आज अनेक प्रकार की समस्याएंँ जन- जन को त्रस्त किये हुए हैं। जैसे-पर्यावरण प्रदूषण, जीवनमूल्यों का क्षरण,बदलते समय के साथ असामंजस्य, ग़रीबी,महंँगाई, संघर्षमय जीवन तिस पर धैर्य हीनता, पारिवारिक विघटन, अनाचार, नारी-उत्पीड़न, नारी का शोषण, गांँव से पलायन,वृद्धों की समस्याएंँ,एकाकीपन आदि। अत्यधिक व्यस्तता, अस्त-व्यस्तता,आत्मकेंद्रितता, नीरसता, अलगाव, कल्पना शक्ति का प्रयोग न करना मिट्टी से नफ़रत जैसी प्रवृत्तियाँ और दशाएँ भी वर्तमान में जनजीवन को किसी न किसी रूप में क्षतिग्रस्त किए हुए हैं।
एक जिम्मेदार साहित्यकार देश समाज को खुली नजर से देखता और दिखाता है।उस पर अपना मनन मंथन ,विश्लेषण प्रस्तुत करता है। वह युगीन समस्याओं के निदान समाधान भी प्रस्तुत करता है।वह अपने वाग्ववैदग्ध्य से जन मानस में संवेदना जगाकर उसे विचारोत्तेजना प्रदान करता है। समस्याओं के निवारणार्थ पाठकों को ऊर्जस्वित् करता है। विशेषकर कवि की रसात्मक वाणी सामाजिकों के निष्क्रिय रूखे या कमजोर मन को आप्लावित और आह्लादित करती हुई सन्मार्ग दिखाती है।लेखन की प्रासंगिकता बहुत कुछ इसी पर निर्भर करती है।
आइए युगीन प्रासंगिकता के परिप्रेक्ष्य में ख्यातनाम साहित्यकार जितेन्द्र निर्मोही जी के काव्य साहित्य पर विचार करें। आकाश को छोटा कर कागज पर हूबहू दिखाया नहीं जा सकता।फिर भी -
जंगल से गुजरते हुए कृति में काव्यकार जितेन्द्र निर्मोही जी ने अपने विशुद्ध एवं अद्भुत प्रकृति प्रेम को दर्शाते हुए प्रकृति के प्रति संवेदना जगाने का प्रयास अनेक प्रकार से किया है।
स्वच्छ पोलीथीन में स्वच्छ बीज उगाने का प्रयास ही आपको हर्ष से भर देता है। क्योंकि क्षतिग्रस्त वृक्षों की पीड़ा आपकी अपनी पीड़ा है।
जंगल में उगाए हुए बीज का अंकुर कवि को जंगली जीवों के सिंह शावक और मृग शावक जैसा प्यारा लगता है। यहांँ अंकुर के लिए शावक शब्द बड़ा सुन्दर बन पड़ा है।
नयी सदी में प्रवेश करते लोगों का खुश होना आपको खलता है । प्यारे और सबके लिए बड़े उपयोगी जंगल नष्ट हो रहे हैं तो खुशी कैसी?
जंगलों के सजीव होने का अहसास कराते हुए कृतिकार भावना के स्तर पर समझाते हुए कहते हैं, जंगलों से मानव का रिश्ता अरण्य संस्कृति से है। जंगल आज भी बिना कुछ लिए हमें बहुत कुछ दे रहे हैं पर हम निर्दयता से उन्हें काट रहे हैं।
फैरात कविता द्वारा कवि कहते हैं अनपढ़ आदमी में दयाभाव देखा गया पर पढ़े-लिखे में वह नदारद कैसे हो गया? किसी का दिल पत्थर ही हो तो बेचारा दया नहीं कर सकता। किन्तु जिस काम के नाम पर पगार मिल रही है उसे तो कर सकता है।कवि को खेद है कि पढ़े लिखे लोगों को भी यह समझ में नहीं आता कि वृक्षों में प्राण होते हैं।
जंगल का महत्त्व बताते हुए कवि कहते हैं, वहां लोग घूमने का आनन्द लेते हैं। पिकनिक मनाते हैं। गुप्त मंत्रणा भी वहांँ की जा सकती है।यदि बंधन महसूस करते हो तो यहांँ आकर बतिया सकते हो। यहांँ तक किसी को गालियांँ देकर भी अपनी भड़ास निकाल सकते हो।वह तो तटस्थ रहेगा। वह तुम्हें सुविधा देता है। उसने अपनी संपदा समर्पित कर रखी है। तुम उसका मनमाना उपयोग कर सकते हो। इसके बदले में वह तुम से कुछ नहीं लेता।खेत की तरह तुम्हें इसकी देखभाल भी नहीं करनी पड़ती।
कवि ने पर्यावरण के महत्वपूर्ण अंग मिट्टी के महत्त्व को भी बताया है।आजकल स्वच्छता के नाम पर बच्चों को मिट्टी में खेलने से रोका जाता है। जितेन्द्र निर्मोही जी मिट्टी के महत्त्व को भली-भांति जानते हैं। अतः वे इस सोच को ग़लत ठहराते हैं और बच्चों को मिट्टी के सानिध्य में रखने को प्रेरित करते हैं।
कवि ने अभयारण्य की ओर ध्यान आकर्षित कर कहा है कि अभयारण्य नाम ही है। वहांँ जानवरों के लिए अभय नहीं। सरकार के नियमों की धज्जियांँ उड़ाई जाती हैं।
लोग आत्मकेंद्रित, अनुशासनहीन और नासमझ हैं। तेंदु के पत्ते तोड़े जाते हैं ।इनका उपयोग किया जाता है। तेंदु के वृक्ष कमाई के साधन हैं फिर भी इन्हें काटा जाता है।
विलुप्त होते जा रहे जंगलों की पीड़ा को द्विगुणित कर ‘भोर पर चढ़ आई धूप ‘कृति में निराले अंदाज में वे यूं व्यक्त करते हैं -
विलुप्त होते
पलाशों में
खो गए मोहन
मदन नजर न आए
कदम्ब तले।
भोर पर चढ़ आई धूप कृति से चंद उदाहरण और -
जीवनमूल्यों के ह्रास को दर्शाकर संवेदना जगाने का प्रयास देखिए-
घर संबंध बहुत पीछे छूट गए
बूढ़े यों अब बच्चों को देखने को तरस गए।
कितनी दु:खद स्थिति है-
बेटे का सुख
पोते की बांहें
ढूंढती ही रही
बूढ़ी निगाहें
मूल्यों के ह्रास पर कवि की बेचैनी देखिए -
क्या हो गया है इस मौसम को
क्या इसमें परिवर्तन लाया जा सकता है?
क्या है हमारी विवशता?
और तो और घर भी कितना बदल गया है -
अब तो
खूंटियों पर भी
दिखाई नहीं देते
दादाजी खड़े
और बाबूजी की
नाहक परेशानी
नैतिक पतन से आहत निर्मोही जी की ऐसी भावाभिव्यंजना किस जिंदा दिल के कपाट न खोल देगी?
व्यस्त जिंदगी कीअस्त-व्यस्तता का हाल कवि के शब्दों में कितना मार्मिक और विचारोत्तेजक है-
बहुत बेतरतीब हो गया हूं मैं
समय के संक्रमण के साथ
कभी सफर में अपना हाथ
कभी अपना पांव भूल आया हूं।
*बदलते समय में असहिष्णुताजन्य अशांति का हल देखिए-
एक दिया सलाई
दिखा दो
पुरानी यादों को
नई सदी में ठहरने के लिए
कवि के अनुसार बदलाव इस हद तक पहुंँच गया है कि देश, समाज, संस्कृति ही नहीं दिल दिमाग भी बदल गए-
दिल भी अब पहले सा/समंदर सा न रहा/न दिमाग ही आसमान की तरह साफ
बिगड़े हालात के सुधार के संबंध में निर्मोही जी प्रश्न शैली में कहते हैं -
आखिर कौन लाएगा बदलाव
पक्ष
नहीं नहीं
प्रतिपक्ष
बिलकुल नहीं
तो फिर कौन
शायद मैं ।
यहांँ यह संदेश दिया है कि सरकार और विरोधी दल से बदलाव की अपेक्षा नहीं। जनता में से ही कोई इसे करेगा।वह कवि भी हो सकता है।
'धूप के साए में चांदनी ‘ कृति का क्या कहना!
द्रष्टव्य है -
*'धूप के साए में चांदनी 'कविता में कवि ज़िन्दगी का सच बताते हुए कहते हैं कि जिंदगी में तपिश सुखद अनुभव देने के लिए तैयार होकर आती है। इसलिए जब भी जीवन में संघर्ष का सामना करना पड़े सुख के अहसासों को याद रखो।यों मुसीबत में धैर्य रखने की सीख देती यह कविता बड़े महत्त्व की है।
मधुघट" कविता भी जीवन संघर्ष में डटे रहने की प्रेरणा देती है।
नेक राह के कदम'रचना द्वारा कवि ने मनोवैज्ञानिक ढंग से समझाया है कि प्रयत्न तो करो चाहे थोड़ा ही कर पाओ पर करो तो सही।
प्रेरणार्थ कवि की सशक्त शब्दावली तो देखिए-
मैं जानता हूंँ वक्त की चादर निचोड़ना
सूख ही जाएगी मेरे दोस्त जरा हौसला रख।
गीता के संदेश हर युग की तमाम समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करते हैं।भ्रम के निवारणार्थ कृतिकार का कहना है -
गीता के विषय और विकार
केवल वाणी या विवरण नहीं
ये जीवन रहा रिक्त ही
आचरण में ये जब तक नहीं
राष्ट्रभक्ति, ईमानदारी, कर्त्तव्यपरायणता, त्याग और प्रेम अर्थात् मनुष्य को मनुष्य बनने की सीख देती कविता है मां का दूध-
मां का दूध
ही तो है
जो सिखाता है
राष्ट्रभक्ति
ईमानदारी
कर्त्तव्यपरायणता
त्याग और प्रेम ।
××××××
क्योंकि
उसके सामने
हमेशा ही
खड़ा रहता है
मां की "अस्मिता का सवाल"
" दौड़"कविता पाठकों को पुरुषार्थी बनने की प्रेरणा देती है -
दौड़ने से मिलती है ऊर्जा/दौड़ से मालूम होती है क्षमता/दौड़ से दिखती है पहचान.......जो भी जीवन में/दौड़ने के/गुर सीख जाता है/समझ लो जीना सीख जाता है ।
निर्मोही जी के गीत विभिन्न रसों से समृद्ध काव्यानन्द सरित् संगम हैं। ये आह्लादित कर नीरसता दूर करते हैं। सद् प्रेरणा जगाते हैं और जीने की कला भी सिखाते हैं।ग्राम्य जीवन की सहजता और आनंद को स्मरण कराते हुए वे गाँव के प्रति बढ़ती अरुचि और पलायन की प्रवृत्ति पर प्रहार करते हैं।
अब जरा नजर ‘मेरे गीत और नवगीत'पर-
*ग्राम्य जीवन के आनंद की स्मृतियों से ओतप्रोत "सांझ पागल तो नहीं"गीत की पंक्तियाँ देखिए -
खूब हँसते बहते जल में पाँव धरते
जब ठुमकते विहग गाते और विचरते
हम वहाँ मिट्टी में सनते दूब चुनते
भूल कैसे तुम गई हो उन क्षणों को
कल्पनाशक्ति मनुष्य को ईश्वर की बहुत बड़ी देन है। अफसोस की वर्तमान में विशेष रूप से नई पीढ़ी में कल्पना की प्रवृत्ति कम होती जा रही है।जितेन्द्र निर्मोही जी की कल्पनाप्रवणता अद्भुत है।वे अपने सृजन से पाठकों को कल्पनाशील बनाने का प्रयत्न करते हैं।
*कवि जितेन्द्र निर्मोही पाठकों के मन को कल्पना के अपने क्षणों में डूबाने में सक्षम हैं।इस संबंध में आँखों पर उनकी अभिव्यक्ति देखिए:-
तुम्हारी आँखों में
उपमाएँ हैं
अलंकार है
कई ऋतुएँ हैं।
आपके स्मृति गीत शहरी विलासिता पर व्यंग्य हैं ।अपसंस्कृति पर चोट हैं। सामाजिक समरसता को भी उकेरा गया है।वर्तमान समय की संवेदनहीनता और शहर की स्वाभिमान शून्यता पर उनकी चंद पंक्तियाँ ही पर्याप्त हैं-
है यहाँ बैशाखियाँ और चंद सिक्के
आदमी मिलते कहाँ पहले से मन के।
संवेदनाओं को जगाकर परिवार ,समाज व देश की विभिन्न समस्याओं के निराकरण की सोच के साथ विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर लिखे गए ये एक से बढ़कर एक गीत गहन अनुभव के प्रतिफल हैं। इनके द्वारा जीवन जीने की कला सिखाने का भरपूर प्रयास किया गया है।इन्हें कई साहित्यकारों ने गाकर उनके माधुर्य और प्रभावोत्पादकता को प्रमाणित कर दिया है।
कृति के नवगीतों में पुरासम्पदा है, आज के सवाल हैं कोमल भाव हैं, जीवन दर्शन है। प्रकृति और परिवार का सामंजस्य भी पूरी संवेदना के साथ है-
सांझ पड़े गैया आती
और जोर जोर से रंभाती
ऐसा लगता कोई बिटिया
पीहर में है आती।
द्रौपदी के ये कथन भी नारी सशक्तीकरण और समाज के लिए बड़े महत्त्व के हैं-
समाज को चाहिए कि नारी का सम्मान करे। *विदुषी पर गर्व करे।उसका अपमान न करे।
दुश्मन को अपने भुजबल से पाठ पढ़ाए।
यदि वह चुपचाप अपमान सह जाती तो महाभारत नहीं होता।पर नारी पुरुषार्थ और स्वाभिमान नष्ट हो जाता।
द्रौपदी महाकाव्य में द्रौपदी के प्राकट्य से अंत तक की कथा है जो स्त्री जीवन की गहरी संवेदना जगाने वाली विडम्बना के अतिरिक्त प्रतिशोध,क्रोध,संयम, संयम की सीमा, धर्म का मर्म, मनोभावों के अवसरानुकूल सदुपयोग और उनके संतुलन की आवश्यकता व सतर्कता के महत्त्व को उजागर करती है।यह कृति पारिवारिक विद्वेष के दुष्परिणाम, सौजन्य के लाभ, उच्च कोटि की समझ रखने और सामाजिक समरसता की प्रेरणा देती है।
द्रौपदी की महानता पर कवि कहते हैं -
जीवन जीना द्रौपदी का
भारतीय नारी अस्मिता का
वैभव समझाता है।
द्रौपदी के चरित्र में सद्गुणों का अपार वैभव है।लता और निर्झर उसके मित्र हैं। वह लगन से अतिथि सेवा करती है। समाज व परिवार के लिए असह्य पीड़ा सहती है।बस्ती की भील किरात बालाएंँ उसके अक्षयपात्र से भोजन पाती हैं।वह अपने परिजनों के साथ बस्ती के उदरपोषण को प्राथमिकता देती है; स्वयं क्षुधा सहती है। रात्रि में वंशलोचन और वंश किसलय खा, जलपान कर गुजर बसर कर लेती है।वह जीवन के भीषण निदाघ में भी मन को सरस रखना खूब जानती है।वह काव्य रचना कर अर्जुन को सुनाती है।
द्रौपदी एक ओर अपने युग की मर्यादित नारी है तो दूसरी ओर अन्याय का कड़ा विरोध करने में भी समर्थ है।वह दृढ़ आत्मबली तेजस्विनी स्वाभिमान की रक्षा में समर्थ है। वह जीवन संघर्ष में जीवट के साथ जूझती है और संयम व धैर्य के साथ विजयी होती है।
यह है द्रौपदी का दृढ़ आत्मबलऔर महान् तेजस्विता जिसे देख गांधारी ने धृतराष्ट्र को जगाया तो उन्होंने द्रौपदी से तीन वचन मांगने को कहा और द्रौपदी विजयी हुई -
सबके चेहरे थे मृतप्राय:
कैसे बोलें और क्या बोलें
मैं शाप यहांँ पर देती हूंँ
मैं महासती अबला नारी
सब पुण्य क्षरण कर देती हूँ।
अंत में उसे वेणु स्वर सुनाई देना जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति है।
आज चारित्रिक पतन के युग में यह कृति बहुमूल्य है। इसमें द्रौपदी के कथन नारी सशक्तीकरण और समाज के लिए बड़े महत्त्व के हैं। जैसे-
समाज को चाहिए कि नारी का सम्मान करे। *विदुषी पर गर्व करे।उसका अपमान न करे।
गहरी संवेदना जगाती ये पंक्तियांँ नारी हित में सोचने को मजबूर करती हैं -
नारी न ही वस्तु है
ना ही वह केवल भोग्या है
वह जीवन भर सहती रहती
रोगी होकर भी आरोग्या है।
धन्य हैं कविवर जितेन्द्र निर्मोही जी और उनकी युग दृष्टि! वर्तमान में ऐसा साहित्य पढ़ा और गढ़ा जाना चाहिए।
पता -वर्तमान पता:- 38, मनवा जी का बाग, मोती डूंगरी रोड़, जयपुर (राजस्थान) पिन 302004
मोबाइल नं. 9461704390
अक्षयलता शर्मा, जयपुर।





