शास्त्रीय, वैदिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक दृष्टि से दीपावली का महत्व तथा वर्ष 2026 का लक्ष्मी-गणेश पूजन मुहूर्त
भारत के प्रमुख त्योहारों में दीपावली केवल रोशनी और उत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय दर्शन, अध्यात्म, संस्कृति और जीवन-मूल्यों का प्रतिनिधित्व करने वाला महापर्व है। दीपावली का अर्थ है—दीपों की अवली अर्थात् दीपों की पंक्ति। कार्तिक मास की अमावस्या की अंधेरी रात में जब असंख्य दीप प्रज्वलित होते हैं, तब वे केवल घरों को ही प्रकाशित नहीं करते, बल्कि मनुष्य को अपने भीतर के अज्ञान, अहंकार, निराशा और नकारात्मकता को दूर करने का संदेश भी देते हैं।
भारतीय परंपरा में दीपावली को धन, वैभव, आरोग्य, ज्ञान, सद्बुद्धि, पारिवारिक एकता और सामाजिक सद्भाव का पर्व माना गया है। इस दिन विशेष रूप से माता महालक्ष्मी, भगवान गणेश और माता सरस्वती की पूजा की जाती है। लक्ष्मी समृद्धि की, गणेश बुद्धि एवं विवेक की और सरस्वती ज्ञान एवं विद्या की प्रतीक हैं। इन तीनों की संयुक्त आराधना का संदेश है कि जीवन में धन के साथ बुद्धि और ज्ञान का होना भी आवश्यक है।
लक्ष्मी-गणेश पूजन का मुख्य मुहूर्त
शाम 6:27 – 8:27
रविवार, 8 नवम्बर 2026
मुंबई का स्थानीय समय · अवधि 2 घंटे
प्रदोष काल
शाम 6:02 – 8:34
वृषभ स्थिर लग्न
शाम 6:27 – 8:27
अमावस्या प्रारंभ
8 नवम्बर, सुबह 11:27
अमावस्या समाप्त: 9 नवम्बर, सोमवार दोपहर 12:31
सूर्यास्त
शाम 6:02
पूजन के लिए प्रदोष काल और वृषभ स्थिर लग्न का संयोग विशेष महत्वपूर्ण है। वृषभ राशि स्थिर राशि है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार स्थिर लग्न में लक्ष्मी पूजन करना घर में स्थायी सुख-समृद्धि की कामना का प्रतीक है। इसलिए सामान्य गृहस्थों के लिए शाम 6:27 से 8:27 बजे का समय विशेष रूप से उपयुक्त है।
1. दीपावली का वैदिक एवं उपनिषदिक महत्व: तमसो मा ज्योतिर्गमय
दीपावली की वर्तमान पूजा-पद्धति और तिथि का प्रत्यक्ष विधान वेदों में उसी रूप में नहीं मिलता, जिस रूप में आज हम लक्ष्मी-गणेश पूजन करते हैं। लेकिन प्रकाश, ज्ञान, सत्य, कल्याण और समृद्धि की जो अवधारणा दीपावली के केंद्र में है, उसके अत्यंत महत्वपूर्ण आधार वैदिक एवं उपनिषदिक साहित्य में मिलते हैं।
बृहदारण्यक उपनिषद् का एक प्रसिद्ध मंत्र दीपावली के आध्यात्मिक संदेश को अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त करता है।
बृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28)
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय॥
हिंदी अर्थ:
हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलिए। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलिए और मृत्यु से अमृतत्व की ओर ले चलिए।
यह मंत्र मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा का सार है। यहाँ अंधकार का अर्थ केवल रात का अंधकार नहीं, बल्कि अज्ञान, भ्रम, मोह, अहंकार और अविवेक भी है। प्रकाश का अर्थ केवल दीपक की रोशनी नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, सत्य और आत्मबोध है।
दीपावली इसी विचार को अपने जीवन में उतारने का अवसर है। घर में दीपक जलाने के साथ-साथ मन में ज्ञान, व्यवहार में सत्य और कर्म में सदाचार का प्रकाश भी होना चाहिए।
2. दीपज्योति का आध्यात्मिक महत्व
भारतीय संस्कृति में दीपक को अग्नि और प्रकाश का प्रतीक माना गया है। अग्नि वैदिक परंपरा में देवताओं तक हमारी प्रार्थना पहुँचाने वाली शक्ति है। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही अग्निदेव की स्तुति से प्रारंभ होता है।
ऋग्वेद (1.1.1)
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।
होतारं रत्नधातमम्॥
अर्थ: मैं अग्निदेव की स्तुति करता हूँ, जो यज्ञ के पुरोहित, देवताओं के आह्वानकर्ता और श्रेष्ठ रत्नों एवं कल्याणकारी संपदाओं को प्रदान करने वाले हैं।
इस वैदिक मंत्र में अग्नि को यज्ञ का प्रमुख आधार बताया गया है। दीपावली पर दीप प्रज्वलित करना इसी अग्नि-तत्त्व और प्रकाश के प्रति श्रद्धा का सांस्कृतिक प्रतीक माना जा सकता है।
दीपक के महत्व को व्यक्त करने वाला एक प्रसिद्ध पारंपरिक श्लोक है—
दीपज्योतिः परं ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
हिंदी अर्थ: दीपक की ज्योति परम ब्रह्म का प्रतीक है। वही ज्योति भगवान जनार्दन का स्वरूप है। यह दिव्य प्रकाश हमारे अज्ञान और पापों को दूर करे। उस पवित्र दीपज्योति को मेरा नमस्कार है।
यह पारंपरिक दीप-प्रार्थना है, इसे किसी विशिष्ट वैदिक सूक्त का मंत्र नहीं समझना चाहिए।
3. भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी और दीपावली
दीपावली के साथ जुड़ी सबसे लोकप्रिय धार्मिक मान्यता भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन की है।
रामायण की परंपरा के अनुसार भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके, रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे। उनके स्वागत में अयोध्यावासियों ने दीप जलाए और पूरे नगर को प्रकाश से सजा दिया।
यह प्रसंग भारतीय समाज में सत्य की असत्य पर, धर्म की अधर्म पर और मर्यादा की अहंकार पर विजय का प्रतीक बन गया।
भगवान श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन हों, मनुष्य को अपने धर्म, कर्तव्य, मर्यादा और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
इस दृष्टि से दीपावली केवल भगवान श्रीराम के स्वागत का उत्सव नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प भी है।
4. माता लक्ष्मी का प्राकट्य और दीपावली का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के समय माता लक्ष्मी क्षीरसागर से प्रकट हुई थीं। श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में समुद्र मंथन और लक्ष्मीजी के प्राकट्य का वर्णन मिलता है।
माता लक्ष्मी को धन, ऐश्वर्य, सौभाग्य, वैभव और मंगल की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। दीपावली की अमावस्या पर उनकी विशेष पूजा की जाती है।
लेकिन भारतीय दर्शन में लक्ष्मी का अर्थ केवल धन-संपत्ति नहीं है। अन्न, विद्या, साहस, संतान, स्वास्थ्य, धैर्य, विजय और सद्गुण भी जीवन की संपदाएँ हैं।
श्रीसूक्त में माता लक्ष्मी का स्वरूप इस प्रकार वर्णित है—
श्रीसूक्त (ऋग्वेद का खिल भाग)
हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह॥
हिंदी अर्थ: हे अग्निदेव! आप मेरे लिए स्वर्ण के समान आभा वाली, सुंदर, स्वर्ण और रजत के आभूषणों से सुशोभित, चंद्रमा के समान प्रकाशमान तथा दिव्य स्वरूप वाली माता लक्ष्मी का आह्वान करें।
यह मंत्र माता लक्ष्मी के दिव्य, ऐश्वर्यपूर्ण और मंगलकारी स्वरूप की प्रार्थना है।
दीपावली की लक्ष्मी पूजा का वास्तविक संदेश यह भी है कि धन का अर्जन ईमानदारी से हो, उसका उपयोग धर्म और समाज के कल्याण में हो तथा व्यक्ति के जीवन में संतोष और उदारता बनी रहे।
5. भगवान गणेश और माता सरस्वती की पूजा का महत्व
दीपावली पर माता लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा का विशेष विधान है। गणेशजी बुद्धि, विवेक, शुभारंभ और विघ्नों के निवारण के प्रतीक हैं। किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश पूजन की परंपरा है।
लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा का गहरा आध्यात्मिक संदेश है—धन के साथ बुद्धि और विवेक का होना आवश्यक है। विवेक के बिना प्राप्त धन कभी-कभी व्यक्ति के अहंकार और विनाश का कारण भी बन सकता है।
माता सरस्वती ज्ञान, विद्या और कला की अधिष्ठात्री हैं। उनकी आराधना हमें यह स्मरण कराती है कि धन और बुद्धि के साथ ज्ञान का होना भी आवश्यक है।
इस प्रकार दीपावली की संयुक्त पूजा जीवन के तीन महत्वपूर्ण आधारों को सामने रखती है—
महालक्ष्मी: धन, समृद्धि और ऐश्वर्य।
गणेशजी: बुद्धि, विवेक और शुभता।
माता सरस्वती: ज्ञान, विद्या और संस्कार।
6. दीपावली के अन्य धार्मिक एवं आध्यात्मिक संदर्भ
दीपावली भारत की विविध धार्मिक परंपराओं में भी विशेष स्थान रखती है।
जैन धर्म में: दीपावली का संबंध भगवान महावीर के निर्वाण से है। जैन परंपरा के अनुसार कार्तिक अमावस्या को भगवान महावीर ने पावापुरी में निर्वाण प्राप्त किया था। उनके निर्वाण के उपलक्ष्य में दीप जलाने की परंपरा का उल्लेख जैन आगम परंपरा और बाद के ग्रंथों में मिलता है।
सिख धर्म में: दीपावली का संबंध बंदी छोड़ दिवस से भी है। परंपरा के अनुसार छठे गुरु श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ग्वालियर के किले से मुक्त होकर अमृतसर पहुँचे थे। उनके आगमन पर स्वर्ण मंदिर को दीपों से सजाया गया था।
भगवान कृष्ण और नरकासुर की कथा: दीपावली के आसपास मनाई जाने वाली नरक चतुर्दशी का संबंध भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध और अत्याचार से मुक्ति की कथा से है। यह बुराई और अन्याय पर विजय का प्रतीक है।
इन सभी परंपराओं में एक समान संदेश दिखाई देता है—अंधकार, अन्याय, अज्ञान और बंधन से मुक्ति तथा प्रकाश, स्वतंत्रता और ज्ञान की स्थापना।
7. दीपावली की पूजा में दीपदान, रंगोली और स्वच्छता का महत्व
दीपावली पर घरों की सफाई, मुख्य द्वार पर रंगोली, तोरण और दीप सजाने की परंपरा है।
इसके पीछे धार्मिक मान्यता है कि स्वच्छ और पवित्र घर में माता लक्ष्मी का आगमन होता है। आध्यात्मिक दृष्टि से स्वच्छता बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार की होनी चाहिए।
रंगोली रंगों और सौंदर्य के माध्यम से मंगल एवं आनंद का प्रतीक है। दीपदान अज्ञान के अंधकार को दूर करने की प्रेरणा देता है।
इस अवसर पर मिट्टी के दीपक जलाना हमारी पारंपरिक संस्कृति और कुम्हारों के श्रम का सम्मान भी है। पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता रखते हुए प्राकृतिक तेल, मिट्टी के दीपक और सीमित ध्वनि एवं वायु प्रदूषण वाले उत्सव को प्राथमिकता देनी चाहिए।
दीपावली पर जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और आवश्यक सामग्री देना भी समृद्धि को समाज के साथ साझा करने का श्रेष्ठ माध्यम है।
8. दीपावली 2026: तिथि और लक्ष्मी-गणेश पूजन का शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में दीपावली रविवार, 8 नवम्बर को मनाई जाएगी। मुंबई के स्थानीय पंचांग के अनुसार इस दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के बाद अमावस्या तिथि प्रारंभ होगी। लक्ष्मी पूजन अमावस्या के प्रदोष काल में किया जाएगा।
2026 के दीपावली पर्व के विशेष ज्योतिषीय संयोग
इस वर्ष दीपावली के दिन कुछ उल्लेखनीय पंचांग योग बन रहे हैं।
1. रविवार और अमावस्या का संयोग
दीपावली रविवार को है। रविवार सूर्यदेव का दिन है और अमावस्या पितृ-स्मरण, आत्मचिंतन तथा साधना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह संयोग प्रकाश, आत्मबल और आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से विशेष अर्थ रखता है।
2. स्वाति नक्षत्र
8 नवम्बर को मुंबई के पंचांग में स्वाति नक्षत्र पूरे दिन और रात विद्यमान है। स्वाति का संबंध स्वतंत्रता, गति, अनुकूलन और वायु तत्त्व से माना जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण नक्षत्र है।
3. आयुष्मान योग
इस दिन आयुष्मान योग रात 3:03 बजे (9 नवम्बर) तक रहेगा, इसके बाद सौभाग्य योग प्रारंभ होगा। आयुष्मान का शाब्दिक अर्थ दीर्घायु और स्वस्थ जीवन से संबंधित है। इसे शुभ योगों में गिना जाता है।
4. प्रदोष काल में वृषभ स्थिर लग्न
इस वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण पूजन-संयोग यही है। प्रदोष काल में वृषभ स्थिर लग्न उपलब्ध है और इसी अवधि में अमावस्या भी विद्यमान है। इसलिए शाम 6:27 से 8:27 बजे तक का लक्ष्मी-गणेश पूजन मुहूर्त विशेष रूप से अनुकूल है।
विशेष सावधानी: पंचांग में 8 नवम्बर को आदल योग भी पूरे दिन दर्शाया गया है। इसे शुभ योग नहीं मानना चाहिए। इसलिए केवल किसी एक योग के नाम के आधार पर पूरे दिन को शुभ घोषित करना उचित नहीं है। लक्ष्मी पूजन के लिए स्थानीय पंचांग में दिया गया प्रदोष एवं स्थिर लग्न का मुहूर्त अपनाना बेहतर है।
9. दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश पूजन की विधि
दीपावली की संध्या को स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को स्वच्छ करके वहाँ लाल या पीला वस्त्र बिछाएँ।
पूजन की सामान्य विधि इस प्रकार है—
पूजा स्थल पर भगवान गणेश, माता लक्ष्मी और माता सरस्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
कलश स्थापित करके रोली, अक्षत, पुष्प, चंदन, धूप और दीप अर्पित करें।
सबसे पहले भगवान गणेश का पूजन करें।
इसके बाद माता लक्ष्मी का पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन करें।
माता सरस्वती और कुबेर देव का स्मरण एवं पूजन करें।
श्रीसूक्त, लक्ष्मी मंत्र और गणेश मंत्र का पाठ करें।
मिठाई, फल, खील-बताशे और अन्य नैवेद्य अर्पित करें।
परिवार के सभी सदस्य मिलकर आरती करें और घर के विभिन्न स्थानों पर दीपक जलाएँ।
माता लक्ष्मी का मंत्र
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः॥
अर्थ: माता महालक्ष्मी को मेरा नमन है। वे हमारे जीवन में धन, ऐश्वर्य, सौभाग्य और मंगल प्रदान करें।
भगवान गणेश का मंत्र
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
अर्थ: हे विशाल शरीर और करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी भगवान गणेश! मेरे सभी कार्यों को सदैव निर्विघ्न संपन्न करें।
पूजा के बाद दीपदान, आरती और परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा है।
10. दीपावली का सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश
दीपावली का महत्व व्यक्तिगत समृद्धि तक सीमित नहीं है। यह समाज में प्रेम, सद्भाव, सहयोग और सेवा की भावना को भी मजबूत करती है।
इस पर्व पर परिवार के सदस्य एकत्रित होते हैं, पुराने मतभेद भुलाकर एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हैं और सामाजिक संबंधों को मजबूत करते हैं।
दीपावली हमें यह भी सिखाती है कि अपने घर में दीप जलाने के साथ-साथ किसी जरूरतमंद के जीवन में भी खुशियों का प्रकाश पहुँचाएँ। गरीब परिवारों की सहायता, बच्चों की शिक्षा, चिकित्सा, वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्यों के माध्यम से इस पर्व को और सार्थक बनाया जा सकता है।
आज के समय में जब समाज अनेक प्रकार के तनाव, प्रतिस्पर्धा और मानसिक अशांति से गुजर रहा है, दीपावली का यह संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि वास्तविक समृद्धि केवल भौतिक संपत्ति में नहीं, बल्कि मानसिक शांति, पारिवारिक प्रेम, नैतिकता और सामाजिक कल्याण में भी निहित है।
उपसंहार: एक दीप अपने भीतर भी जलाएँ
दीपावली का वास्तविक उद्देश्य केवल घरों को रोशन करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अंधकार को समाप्त करना है।
यदि हम अपने मन से ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और नकारात्मकता को दूर करें, अपने व्यवहार में प्रेम, करुणा और उदारता लाएँ तथा अपने ज्ञान और सामर्थ्य का उपयोग दूसरों के कल्याण में करें, तभी दीपावली का आध्यात्मिक उद्देश्य पूरा होगा।
उपनिषद् का संदेश तमसो मा ज्योतिर्गमय हमें जीवन भर प्रेरित करता है कि हम अज्ञान से ज्ञान, असत्य से सत्य और निराशा से आशा की ओर बढ़ें।
इस दीपावली पर संकल्प लें कि एक दीप अपने घर में, एक दीप अपने मन में और एक दीप किसी जरूरतमंद के जीवन में अवश्य जलाएँ।
शुभ दीपावली 2026!
लेख के प्रमुख शास्त्रीय संदर्भ
लेख को संदर्भ सहित प्रकाशित करने के लिए निम्नलिखित ग्रंथ उपयोगी हैं:
ऋग्वेद 1.1.1 — अग्नि सूक्त, अग्नि के प्रकाश एवं यज्ञीय महत्व के लिए।
बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28 — असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय।
श्रीसूक्त, ऋग्वेद का खिल भाग — माता लक्ष्मी की स्तुति।
श्रीमद्भागवत महापुराण, अष्टम स्कंध, अध्याय 8 — समुद्र मंथन एवं लक्ष्मीजी के प्राकट्य का वर्णन।
वाल्मीकि रामायण, युद्धकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड — श्रीराम की लंका विजय और अयोध्या वापसी की कथा-परंपरा।
जैन परंपरा के कल्पसूत्र एवं निर्वाण संबंधी साहित्य — भगवान महावीर के निर्वाण का संदर्भ।
पंचांग संबंधी स्रोत: द्रिक पंचांग – दीपावली लक्ष्मी पूजन मुहूर्त 2026, मुंबई तथा 8 नवम्बर 2026 का मुंबई पंचांग।
नोट: मुहूर्त मुंबई के स्थानीय समय के अनुसार हैं। अन्य शहरों में सूर्यास्त और लग्न के कारण समय अलग हो सकता है। परिवार की परंपरा और स्थानीय विद्वान के पंचांग को भी ध्यान में रखें।





