लोक में प्रचलित यह विश्वास कि मनुष्य पर जब भी कोई कष्ट आता है तो सबसे पहले वह मां का स्मरण करता है अरी मोरी मैया रे...। पैर में चाहे कांटे की चुभन  ही क्यों ना हो उई मां ....सहज ही हमारी जुबान पर  आ जाता है।यह प्रकृति की एक अद्भुत और सहज प्रवृत्ति है।ऐसा इसलिए कि माता अपने बच्चे की सुरक्षा और विकास के लिए हर संभव प्रयास करती है।
माता का प्रेम केवल मनुष्यों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पशु-पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं में भी मातृत्व का भाव देखने को मिलता है।
माता का प्रेम इतना गहरा होता है कि वह अपने बच्चे को संकट से बचाने के लिए स्वयं जोखिम उठाने को तैयार रहती है।  इस प्रकार मातृत्व का भाव केवल मनुष्य में ही नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत में दिखाई देता है।
मातृत्व प्रेम, ममता, त्याग और संरक्षण का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में इसी विचार को केंद्रित करते हुए जहां एक ओर मातृशक्ति के रूप में जगत जननी की आराधना  हर विपत्ति से रक्षा के लिए की जाती है वहीं जननी के प्रति  श्रद्धा ,सम्मान विकसित करने के लिए ऐसे  अनेक मूल्य   शास्त्रों में वर्णित हैं जिनसे अनुप्राणित होकर भारतीय संस्कृति सदैव मातृशक्ति  को महिमा मंडित करती रही है।
"मातृ  देवो भव...", अर्थात शास्त्रौं में   लिखा गया है कि माता  को देवों के समान मानो। साथ ही यह भी कहा गया है कि ",जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि  गरीयसी"अर्थात जननी यानि मां का स्थान  वस्तुत:स्वर्ग से भी ऊंचा है।  मां की श्रेष्ठता को वर्णित करते हुए शास्त्रों में यह भी लिखा गया है कि, "एक आचार्य गौरव में दस उपाध्याय से बढ़कर है एक पिता सौ आचार्य से उत्तम है एवं एक माता एक सहस्त्र पिताओं से श्रेष्ठ है।"महर्षि व्यास लिखते हैं "पितुरप्यधिका माता गर्भधारण पोषणात् ।
अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरुः ॥ "
अर्थात पुत्र के लिए माता का स्थान पिता से भी बढ़कर है क्योंकि वह उसे गर्भ में धारण करती है तथा माता के द्वारा  ही उसका पालन पोषण हुआ है अतः तीनों लोकों में माता के समान कोई दूसरा गुरु नहीं है। इस सबके अलावा   लोक  में यह भी प्रचलित है कि "पूत कपूत हुए हैं लेकिन माता नहीं कुमाता।" यानि पुत्र अपने आचरण से कैसा भी हो लेकिन मां कभी भी अहित नहीं  करती। वात्सल्य प्रेम से  सराबोर मां की सबसे बड़ी अभिलाषा यही रहती है कि उसकी संतान चिरायु हो ,निरोग हो, बल, बुद्धि ,विद्या, धन के साथ सर्वगुण संपन्न हो।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में “मातृदेवो भव” का अर्थ केवल मां की पूजा करना नहीं है, बल्कि उसके सम्मान, स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना भी है।
जब परिवार, समाज और राष्ट्र माता के प्रति वास्तविक सम्मान का व्यवहार करते हैं, तभी “मातृदेवो भव” केवल श्लोक नहीं रहता, बल्कि जीवन का धर्म बन जाता है। माता की सेवा, उसके प्रति कृतज्ञता और उसकी गरिमा की रक्षा ही भारतीय संस्कृति की सबसे मानवीय और स्थायी विरासत है।
पुनश्च ,माता जीवन की प्रथम गुरु, प्रथम शिक्षिका और प्रथम आश्रय है। वह संतान को केवल शरीर नहीं देती, बल्कि स्नेह, संस्कार, साहस, सहनशीलता और जीवन जीने की प्रेरणा भी देती है। उसका प्रेम बिना स्वार्थ, बिना शर्त और बिना थकान के निरंतर बहता रहता है।

मातृत्व में प्रकृति का सृजन, धर्म की करुणा और संस्कृति का संरक्षण—तीनों एक साथ दिखाई देते हैं। इसीलिए भारतीय चिंतन ने माता को देवतुल्य कहा है। जो व्यक्ति अपनी माता के चरणों में श्रद्धा रखता है, वह जीवन के प्रति कृतज्ञता, परोपकार और मानवीय संवेदनशीलता को भी ग्रहण करता है।

अतः “मातृदेवो भव” केवल एक धार्मिक आदेश नहीं, बल्कि मानव-जीवन का एक आदर्श है। माता का सम्मान करना, उसकी सेवा करना, उसकी पीड़ा समझना और उसकी गरिमा बनाए रखना ही उस शाश्वत सत्य का साक्षात पालन है कि—“माता का स्थान संसार में सर्वोपरि है, और उसका प्रेम स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है।”
डॉ. माधवी लता दुबे
प्राध्यापक समाजशास्त्र
शासकीय हमीदिया महाविद्यालय भोपाल

विश्व संवाद केंद्र, भोपाल 

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