यह है कालिदास के मेघदूतम गीतिकाव्य के हिंदी काव्यानुवाद का एक उदहारण जिसका डॉ.अपर्णा पांडेय ने हिंदी में सरल भाषा में अनुवाद का महत्वपूर्ण कार्य कर हिंदी की के विद्यार्थियों के लिए सुगम बनाया। इस काव्यानुवाद के विषय में आचार्य अग्निमित्र शास्त्री लिखते हैं इस अनुवाद में हिंदी के महाकवि जयशंकर प्रसाद ,आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की शास्त्रीय हिंदी के झलक प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होती है । अनुवाद का एक उदाहरण देखिए -
स्निग्ध मसारिन अंजन सम कांति, वाले तट पर पहुंच जरा।
सद्य काटे द्विरद दशन सम,श्वेत वर्ण कैलाश भरा।
निरनिमेश तव रूप तुम्हारा, दर्शनीय हो जाए जरा ।
ज्यों गौरांग राम निश्चित, कंधे मध्य दुकूल धरा।।
रचना धर्म काव्य निर्माण की एक कसौटी उनके साहित्य का तुकांत या तुकांत होना भी रहा है । कहने को यह डॉ.पांडेय की प्रथम कृति है पर उपयुक्त कसौटी पर यह कृति खरी उतरती है । एक अन्य उदाहरण देखिए -
जिस अलका के मार्ग सुशोभित अलक गिरे मन्दारों से ।
शीघ्र गमन करने के कारण, स्वर्ण कमल कचनारों से ।।
कुच प्रदेश टूटे हारों से ,औ मोती के हारों से ।
सूर्य उदय होने पर जाती , चिन्ह लिए अभिसरों के ।।
डॉ.पांडेय हाड़ोती अंचल की एक ऐसी रचनाकार हैं जिन्होंने शिक्षिका के रूप में हिंदी सेवा का परचम भारत से बाहर ढाका ( बांग्लादेश ) में भी लहराया। आपने भारतीय विदेश सेवा में चयनित होकर 2013 से 2017 तक प्रतिनियुक्ति पर भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली द्वारा सांस्कृतिक प्रतिनिधि और हिंदी शिक्षक के रूप में ढाका में हिंदी और संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य किया। जहां इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र और आधुनिक भाषा इंस्टीट्यूट ,ढाका विश्वविद्यालय में प्रथम हिंदी पीठ के रूप में भी कार्य किया और ढाका विश्व विद्यालय में ( एक वर्षीय पाठ्य क्रम) शुरू हुआ।"पुराणों में शुकदेव" इनकी गहन अनुसंधानात्मक प्रवृत्ति का मधुर फल है, जिसके द्वारा हम शुकदेव जी के समग्र व्यक्तित्व और कृतित्व को आत्मसात कर सकते हैं। इस कृति पर यह विचार लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली के संस्कृत के विभागाध्यक्ष आचार्य स्व.इच्छाराम राम द्विवेदी"प्रणव" ने व्यक्त किए थे।
रचनाकार हिंदी, संस्कृत और बांग्ला भाषाओं पर समान अधिकार रहती हैं। इन्होंने हिंदी भाषा में गद्य और पद्य विधाओं में संस्मरण,ग़ज़ल ,उपन्यास ,निबंध ,गीत, समीक्षाएं आदि लेखन के साथ-साथ संस्कृत और बांग्ला पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद किया। इनका उन्मेश, प्रवासी मन काव्य संग्रह आध्यात्मिक ,सांस्कृतिक ,राष्ट्रीय भाव भूमि से ओतप्रोत है। इस संग्रह की कविताओं से मानवता एवं देश प्रेम के स्वर गूंजते हैं । इनके गीत, ग़ज़लों में प्रेम, विरह , बिछोह, पीड़ा के भावों को सहज ही महसूस किया जा सकता हैं। यह काव्य संग्रह ढाका प्रवास के दौरान लिखी गई ऐसी कृति है जिसमें महिलाओं के मन में रूढ़िवादी सोच के प्रति तीव्र आक्रोश, तो उससे मुक्त होने की छटपटाहट भी दिखाई देती है। साथ ही कविताएं उदात्त प्रेम की पक्षधर हैं ,जो कण-कण में ईश्वरीय रूप को दृष्टिगत करती हैं । कवि ,समीक्षक स्व. वीरेंद्र विद्यार्थी लिखते हैं कि "आत्मा के चिर संतति " गीति - संस्कृति का प्रथम प्रस्फुटन जगत और जीवन का खूबसूरत दर्पण बन गया है। जिसके जूम लेंस में आलोकित अतीत रक्त रंजित इतिहास की कौन किरचें वर्तमान का भाष्य भविष्य की भव्यता सृष्टि का व्याकरण अपने को बार-बार निहारते, निखारते और पैनाते रहते हैं ।
इस संदर्भ में मैं कुछ कहानियों "परियों का देश", "चलो आम इकट्ठा करें"," चंदा मामा का देश" आदि प्रभावी हैं। युवावस्था के प्रेम पर आधारित दो उपन्यास"तड़प "और "दो मित्रों की कथा" लिखे हैं।
परिचय :
डॉ.अर्पणा पांडेय का जन्म साहित्यिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक रूप से समृद्ध परिवार संस्कृत और ज्योतिष के प्रकांड विद्वान आचार्य पिता लाल बिहारी द्विवेदी (लब्ध प्रतिष्ठ राष्ट्रपति पुरस्कार) और माता कृष्णा देवी द्विवेदी के आंगन में चौथी पुत्री के रूप में 1970 में मैनपुरी ,उत्तर प्रदेश में हुआ। आपके भाई आचार्य इच्छाराम द्विवेदी ’प्रणव’ भी संस्कृत और हिंदी साहित्य के ख्यातनाम विद्वान् रहे हैं । डॉ.अपर्णा पाण्डेय विवाह के पश्चात 1988 में कोटा आ गई। कोटा , राजस्थान में निवास कर रहीं हैं। आपने हिंदी और संस्कृत से स्नातकोत्तर की डिग्री और ’पुराणों में शुकदेव-एक समालोचनात्मक अध्ययन’ विषय पर के.एम. इंस्टीट्यूट,आगरा विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। आपने अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर अनेक काव्य गोष्ठियों और शोध संगोष्ठियों में भाग लिया है। साहित्यिक गोष्ठियों में कविता पाठ और शोध कार्यशालों में अपने शोध पत्रों का वाचन किया। बांग्लादेश में भारत के राजदूत हर्षवर्धन श्रृंगला एवं डायरेक्ट जनरल (साउथ एशिया) द्वारा प्रशस्ति पत्र से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है। जवाहरलाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी ,जयपुर द्वारा 2023-24 के लिए आपको बांग्ला भाषा की बाल कथाओं की कृति ’प्रिय गल्प’ पर ’रांगेय राघव पुरस्कार’ से सम्मानित किया। इन प्रमुख पुरस्कारों के साथ-साथ दो दर्जन से अधिक संस्थाओं द्वारा आपको पुरस्कृत और सम्मानित किया गया है। आप 2011 में राजस्थान लोक सेवा आयोग से चयनित हो कर शिक्षा विभाग में आई और वर्तमान में सैकंडरी विद्यालय, सुल्तानपुर में सेवारत हैं।

(लेखक डॉ, प्रभात कुमार सिंघल कोटा में रहते हैं और राजस्थान के साहित्य, संस्कृति, पर्यटन व सामाजिक विषयों पर लेखन करते हैं)





