भगवान धन्वंतरि की आराधना, दीपदान और भारतीय संस्कृति में धनतेरस का आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व
दीपावली के पंचदिवसीय पर्व का शुभारंभ धनतेरस से होता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल सोना, चाँदी अथवा नए बर्तन खरीदने का अवसर नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति में आरोग्य, आयुर्वेद, स्वास्थ्य, धन-समृद्धि और जीवन की मंगलकामना का प्रतीक है।
धनतेरस को संस्कृत में धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा की जाती है। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का प्रवर्तक तथा देवताओं का वैद्य माना गया है। इसीलिए धनतेरस का एक अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश है कि जीवन में धन से भी अधिक मूल्यवान स्वास्थ्य है।
धनतेरस 2026: पूजा का शुभ मुहूर्त
इस वर्ष का पर्वःशुक्रवार, 6 नवम्बर 2026
मुंबई के स्थानीय पंचांग के अनुसार पूजा का शुभ समय इस प्रकार है:
धनतेरस पूजा मुहूर्त
शाम 6:35 – 8:35
शुक्रवार, 6 नवम्बर 2026 · मुंबई समय
प्रदोष काल
शाम 6:03 – 8:35
वृषभ स्थिर लग्न
शाम 6:35 – 8:35
त्रयोदशी तिथि प्रारंभ
6 नवम्बर, सुबह 10:30
त्रयोदशी तिथि समाप्तः 7 नवम्बर, सुबह 10:47
1. भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य और धनतेरस
पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के समय भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। यह घटना स्वास्थ्य, दीर्घायु और अमृतत्व की भारतीय अवधारणा का प्रतीक मानी जाती है।
भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। वे आयुर्वेद के अधिष्ठाता देवता हैं। उनके प्राकट्य दिवस के रूप में धनतेरस मनाने की परंपरा प्रचलित है।
इस पर्व का संदेश है कि मनुष्य को अपने जीवन में धन अर्जित करने के साथ-साथ शरीर, मन और आत्मा के स्वास्थ्य की भी रक्षा करनी चाहिए। स्वस्थ शरीर ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का आधार है।
2. धनतेरस का वैदिक एवं आयुर्वेदिक संदेश
धनतेरस के अवसर पर स्वास्थ्य के महत्व को समझाने के लिए आयुर्वेद का यह प्रसिद्ध सुभाषित अत्यंत प्रासंगिक है।
श्लोक:
धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।
हिंदी अर्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—जीवन के चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार आरोग्य अर्थात् अच्छा स्वास्थ्य है।
यह श्लोक आयुर्वेद की मूल भावना को व्यक्त करता है। धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि की पूजा इसी भावना का स्मरण कराती है।
एक अन्य महत्वपूर्ण संस्कृत प्रार्थना भगवान धन्वंतरि को समर्पित है।
ॐ शङ्खं चक्रं जलौकां दधदमृतघटं चारुदोर्भिश्चतुर्भिः।
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुकपरिविलसन्मौलिमम्भोजनेत्रम्॥
कालाम्भोदोज्ज्वलाङ्गं कटितटविलसच्चारुपीताम्बराढ्यम्।
वन्दे धन्वन्तरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम्॥
हिंदी अर्थ: मैं भगवान धन्वंतरि को प्रणाम करता हूँ, जिनके चार हाथों में शंख, चक्र, जोंक और अमृत कलश सुशोभित हैं। जिनका स्वरूप दिव्य एवं सुंदर है और जो समस्त रोगों को दूर करने वाले हैं।
यह भगवान धन्वंतरि का प्रचलित ध्यान-श्लोक है। इसका पाठ करके आरोग्य और निरोगी जीवन की प्रार्थना की जाती है।
3. धनतेरस पर सोना-चाँदी और बर्तन खरीदने का महत्व
धनतेरस पर सोना, चाँदी, नए बर्तन और अन्य उपयोगी वस्तुएँ खरीदना शुभ माना जाता है। इसके पीछे समृद्धि, शुभारंभ और घर में सुख-संपन्नता के आगमन की लोकपरंपरा है।
सोना और चाँदी स्थायित्व तथा समृद्धि के प्रतीक हैं। वहीं नए बर्तन खरीदने की परंपरा का संबंध समुद्र मंथन से निकले अमृत कलश की पौराणिक कथा से भी जोड़ा जाता है।
इस दिन माता लक्ष्मी के साथ धन के देवता कुबेर की पूजा भी की जाती है। लेकिन भारतीय संस्कृति में धन का अर्थ केवल मुद्रा अथवा संपत्ति नहीं है। विद्या, स्वास्थ्य, अन्न, सदाचार, परिवार और संतोष भी जीवन की वास्तविक संपत्तियाँ हैं।
इसलिए धनतेरस का वास्तविक संदेश है—धन का अर्जन धर्मपूर्वक हो, उसका उपयोग लोककल्याण में हो और जीवन में आरोग्य एवं संतोष बना रहे।
4. धनतेरस की पूजा विधि
धनतेरस के दिन निम्नलिखित विधि से पूजा की जा सकती है।
घर की साफ-सफाई करके मुख्य द्वार पर दीपक जलाएँ और रंगोली बनाएँ।
पूजा स्थल पर भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें।
जल, पुष्प, अक्षत, चंदन, धूप और दीप अर्पित करें।
भगवान धन्वंतरि के मंत्र का जाप करें—
ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वन्तरये अमृतकलशहस्ताय सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय त्रैलोक्यनाथाय श्रीमहाविष्णवे नमः॥
माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा करके परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें।
संध्या समय घर के बाहर दक्षिण दिशा में यमदेव के निमित्त दीपदान करें। इसे यमदीपदान कहते हैं।
ध्यान रहे कि पूजा में आडंबर की अपेक्षा श्रद्धा, स्वच्छता और सद्भावना का अधिक महत्व है।
प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद का समय होता है। धनतेरस की लक्ष्मी-कुबेर पूजा के लिए प्रदोष काल में वृषभ स्थिर लग्न का समय विशेष शुभ माना जाता है। स्थिर लग्न का धार्मिक अर्थ घर में सुख-समृद्धि और लक्ष्मी के स्थायी निवास की मंगलकामना से जुड़ा है।
अन्य पंचांगों में गणना के आधार पर कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है।
6. यमदीपदान का विशेष महत्व
धनतेरस की संध्या को यमदेव के निमित्त दीपदान करने की परंपरा है। इसे यमदीपदान कहा जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार राजा हेम के पुत्र की कुंडली में विवाह के चौथे दिन मृत्यु का योग बताया गया था। उनकी पत्नी ने उस रात घर के द्वार पर दीप जलाए और सोने-चाँदी के आभूषणों का ढेर लगाकर पति को जगाए रखा। यमराज सर्प के रूप में वहाँ आए, लेकिन दीपों के प्रकाश और आभूषणों की चमक के कारण भीतर प्रवेश नहीं कर सके। इस प्रकार राजकुमार के प्राण बच गए।
इस कथा के आधार पर धनतेरस को यमदीपदान की परंपरा प्रचलित हुई। इस दिन दक्षिण दिशा की ओर दीपक रखकर अकाल मृत्यु से रक्षा और परिवार की दीर्घायु की प्रार्थना की जाती है।
7. धनतेरस का वास्तविक संदेश: धन से बड़ा है स्वास्थ्य और संतोष
भारतीय संस्कृति में धन को जीवन का महत्वपूर्ण साधन माना गया है, लेकिन उसे जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं माना गया। धन का सदुपयोग तभी है जब उससे व्यक्ति, परिवार और समाज का कल्याण हो।
धनतेरस हमें तीन महत्वपूर्ण बातें सिखाता है।
आरोग्य ही सबसे बड़ा धन है: भगवान धन्वंतरि की पूजा हमें स्वास्थ्य और निरोगी जीवन का महत्व बताती है।
धन का अर्जन धर्मपूर्वक होना चाहिए: लक्ष्मी की पूजा के साथ सदाचार, ईमानदारी और परिश्रम को भी महत्व देना चाहिए।
समृद्धि का उद्देश्य लोककल्याण होना चाहिए: अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा जरूरतमंदों, शिक्षा, चिकित्सा, गौसेवा और पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्यों में लगाना चाहिए।
अंततः धनतेरस केवल खरीदारी और धन-संग्रह का पर्व नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, प्रसन्न मन, समृद्ध परिवार और कल्याणकारी समाज की कामना का पर्व है।
इस धनतेरस पर हमारी प्रार्थना हो कि प्रत्येक घर में आरोग्य का अमृत, जीवन में लक्ष्मी की कृपा, कर्मों में धर्म और हृदय में संतोष का वास हो।
शुभ धनतेरस!
8. लेख के लिए प्रमुख ग्रंथ-संदर्भ
एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है: धनतेरस की परंपरा का प्रत्यक्ष वर्णन वेदों में नहीं मिलता। इसका धार्मिक आधार मुख्यतः पुराणों और बाद की धर्मपरंपराओं में विकसित हुआ है। इसलिए वैदिक संदर्भ कहने के बजाय निम्नलिखित प्रामाणिक ग्रंथ-संदर्भ देना अधिक उचित होगा।
1. श्रीमद्भागवत महापुराण – अष्टम स्कंध, अध्याय 8, श्लोक 31–34: समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि के अमृत कलश सहित प्रकट होने का वर्णन। विशेष रूप से श्लोक 34 में उन्हें आयुर्वेद के ज्ञाता कहा गया है।
VedaBase+1
2. चरक संहिता – सूत्रस्थान, अध्याय 1, श्लोक 15–16: आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल बताया गया है।
siva.sh+1
3. कालिदास – कुमारसम्भव, सर्ग 5, श्लोक 33: शरीर के महत्व को बताते हुए प्रसिद्ध उक्ति है—
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।
अर्थ: शरीर ही वास्तव में धर्माचरण का प्रथम साधन है।
इन तीनों संदर्भों से धनतेरस के स्वास्थ्य, धर्म और समृद्धि संबंधी संदेश को शास्त्रीय आधार मिलता है।





