आज बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और देश के लगभग 44 प्रतिशत भूभाग में फैला हुआ है। लेकिन 1947 में बलूचिस्तान एक एकीकृत राजनीतिक इकाई नहीं था। उस समय यह क्षेत्र विभिन्न राजनीतिक व्यवस्थाओं में विभाजित था।
एक बड़ा हिस्सा सीधे ब्रिटिश प्रशासन के अधीन था, जिसे ब्रिटिश बलूचिस्तान कहा जाता था। इसमें क्वेटा, पिशीन, सिबी और आसपास के क्षेत्र शामिल थे। दूसरी ओर, खानत-ए-कलात था, जिसके साथ खारान, लसबेला और मकरान जैसे क्षेत्रों के विशेष राजनीतिक संबंध थे।
इसी कारण 1947 में ब्रिटिश शासन के समाप्त होने का यह अर्थ नहीं था कि पूरा बलूचिस्तान स्वतः ही एक स्वतंत्र देश बन गया या सीधे पाकिस्तान में शामिल हो गया।
जून 1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन की योजना सामने आने के बाद ब्रिटिश बलूचिस्तान के भविष्य पर निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू हुई। 29 जून 1947 को शाही जिरगा और क्वेटा नगरपालिका के गैर-सरकारी सदस्यों की संयुक्त बैठक आयोजित की गई, जिसमें पाकिस्तान में शामिल होने के पक्ष में निर्णय लिया गया।
हालाँकि, इस निर्णय को लेकर बाद में विवाद भी उत्पन्न हुआ। बलूच राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने यह प्रश्न उठाया कि इस प्रक्रिया में कलात के प्रतिनिधियों को शामिल क्यों नहीं किया गया। वहीं, पाकिस्तान का दृष्टिकोण था कि यह केवल ब्रिटिश प्रशासन के अधीन क्षेत्रों से संबंधित राजनीतिक प्रक्रिया थी।
14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के साथ ही ब्रिटिश बलूचिस्तान उसका हिस्सा बन गया। लेकिन कलात ने एक अलग रास्ता चुना।
उस समय कलात के शासक खान मीर अहमद यार खान थे। कलात और ब्रिटिश सरकार के बीच पहले से कई संधियाँ मौजूद थीं। कलात का दावा था कि उसकी संवैधानिक स्थिति अन्य भारतीय रियासतों से अलग थी।
ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त होने के बाद कलात ने अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाए रखने का प्रयास किया। इसी दौरान मुहम्मद अली जिन्ना की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई, क्योंकि वे पहले कलात के कानूनी सलाहकार रह चुके थे और खान के साथ उनके पुराने संबंध थे।
अगस्त 1947 में कलात, ब्रिटिश प्रतिनिधियों और पाकिस्तान के बीच बातचीत हुई। इस बातचीत के परिणामस्वरूप एक महत्वपूर्ण विज्ञप्ति और स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट सामने आया।
11 अगस्त 1947 को जारी विज्ञप्ति में पाकिस्तान ने यह स्वीकार किया कि कलात एक स्वतंत्र और संप्रभु राज्य है, जिसके ब्रिटिश सरकार के साथ संधि संबंध रहे हैं। साथ ही यह भी माना गया कि उसकी स्थिति अन्य भारतीय रियासतों से भिन्न है।
हालाँकि, यह कोई अंतिम समाधान नहीं था। रक्षा, विदेश नीति और संचार जैसे विषयों पर आगे भी बातचीत जारी रखने का निर्णय लिया गया। कलात इसे अपनी स्वतंत्र स्थिति बनाए रखने के अवसर के रूप में देख रहा था, जबकि पाकिस्तान इस व्यवस्था को स्थायी रूप से स्वीकार करने के पक्ष में नहीं था।
इसके बाद कलात ने अपनी विधायिका के भीतर पाकिस्तान के साथ भविष्य के संबंधों पर चर्चा शुरू की। कलात में दो सदनों वाली विधायिका थी, जिनमें दार-उल-उमरा और दार-उल-अवाम शामिल थे।
फरवरी 1948 में इस विषय पर चर्चा हुई। 21 फरवरी को दार-उल-अवाम ने पाकिस्तान में तत्काल विलय के बजाय एक संधि के माध्यम से संबंध स्थापित करने का समर्थन किया। इससे यह स्पष्ट हो गया कि कलात की राजनीतिक व्यवस्था तत्काल पाकिस्तान में शामिल होने के पक्ष में नहीं थी।
इसी दौरान पाकिस्तान और कलात के बीच राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ता गया। अगस्त 1947 में पाकिस्तान ने कलात की स्वतंत्र और अलग स्थिति को स्वीकार किया था, लेकिन कुछ महीनों बाद जिन्ना का दृष्टिकोण बदल गया।
अक्टूबर 1947 तक जिन्ना चाहते थे कि कलात भी अन्य रियासतों की तरह विलय समझौते पर हस्ताक्षर करके पाकिस्तान में शामिल हो जाए। लेकिन खान मीर अहमद यार खान केवल रक्षा, विदेश नीति और संचार जैसे विषयों पर समझौते के लिए तैयार थे। वे अपनी विशेष राजनीतिक स्थिति समाप्त नहीं करना चाहते थे।
इस बीच एक और विवाद सामने आया। यह विवाद उन क्षेत्रों को लेकर था, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने कलात से पट्टे पर लिया था। इन क्षेत्रों के भविष्य को लेकर भी कोई स्पष्ट समाधान नहीं निकल पाया।
फरवरी 1948 तक बातचीत निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुकी थी। जिन्ना ने खान को पत्र लिखकर पाकिस्तान में शामिल होने के विषय में अंतिम निर्णय लेने के लिए कहा।
15 फरवरी 1948 को जिन्ना ने सिबी में आयोजित एक राज दरबार को संबोधित किया। उनका बलूचिस्तान दौरा केवल औपचारिक नहीं था। वे खान-ए-कलात से विलय के प्रश्न पर अंतिम निर्णय चाहते थे।
लेकिन खान इस बैठक में उपस्थित नहीं हुए। उन्होंने अपनी अनुपस्थिति का कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को बताया और कहा कि उन्होंने इस विषय पर अपनी विधायिका से राय लेने के लिए बैठक बुलाई है।
कुछ दिनों बाद कलात की विधानसभा ने तत्काल विलय का समर्थन नहीं किया। इससे दोनों पक्षों के बीच मतभेद और गहरे हो गए।
मार्च 1948 में परिस्थितियाँ अचानक बदल गईं। खारान, लसबेला और मकरान पाकिस्तान के साथ जुड़ गए। कलात के खान ने इसका विरोध किया।
उनका तर्क था कि इन क्षेत्रों का कलात के साथ विशेष राजनीतिक संबंध था और उनका पाकिस्तान में शामिल होना स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट की भावना के विरुद्ध था। विशेष रूप से मकरान का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण था, क्योंकि कलात उसे अपनी राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा मानता था।
इन घटनाओं के बाद कलात की स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई और वह लगभग चारों ओर से पाकिस्तान के प्रभाव में आ गया।
26 मार्च 1948 से घटनाओं ने सबसे विवादास्पद रूप धारण कर लिया। कई ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस दिन पाकिस्तानी सेना को पसनी, जिवानी और तुरबत की ओर बढ़ने का आदेश दिया गया।
इसके अगले दिन, 27 मार्च 1948 को खान मीर अहमद यार खान ने पाकिस्तान के साथ विलय समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके साथ ही कलात का अलग राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया और वह पाकिस्तान का हिस्सा बन गया।
पाकिस्तान इस दस्तावेज़ को कलात के वैध विलय का आधार मानता है। दूसरी ओर, बलूच राष्ट्रवादियों का दावा है कि कलात को पहले राजनीतिक रूप से अलग-थलग किया गया और बाद में सैन्य दबाव के बीच विलय स्वीकार करने के लिए मजबूर किया गया।
लेकिन विवाद यहीं समाप्त नहीं हुआ। खान के अपने परिवार में भी इस निर्णय का विरोध हुआ। उनके छोटे भाई नवाबजादा अब्दुल करीम पाकिस्तान में विलय के पक्ष में नहीं थे।
अब्दुल करीम का मानना था कि कलात को स्वतंत्र रहना चाहिए। मई 1948 में वे अपने समर्थकों के साथ अफगानिस्तान की ओर चले गए। उनके साथ कुछ राज्य अधिकारी, सैनिक और राष्ट्रवादी समर्थक भी थे।
उनका उद्देश्य कलात की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष शुरू करना था। उन्होंने अफगानिस्तान से सहायता प्राप्त करने और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें अपेक्षित सहायता नहीं मिली।
इसके बाद झलावान क्षेत्र में पाकिस्तानी सेना और विद्रोहियों के बीच संघर्ष शुरू हुआ। बाद के इतिहास में इसे पहला बलूच विद्रोह या फर्स्ट बलूचिस्तान कॉन्फ्लिक्ट कहा गया।
विद्रोहियों के पास सीमित संसाधन थे, जबकि पाकिस्तान के पास संगठित सैन्य शक्ति थी। बाहरी समर्थन के अभाव में यह आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया।
जुलाई 1948 में अब्दुल करीम और उनके समर्थकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। इस प्रकार पहला सशस्त्र संघर्ष समाप्त हो गया।
हालाँकि, इस संघर्ष ने बलूच राष्ट्रवादी राजनीति में प्रतिरोध का एक ऐसा बीज बो दिया, जिसने आने वाले दशकों में कई आंदोलनों को जन्म दिया।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि पूरा बलूचिस्तान एक ही दिन पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बना था। 29 जून 1947 को ब्रिटिश बलूचिस्तान के प्रतिनिधियों ने पाकिस्तान के पक्ष में निर्णय लिया। 14 अगस्त 1947 को ब्रिटिश बलूचिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। अगस्त 1947 में कलात ने अपनी अलग राजनीतिक स्थिति बनाए रखी। अक्टूबर 1947 से फरवरी 1948 तक दोनों पक्षों के बीच बातचीत जारी रही। मार्च 1948 में खारान, लसबेला और मकरान पाकिस्तान से जुड़ गए और 27 मार्च 1948 को कलात के खान ने विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए।
इसके बाद मई से जुलाई 1948 के बीच अब्दुल करीम के नेतृत्व में पहला सशस्त्र बलूच विद्रोह हुआ।
ग्वादर का इतिहास भी इससे अलग है। 1947 में ग्वादर पाकिस्तान का हिस्सा नहीं था, बल्कि उस पर ओमान का अधिकार था। पाकिस्तान ने 1958 में ओमान से ग्वादर को खरीदकर उसे अपने नियंत्रण में लिया।
आज भी सबसे बड़ा विवाद यही है कि क्या कलात ने अपनी स्वतंत्र इच्छा से पाकिस्तान में प्रवेश किया था या वह राजनीतिक और सैन्य दबाव का परिणाम था।
पाकिस्तान का कहना है कि खान ने कानूनी रूप से विलय समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, इसलिए यह विलय पूरी तरह वैध था। वहीं, बलूच राष्ट्रवादियों का दावा है कि कलात स्वतंत्र रहना चाहता था, उसकी राजनीतिक स्थिति को कमजोर किया गया, उसके अधीन माने जाने वाले क्षेत्रों को अलग किया गया और अंततः सैन्य दबाव के बीच उससे हस्ताक्षर करवाए गए।




