आधुनिक भारत में विशेष कर जो आधुनिक शिक्षित समुदाय हैं उनमें अब्राह्मिक पंथों के चिंतन और प्रचार दोनों का भरपूर प्रभाव पड़ा है।
जहां तक आध्यात्मिक प्रभाव की बात है , वह असंभव है क्योंकि अब्राहमिक पंथ रजोगुणी भाव भूमि वाले हैं और सनातन धर्म की सभी शाखाओं में अध्यात्म का आरंभ ही सत्वगुण के उत्कर्ष से होता है।
परंतु फिल्मों के गीतों के जरिए कुछ प्रभाव तो आध्यात्मिक क्षेत्र में पड़ा ही है। जैसे अनेक गानों में ऊपर वाले ऊपर वाले कहकर भगवान को संबोधित किया गया जो सातवें आसमान में रह रहे अल्लाह या गॉड की मान्यता से प्रभावित है क्योंकि सनातन धर्म में तो परम सत्ता , परम चेतन अथवा परमेश्वर कण कण में विद्यमान है ।वह केवल ऊपर वाले नहीं है ।जितने ऊपर वाले हैं उतना ही नीचे वाले। बाएं वाले ।दाएं वाले ।बीच वाले सभी कुछ हैं। इसी प्रकार ईसाइयत और इस्लाम आदि के प्रभाव से हिंदुओं में भी पुनर्जन्म और कर्म फल के सिद्धांत का विस्मरण हो गया है जबकि भगवान बुद्ध और सभी तीर्थंकरों ने गुरु नानक देव ने तथा सनातन धर्म के सभी आचार्यों ने पुनर्जन्म और कर्म फल के सिद्धांत को सत्य कहा है और इसे महत्वपूर्ण सत्य बताया है। पुनर्जन्म और कर्म फल के सिद्धांत के सत्य की विस्मृति से शिक्षित हिंदुओं में नैतिकता का आग्रह समाप्त हो गया है जबकि स्वयं जयप्रकाश नारायण ने यह कहा था कि पुनर्जन्म और कर्म फल में विश्वास रखें बिना किसी भी समाज में नैतिक जीवन असंभव है। केवल नैतिक जीवन का दिखावा ही तब होगा ।क्योंकि कोई भी मनुष्य यदि पुनर्जन्म और कर्म फल को नहीं मानता तो वह अपने क्षुद्र स्वार्थ का त्याग क्यों करेगा?उसका दिखावा भले करें।
विवाह मानव जीवन पाने के कारण आवश्यक धर्म कर्तव्य करने के लिए गृहस्थ धर्म में प्रवेश का एक महानअवसर है।गृहस्थाश्रम में प्रवेश के लिए विवाह किया जाता है।
परंतु इस्लाम और ईसाइयत के प्रभाव से वह विवाह मैरिज या शादी हो गया है और वस्तुतः अपनी पसंद की कन्या को लड़का घर में लाता है और प्रमुख उद्देश्य केवल दैहिक मानसिक सुख होता है , धर्म कर्तव्य का भाव विवाह के समय शिक्षित युवक युवतियों में नहीं होता ।समाज के दबाव से उसका निर्वाह करते हैं यही बहुत है।
जन्मतः प्रत्येक व्यक्ति देव ऋण , ऋषि ऋण और पितृ ऋण का ऋणी होता है जिनको उतारने के लिए अनेक करणीय कार्य शास्त्रों में प्रतिपादित हैं।परंतु यह भाव शिक्षित हिंदुओं में अनुपस्थित है।ध्यान ही नहीं रहता।बस माता-पिता को साथ रखा जाता है या निभाया जाता है और स्थिति इतनी विकट हो गई है कि वृद्धाश्रम में अपने सयानो को भेजकर छुट्टी पाने का भाव बढ़ता जा जा रहा है।
(लेखक अध्यात्मिक विषयों व हिंदुत्व पर शोधपूर्ण लेखन करते हैं और इनकी की पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है)





