डा भीमराव रामजी अम्बेडकर ने बम्बई में "समाज समता संघ" की स्थापना की, जिसका मुख्य कार्य अछूतों के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना तथा उनको अपने अधिकारों के प्रति सचेत करना था। यह संघ बड़ा सक्रिय था। इसी समाज के तत्वाधान में 500 महारों को जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण करवाया गया, ताकि सामाजिक समता स्थापित की जा सके। यह सभा रत्नागिरी के दापोली में मार्च 1928 में संपन्न हुई जिसमें डॉ अम्बेडकर भी मौजूद थे।

(सन्दर्भ स्रोत - डॉ बी आर अम्बेडकर- व्यक्तित्व एवं कृतित्व पृष्ठ 116-117).

इसी अवसर का एक चित्र दुनिया नामक पत्रिका मे छपा था। (संलग्न)

डॉ. अम्बेडकर जी के 6, सितम्बर-1929 के ’बहिष्कृत भारत‘ में यह समाचार प्रकाशित हुआ था, कि ’मनमाड़ के महारों (दलितों) ने श्रावणी मनायी। 26 दलितों ने यज्ञोपवीत धारण किये। यह समारोह मनमाड़ रेल्वे स्टेशन के पास डॉ. अम्बेडकरजी के मित्र श्री रामचन्द्र राणोजी पवार नांदगांवकर के घर में सम्पन्न हुआ था।

डा आंबेडकर लिखते है कि शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों के बीच अनवरत संघर्ष होते रहते थे, और ब्राह्मणों को शूद्रों के हाथों अनेक कष्ट और अपमान सहने पड़े। शूद्रों द्वारा किये गये उत्पीड़न और पीड़ाओं से त्रस्त होने के फलस्वरूप ब्राह्मणों ने शूद्रों का उपनयन संस्कार सम्पन्न करवाना बंद कर दिया। उपनयन संस्कार से वंचित होने पर शूद्र जो क्षत्रिय थे उनका सामाजिक ह्रास हो गया।

(सन्दर्भ :- 'शूद्र कौन थे' के सातवें संस्करण-2013 के प्राक्कथन का पृष्ठ 3 और 4)