचित और निर्धन भाई – बंधुओं के अधिकारों और उनके उत्थान को निश्चित कर सके। डॉ अम्बेडकर का राष्ट्रवाद सामाजिक और आर्थिक न्याय के मूल सिध्दान्त पर आधारित था।

आंबेडकर की सामाजिक-राजनीतिक सुधारक के रूप में विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा असर हुआ है। स्वतंत्रता के बाद भारत में, उनके सामाजिक-राजनैतिक विचारों को पूरे राजनीतिक स्पेक्ट्रम में सम्मानित किया जाता है। उनकी पहल ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित किया है और आज जिस तरह से भारत सामाजिक, आर्थिक नीतियों और कानूनी प्रोत्साहनों के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक नीतियों, शिक्षा और सकारात्मक कार्रवाई में दिख रहा है, उसे बदल दिया है। आंबेडकर के अनुसार समता स्थापित करने के लिए स्वतंत्रता और बंधुत्व को बलि चढ़ा देना कदापि उचित है. यदि स्वतंत्रता और बंधुत्व ही न रहे तो ऐसी समता निर्थक हो जाएगी। आधुनिक लोकतंत्र का उद्देश्य लोगों का कल्याण है. वो कहा करते थे की एक आदर्श समाज वह होता है जो गतिशील और परिवर्तनशील हो. समाज में कई हितों का संचार साथ – साथ होना और उन्हें आपस में बांटा जाना चाहिए। सामाजिक अंतराभिसार होना चाहिए। बंधुभाव ही लोकतंत्र का दूसरा नाम है.

उनका कहना था कि अनुसूचित जाति और जनजातियों की समस्या संवैधानिक तरीके से सुलझाई जाए. बाबासाहेब ने मूर्त रूप में राष्ट्र -राज्य की अवधारणा रखी. बाबासाहेब हमारे सामने सामाजिक न्याय पर आधारित संविधानमूलक लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद की संकल्पना रखते हैं. समरसता के शिल्पकार युगदृष्टा डॉ. आंबेडकर का यह योगदान अलौकिक है.

( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक है)

मोबाइल :- 8269547207
मेल :- mann.malik82 @gmail.com
Dr. Pawan Singh Malik (8269547207)
Assistant Professor (New Media Technology Dept.)
Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism & Communication
Bhopal(M.P)

image_pdfimage_print


सम्बंधित लेख
 

Back to Top