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सामाजिक परिवेश और मानवीय संवेदनाओं के प्रखर साहित्यकार अम्बिका दत्त

“मेरे सामने मरने की बात मत करो
पृथ्वी संकट में है और मनुष्य मुसीबत में है
 यही बातें मुझे डराती हैं
मेरे सामने इस तरह की बातें मत करो।”
अपनी कृति ” आवों में बारहमास -पेज15 पर लिखी यह कविता बताती है की साहित्यकार अंबिका दत्त चतुर्वेदी सामाजिक परिवेश और मानवीय संवेदनाओं के प्रखर साहित्यकार हैं।
उदीयमान लेखको को संदेश देते हैं खूब पढ़ें। घूमें फिरें । अनुभव समृद्ध हों । परिश्रमी, खुशमिजाज और सौजन्यशील रहेंगे तो सदैव फायदे में रहेंगे। अनुगमन और अनुभव के बीच स्वतंत्र विवेक का संतुलन। राजस्थान के विख्यात और हाड़ोती के साहित्यकार अंबिका दत्त चतुर्वेदी कहते हैं यदि लेखक चाहते हैं कि कोई उनका लिखा हुआ पढे तो उन्हें समझना होगा कि वे ऐसा लिखें जो कम से कम पठनीय अवश्य हो।

अंबिका जी बताते हैं लेखन, लेखक के अंतर्मन में जमे हुए संस्कार और बाह्य परिवेश के द्वन्द का परिणाम है। वे चिंता जताते हैं कि आजकल लेखकों द्वारा काफ़ी कुछ लिखा जा रहा है किन्तु पाठक उतना प्रभावित नहीं हो पा रहा ही। कोई समय था जब कला ,रचना के माध्यमों का संसार सीमित था। मनुष्य के सरोकार, सन्दर्भ और विषय कम थे। तब लिखा हुआ साहित्य लोगों के लिए अंतरंग और आत्मीय दायरे में हुआ करता था। यांत्रिकता के विस्तार से कला के ऊपरी आवरण ,संरचना का दायरा तो बढता है किन्तु रचना की गहनता और उसका आत्मीय प्रभाव कम होता जाता है। हम से पहले जो लेखक थे उनकी साधना और निष्ठा बहुत गहरी थी।

सामाजिक परिवेश और मानवीय संवेदनाओं पर शिद्दत से काव्य लिखने वाले अंबिका जी कहते हैं अधिकतर कविताओं की मूल संवेदना में वास्तविक जीवन की घटनाएं ही होती हैं । वास्तविक मनुष्य ,कल्पना और रचनात्मकता से भी कई बार हम उनका विकास करते हैं। वह बताते हैं रचना व्यक्ति (रचनाकार ) के व्यक्तिगत सोच ,क्षमता और उसके आस पास के परिवेश में घटित होन वाली क्रियाओं ,घटनाओं के द्वंद का परिणाम ही है । परिवेश में घटित होने वाली घटनाएं जो समकालीन ,तात्कालिक हों या स्मृति में बसी बरसों पुरानी। जब संवेदन ,संज्ञान का समन्वय होता है तो रचना प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। रुचियाँ ,वृत्तियाँ ,प्रवृत्तियाँ , विचार ,तथा परिवेश में घटित होने वाली घटनाएँ रचना प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। वर्तमान डिजिटल समय और साहित्य के संदर्भ में वह कहते हैं डिजिटल युग में शब्द ,साहित्य की यात्रा की गति तेज हुई है और उसके विस्तार का आकाश और अधिक विस्तृत हुआ है | यह शुभ ही है । अच्छे साहित्य का भविष्य तो सदैव उज्ज्वल ही होता है।

साहित्यकार और प्रशासनिक अधिकारी का मणिकांचन संयोग है कि बचपन से पैदा हुए साहित्यनुराग को निरंतर बनाए रखा और साहित्य सेवा में अहरनिष लगे हैं। काव्य रचना शुरू करने से पूर्व ही आपने अपने गांव के पुस्तकालय में देश -विदेश के नामचीन साहित्यकारों को पढ़ा और समझा। विषम पारिवारिक परिस्थितियों के रहे आपने अपनी पढ़ाई पूरी कर राजस्थान प्रशानिक सेवा में आए और कविता लिखने के शोक को आज तक जिंदा रखे हैं और नई पीढ़ी के प्रेरणा श्रोत बने हुए हैं। सन सोलह के बाद से आपने दैनिक डायरी का लेखन शुरू किया।

मेरा परिचय आपसे प्रशासनिक अधिकारी के रूप में था। एक दिन जनसंपर्क विभाग द्वारा प्रकाशित सुजस पत्रिका के लिए आपसे संपर्क कर आपकी एक कविता भेजने को कहा गया, उस दिन मुझे पता चला की आप कविता लिखते हैं और आपका साहित्यकार वाले रूप से परिचय हुआ। उनकी साहित्यिक उपलब्धियों पर चर्चा करने से पूर्व देखते हैं उनकी कुछ लघु रचनाएं। आदमी की पहचान के बारे में उन्होंने क्या खूब लिखा है ……..
पहचान 
कितने तो कागज और कितने दस्तावेज जीवित होने तक का सर्टिफिकेट !
इतने सारे सबूत , इतने सारे प्रमाण
होने के बावजूद –
आदमी की पहचान
मुश्किल हुई या आसान ?

अपनी क्षणिका पुर्रचना में किस तरह सृष्टि के चक्र को सरलता से अभिव्यक्ति प्रदान की ही.. 
पुनर्रचना
मोह मत करो वृक्षों ! 
अपने पुराने पत्तों का
उन्हें गिर जाने दो
नई पत्तियों को आने दो
फलियों !
पक गई हो – खिरो
बिखर कर समा जाओ धरती में
फिर से नये वृक्ष सिरजने के लिए ।
** जल और जीवन के जुड़ाव पर संवेदनशील हो कर वे लिखते हैं….
जल को जलते देखा
उथला गहरा देखा जल को ठहरा देखा
देखा ठहरा जल को / बरसते बहते देखा
छीजते उड़ते देखा जल को / कभी
जल से जल को मिलते देखा
उसी जल के लिए तरसते देखा / जन को  
निर्जल मरते देखा/जल को कभी इस तरह / जलते देखा।
** एक बानगी देखिए किस प्रकार शब्द “खोना ” को कितनी सुंदरता से परिवेश के साथ जोड़ा गया है……
खोना
जब शब्द खोता है
तब क्या वह सिर्फ मौन होता है
छिपी हुई चीख तब कहां होती है ?
खो जाना हमेशा वह नहीं होता जो हम समझते हैं
खो जाना कई दफा मानीखेज़ होता है
खाद की तरह
शब्द को कभी खोने देना चाहिए मिट्टी की जरूरत के लिए .
नई पत्तियों को आने देने के लिए
पुरानी पत्तियों को खो जाना चाहिए।

साहित्य सृजन : आपका ने हिंदी और राजस्थानी दोनों में साहित्य की रचा है। आप कविता, व्यंग्य,गीत, संस्मरण, डायरी, यात्रा वृत्तांत एवं रेखाचित्र की लेखन कला में सिद्धहस्त साहित्यकार हैं। हिंदी में आपने हिंदी में * लोग जहां खड़े हैं*, *दमित आकांक्षाओं का गीत”, *आवों में बारहों मास* , *नुगरे रा पद*, *कुछ भी स्थगित नही*, *नादान आदमी का सच* कविता संग्रह, *परम देश की अधम कथा” व्यंग्य, *रमते राम की डायरी* तथा *दो पाटन के बीच* डायरी और *तेरा जाना* संस्मरण की रचना की है। राजस्थानी साहित्य में * फूल न फूल की पांखड़ी*,*सौरम का चितराम* , *आंथ्योई नहीं दिन हाल*, सियाराम का गांव*, तथा *कोई देखे* कृतियों की रचना की हैं। 

अनुवाद – सुरतां. मराठी के प्रसिद्ध लेखक-गो.नी . दांडेकर के संस्मरणात्मक उपन्यास “स्मरणगाथा ” का राजस्थानी भाषा में अनुवाद. ( 400पृष्ठ) में किया है जिसका प्रकाशन केन्द्रीय साहित्य अकादमी द्वारा किया गया है।

सम्मान : आप को केंद्रीय साहित्य अकादमी का भारतीय भाषाओं में दिया जाने वाला वार्षिक पुरस्कार 2013 में राजस्थानी भाषा में आंथ्योई दिन हाल कृति के लिए प्रदान किया गया। राजस्थान साहित्य अकादमी का 2012 का सर्वोच्च साहित्यिक मीरा पुरस्कार आवों में बारह मास के लिए प्रदान किया गया। इन उल्लेखनीय पुरस्कार और सम्मान के साथ – साथ आपको डेढ़ दर्जन से भी अधिक सम्मानित संस्थाओं द्वारा विभिन्न कृतियों और साहित्य सेवा के लिए सम्मानित किया गया।

परिचय : आपका जन्म 20 जून 1956 के राजस्थान के बारां जिले के अंता में हुआ। आपने बी. एससी., बी.एड.तक शिक्षा प्राप्त की। आपकी रचनाएं ऑल इंडिया रेडियो से 1977 से प्रसारित होती रही और देश की अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित होती हैं। आपने रशिया. मास्को, पीटर्सबर्ग, ग्रीस- एथेंस, इजिप्ट मिस्र देशों की यात्राएं भी की हैं। आखिर में आप पर की गई राजस्थानी साहित्य के पुरोधा जितेंद्र ‘ निर्मोही ‘ की टिप्पणी गौरतलब है ” देश के नामवर समकालीन काव्य हस्ताक्षरों में अम्बिका दत्त चतुर्वेदी का नाम शुमार है। अम्बिका दत्त अपने अंतस का सारा वैविध्य कविताई कौशल के साथ बाहर रखने का सामर्थ्य रखते हैं। निःसंदेह वो आम आदमी, मजदूर,विवादाओं से जूझते हुए लोगों के कवि हैं।”

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवँ लेखक हैं व कोटा में रहते हैं)

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