Tuesday, March 5, 2024
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हनुमान के 12 नामों पर एक अद्भुत अध्यात्मिक संध्या

मुंबई के श्री विनोद देवड़ा और अरुण टिबड़ेवाल व श्री जयकुमार शर्मा 13 परिवारों के साथ मिलकर विगत 48 वर्षों से प्रतिवर्ष एक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं, जो लीक से हटकर होता है। इस बार ये आयोजन हनुमानजी के 12 नामों पर आयोजित किया गया जिसमें श्री वीरेन्द्र याज्ञिक ने हनुमान के 12 नामों पर चर्चा करते हुए उनके गहरे अध्यात्मिक निहितार्थ की सुंदर विवेचना की। हनुमान के व्यक्तित्व के इतने विस्तृत आयामों को जानना उपस्थित श्रध्दालुओं के लिए एक विलक्षण अनुभव था।

श्री वीरेन्द्र याज्ञिक को सुनना अपने आप में एक अद्भुत, अलौकिक, रोमांचक और अप्रतिम अनुभव होता है। मुंबई में होने वाले किसी भी धार्मिक या अध्यात्मिक अनुष्ठान में श्री वीरेन्द्र याज्ञिक की उपस्थिति उस आयोजन को एक नई ऊँचाई प्रदान कर देती है।

चुंबकीय आकर्षण और पारसमणि सा स्पर्श है श्री वीरेन्द्र याज्ञिक के व्यक्तित्व में

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अपनी बात प्रारंभ करते हुए याज्ञिकजी ने कहा, कि हनुमान के 12 नामों का उल्लेख आनंद रामायण में मिलता है। हमारे देश में और दुनिया में 129 तरह की रामायण प्रचलित है। आनंद रामायण की रचना महात्मा श्रृंगेरी ने की थी। इस रामायण में हनुमान के बारह नामों का उल्लेख है। ये बारह नाम हैं- ॐ हनुमान, अंजनीसुत, वायुपुत्र, महाबल, रामेष्ट, फाल्गुण सखा, पिंगाक्ष, अमित विक्रम, उदधिक्रमण, सीता शोक विनाशन, लक्ष्मण प्राणदाता और दशग्रीव दर्पहा।

याज्ञिक जी ने बताया कि हनुमान नाम देवराज इन्द्र ने दिया था। अपने बालपन में जब हनुमान जी सूर्य को निगलने के लिए जा रहे थे तो इन्द्र ने उन पर वज्र प्रहार किया था। इस वज्र प्रहार से उनकी ठोड़ी टेढ़ी हो गई थी, ठोड़ी को संस्कृत में हनु कहते हैं, इस तरह हनु पर चोट या मान लगने की वजह से उनका नाम हनुमान कर दिया गया।

इन्द्र तत्व कर्म का प्रतीक है।

हनुमान नाम के चार अक्षरों की विशद् व्याख्या करते हुए याज्ञिक जी ने कहा कि जीवन चार बातें महत्त्वपूर्ण हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। हनुमान नाम के चार अक्षर इनका ही प्रतिनिधित्व करते हैं। संस्कृत व्याकरण के अनुसार ह धातु – धर्म का प्रतीक है. नु- अर्थ का प्रतीक है, मा- काम का प्रतीक है। न मोक्ष का प्रतीक है। यदि गहराई से सोचें तो हनुमान अभिमान से मुक्त होने का प्रतीक है। हनुमान जिसने मान का हनन कर लिया। उन्होंने हनुमान की अंग्रेजी स्पेलिंग HANUMAN से भी इसकी रोचक व्याख्या करते हुए कहा कि अंग्रेजी अक्षर एच- ह्यूमेनिटी और ऑनेस्टी यानी मानवीय संवेदना व सच्चाई का, यू अंडरस्टैंडिंग यानी समझ का, एम- मॉडेस्टी यानी विनम्रता का, ए- एटीट्यूड यानी सकारात्मकता और अथेंटिसिटी यानी विश्वसनीयता का और एन -ल नर्चर यानी बहुआयामी गुणों का प्रतिनिधित्व करता है।

श्री वीरेन्द्र याज्ञिक ने अपनी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अंजनी सूत नाम भगवान शंकर ने प्रदान किया. क्योंकि अंजनी उनकी माँ का नाम था और अंजनी का एक अर्थ दसों दिशाएँ होता है, हनुमान का जन्म पवन तत्व से अंजनी के माध्यम से हुआ इसलिए उनका नाम अंजनी सूत हो गया।

वायुपुत्र नाम ब्रह्माजी द्वारा दिया गया।

महाबल नाम जल के देवता वरुण ने प्रदान किया। इसका आशय यह है कि हनुमानजी सभी बलों के स्वामी हैं।

रामेष्ट नाम ऋषियों द्वारा प्रदान किया गया। यानी प्रभु श्री राम ही जिनके इष्ट हैं। एक कथा का उल्लेख करते हुए याज्ञिक जी ने बताया कि श्री रामचंद्र जी जब अयोध्या छोड़कर सरयू में समाहित होकर साकेत धाम की और जा रहे थे तो अयोध्या नगरी के सभी लोग उनके साथ चल दिए, लेकिन हनुमानजी सरयू के किनारे पर ही खड़े रह गए। रामजी ने हनुमानजी से पूछा कि आप मेरे साथ साकेत की यात्रा पर क्यों नहीं चल रहे हैं तो हनुमानजी ने उत्तर दिया कि साकेत में मुझे आप तो मिलेंगे लेकिन आपकी कथा सुनने को नहीं मिलेगी, इसलिए मैं पृथ्वी पर ही रहना चाहता हूँ ताकि आपकी कथा के श्रवण का लाभ लेता रहूँ।

हनुमान जी को फाल्गुन सखा नाम श्री कृष्ण ने प्रदान किया। अर्जुन का एक नाम फाल्गुन भी था। इसका भी एक रोचक वृत्तांत है। फाल्गुन यानी सबको आकर्षित करने वाला। अर्जुन का व्यक्तित्व सबको मोहित करता था और फाल्गुन मास में वसंत ऋतु आने की वजह से इसे सबसे सुंदर मास माना जाता है।

महाभारत के युध्द में अर्जुन के रथ पर फहरा रही पताका के साथ हनुमानजी भी बैठे थे। पहले जब युध्द समाप्त हुआ तो कृष्ण पहले रथ से उतर गए और फिर अर्जुन से कहा कि अब तुम उतरो। जबकि प्रतिदिन तो अर्जुन रथ से पहले उतरते थे और कृष्ण बाद में उतरते थे। जब अर्जुन ने इस रहस्य को लेकर कृष्ण के सामने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की तो कृष्ण ने कहा कि तुम्हारे रथ की रक्षा ऊपर बैठे हनुमानजी कर रहे थे। अगर वो नहीं होते तो तुम्हारा रथ और तुम कभी के नष्ट हो चुके होते। इस तरह अर्जुन यानी फाल्गुन की रक्षा करने वाले हनुमानजी फाल्गुन सखा कहलाए।

पिंगाक्ष नाम हनुमान जी के पिता केसरी ने प्रदान किया । हनुमानजी की आँखें भूरी होने की वजह से उन्हें पिंग-अक्ष, यानी भूरी आँखों वाला नाम दिया गया।

हनुमानजी को अमित विक्रम नाम जामवंतजी ने दिया । इसका वृत्तांत सुंदर कांड में विस्तार से आता है।

सीताजी ने उन्हें सीता शोक विनाशन व उदधिक्रमण नाम प्रदान किया। उन्होंने सीता जी को रामजी का संदेश देकर शोक मुक्त किया और उसके लिए सौ योजन के समुद्र को पारकर पहुँचे थे।

लक्ष्मण प्राण दाता नाम अंगद ने प्रदान किया। दशग्रीव दर्पहा नाम कुबेर ने प्रदान किया। कुबेर रावण के महल में कैद था और प्रार्थना कर रहा था कि कोई उसे यहाँ से मुक्त करे, हनुमानजी की कृपा से कुबेर को मुक्ति मिली तो उसने प्रसन्न होकर उन्हें दशग्रीव दर्पहा यानी दशानन रावण के अभिमान को नष्ट करने वाला, नाम प्रदान किया।

याज्ञिक जी ने दशानन और दशरथ के नामों का भू सुंदर विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि दोनों के ही नाम के साथ दश शब्द जुड़ा है, लेकिन एक ने राम को जन्म दिया और दूसरा राम के हाथों मारा गया।

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