साल 1930-31, जगह - झाँसी और ओरछा के बीच का जंगल, अंग्रेजों ने बुंदेलखंड में एक नया कानून लगाया था - किसी भी गाँव में लोहे का एक टुकड़ा भी बिना परमिट के नहीं मिलेगा। वजह? उन्हें डर था कि यहाँ के लोग चंद्रशेखर आज़ाद और सदरूद्दीन के दल को हथियार बना कर दे रहे हैं। हर लोहार की भट्टी पर एक गोरा सिपाही बैठा दिया गया...
उस वक्त ओरछा के जंगलों में क्रांतिकारियों का एक गुप्त अड्डा था। उनके पास लोग थे, हौसला था, पर कारतूस खत्म हो रहे थे। और कारतूस थे झाँसी सदर में, अंग्रेजों की छावनी में....
अब सवाल था - छावनी से जंगल तक 40 किलोमीटर, बीच में 5 नाके। कोई भी जवान आदमी निकलता तो तलाशी, कपड़े तक फाड़ कर देखे जाते थे...
तब ये रास्ता उन औरतों ने निकाला जिन्हें अंग्रेज सबसे कमजोर समझते थे, वो थीं बुंदेली किसान औरतें - सिर पर बड़ी-सी टोकरी, जिसमें ऊपर गोबर के कंडे, नीचे सूखी घास, और घास के नीचे, सरसों के तेल में लिपटे हुए, कारतूस और देसी कट्टों के पुर्जे...
उनकी लीडर थी एक विधवा, जिसे सब "कक्का जू" कहते थे। उम्र 45 के आसपास, झाँसी के पास के बरुआसागर गाँव की। कक्का जू रोज सुबह 4 बजे उठती, 10-12 औरतों का जत्था बनाती, और सब "कंडे बेचने जा रहे हैं" कहकर निकल पड़तीं।
अंग्रेज सिपाही क्या देखते? कुछ मैली-कुचैली औरतें, सिर पर कंडे की टोकरी, गाना गाती हुई जा रही हैं -
सिपाही हँसते, कभी-कभी टोकरी का ऊपर का कंडा हटाकर देखते और जाने देते। उन्हें बदबू आती थी, इसलिए अंदर हाथ नहीं डालते थे। और इसी बदबू ने क्रांति बचा रखी थी।
एक बार तो ऐसा हुआ कि एक नए अंग्रेज अफसर ने पूरा जत्था रोक लिया। उसने कहा - सब टोकरियाँ नीचे उतारो, तलाशी होगी।
सबकी साँस अटक गई। उस दिन टोकरियों में 200 कारतूस थे।
कक्का जू आगे आई। उसने अपनी टोकरी जमीन पर पटक दी। कंडे बिखर गए, धूल उड़ गई। वो वहीं जमीन पर बैठकर छाती पीट-पीट कर रोने लगी - "अरे हम गरीबों का कंडा फिंकवा दओ, हमारो गुजर-बसर कैसे होई, हाय दइया..."
उसके पीछे बाकी 11 औरतें भी रोने लगीं। ऐसा हंगामा मचा कि बाजार के सारे लोग इकट्ठा हो गए। वो अंग्रेज अफसर घबरा गया कि कहीं दंगा न हो जाए। उसने हाथ जोड़कर कहा - "जाओ, जाओ, ले जाओ।"
और वो जत्था रोते-रोते ही हँसते हुए जंगल की ओर निकल गया।
महीनों तक ये चलता रहा। जंगल में बैठे लड़के कहते थे - "जब तक कक्का जू की टोकरी आ रही है, तब तक आज़ादी जिंदा है।"
1931 में जब आज़ाद शहीद हुए, तो अंग्रेजों ने जंगलों में सर्च तेज कर दी। उन्हें किसी मुखबिर से इस टोकरी वाले रास्ते का पता चल गया। उन्होंने कक्का जू को बरुआसागर में पकड़ लिया।
3 दिन तक थाने में रखा। कहा गया कि उन पर बहुत जुल्म हुआ, पर उन्होंने एक भी नाम नहीं बताया। आखिर में सबूत न होने से छोड़ना पड़ा।
छूटने के बाद कक्का जू ने फिर कभी टोकरी नहीं उठाई। वो उसी गाँव में रही, लोगों के सुख-दुख में शामिल रही, और 1962 में गुमनामी में ही मर गई।
आज बरुआसागर में उसकी झोपड़ी की जगह भी नहीं पता, पर वहाँ की बूढ़ी औरतें आज भी जब कंडे थापती हैं, तो एक गीत गाती हैं -
"टोकरी में कंडा, कंडा में लाली, लाली में लिपटी है, देश की खुशहाली..."
ये हमारी वो मातृशक्ति थी जिनकी टोकरी में गोबर नहीं, भारत का भाग्य उदित होता था, किन्तु वर्तमान समाज में टिकटोक एवं रील बनाने एवं सोशल मीडिया पर वायरल होने के लिए हमारी मातृशक्ति अपनी मर्यादा, संस्कृति एवं संस्कारों को भूलती जा रही है जिन दिलों में राष्ट्रवाद के शोले दहकते थे उनमें मिलियन व्यूज की लालसा पल रही है और यदि इस मानसिकता को न बदला गया है निकट भविष्य में इसके बहुत घातक परिणाम आने की संभावना है जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती "कक्का जू" जैसी मातृशक्ति को पुनः पुनः प्रणाम




